अभी बहुत दिन नहीं हुए जब वाम-उदारवादी जनता को मरा हुआ घोषित कर रहे थे- कुछ खुलेआम तो कुछ अनकहे ढंग से। ये ही अब हालिया छात्र-युवा आंदोलन की आंशिक सफलता के बाद जनता की जयकार कर रहे हैं- जनता जनार्दन की जय हो! वे प्रायश्चित के स्वर में कह रहे हैं कि उन्होंने जनता में व्याप्त असंतोष-आक्रोश को समझने में भूल की।
इनके इस प्रायश्चित वाले स्वर के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि देर आयद, दुरुस्त आयद। ये कुछ समय बाद जनता की निष्क्रियता का रोना रो सकते हैं और जनता को कोस सकते हैं। आखिर सीएए-एनआरसी आंदोलन, किसान आंदोलन, अग्निवीर आंदोलन तथा हालिया मजदूर आंदोलन को कौन भुला सकता है। पर वे इन सब को भुलाकर जनता को कोसने लगते हैं कि जनता उनके मुताबिक सड़कों पर नहीं उतर रही है।
व्यापक मजदूर-मेहनतकश जनता किसी के मन-मुताबिक सड़कों पर नहीं उतरती। खासकर इसलिए भी कि उसे अच्छी तरह पता होता है कि सड़कों पर शासकों की लाठियां-गोलियां उसका इंतजार कर रही होती हैं। इसीलिए व्यापक मजदूर-मेहनतकश जनता तभी सड़कों पर उतरती है जब उसके भीतर इकट्ठा होता हुआ असंतोष-आक्रोश लाठियों-गोलियों के भय को तोड़ दें। यह भावना पैदा हो जाये कि अब बहुत हो चुका, जो होगा देखा जायेगा। और ऐसा रोज-रोज नहीं हो सकता। भीतर इकट्ठा होता असंतोष-आक्रोश का लावा एक खास स्तर के बाद ही बाहर फूटता है जिसकी पहले से भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। समाज परिवर्तन के लिए तैयार समाजों में यही विस्फोट क्रांति की ओर ले जाता है।
शासक वर्ग इस बात को जानते हैं। इसलिए वे इस विस्फोट को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। प्लेटो और चाणक्य के जमाने से ही शासक जनता को जाहिल बनाये रखने तथा उसे बेवकूफ बनाने के लिए सारे जतन करते रहे हैं। प्लेटो और चाणक्य ने तो बाकायदा इसके तरीके बताये। शासक तात्कालिक तौर पर इसमें सफल भी होते रहे हैं पर एक सीमा तक। अन्याय-अत्याचार व शोषण की शिकार मजदूर-मेहनतकश जनता के भीतर इकट्ठा होता जाता असंतोष-आक्रोश एक दिन फूट पड़ता है। समय-काल के हिसाब से यह विस्फोट भांति-भांति के रूप धारण करता है।
और भी व्यापक रूप में देखें तो किसी भी समाज की शोषित-उत्पीड़ित जनता अपने समाज के शोषक-उत्पीड़क वर्गों के विचारों के दायरे में ही जीती है। किसी भी समाज में शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार होते हैं। इसीलिए सामंती जमाने में जन्मजात गैर-बराबरी में शोषित-उत्पीड़ित जन भी विश्वास करते थे। भारत में शूद्र व अन्त्यज भी वर्ण-जाति व्यवस्था में विश्वास करते थे। इसीलिए पूंजीवाद में मजदूर भी आर्थिक गैर-बराबरी, पैसे, मुनाफे व प्रतियोगिता में विश्वास करते हैं। इन्हीं का फायदा उठाकर शासक-शोषक लम्बे समय तक शासन व शोषण कर पाते हैं।
पर जब समाज का विकास वहां पहुंच जाता है जब समाज व्यवस्था में परिवर्तन आसन्न हो जाता है तब शासक वर्ग के विचार शासन के लिए काफी नहीं रह जाते। तब शासक अधिकाधिक बल प्रयोग का सहारा लेते हैं। पर यह भी एक सीमा तक ही सफल होता है। इसके बाद ऐसा विस्फोट होता है कि पुरानी व्यवस्था ढह जाती है। उसके भीतर से एक नये समाज का जन्म होता है।
आज तात्कालिक और दूरगामी दोनों अर्थों मंे समाज ज्यादा विस्फोटक होता जा रहा है- भारत ही नहीं, सारी दुनिया में ही। सारी दुनिया के ही पूंजीवादी समाज विस्फोट के मुहाने पर बैठे हैं। आंशिक तौर पर विस्फोट हो भी रहे हैं।
ऐसे में वाम-उदारवादियों की तरह कभी ‘जनता मर गयी है’ और कभी ‘जनता जनार्दन की जय हो’ का राग अलापने के बदले व्यापक मजदूर-मेहनतकश जनता को सड़क पर नेतृत्व देने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। आज नहीं तो कल जनता फिर सड़क पर उतरेगी। सवाल यह है कि क्या क्रांतिकारी उस स्थिति के लिए तैयार हैं?