ऐरा के संघर्षरत मजदूर

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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रुद्रपुर/ ऐरा श्रमिक संगठन 2016 अगस्त से अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत है और कम्पनी का मसला दिल्ली एनसीएलटी कोर्ट से रुद्रपुर श्रम भवन पर आकर टिका हुआ है। लेकिन एनसीएलटी के आदेश होने के बावजूद भी श्रम विभाग और रुद्रपुर जिला प्रशासन 102 मजदूरों की कार्यबहाली कराने के आदेश को लागू करने में सक्षम नहीं है। पिछले 1 साल से अधिक का समय हो गया है लेकिन श्रम विभाग और रुद्रपुर प्रशासन मजदूरों को बहला-फुसला रहा है। कोई भी न्याय हित में कार्रवाई नहीं की जा रही है। इससे यह प्रतीत होता है कि जो नया मालिक है वह कहीं न कहीं अपने धन-बल से प्रशासन को, कोर्ट के आदेश को व कानून को अपने पक्ष में मोड़ने में लगा हुआ है।
    
गत वर्ष एनसीएलटी के आदेशों के तहत 102 स्थाई श्रमिकों की कार्यबहाली कराने की मांग को लेकर एरा श्रमिक संगठन के बैनर तले मजदूर और उनके परिवार की महिलाएं भारी तादाद में श्रम भवन रुद्रपुर पहुंचे थे। जहां सहायक श्रमायुक्त महोदय रुद्रपुर के नेतृत्व में दोनों पक्षों की वार्ता हुई।
    
यूनियन महामंत्री दिनेश कुमार ने कहा कि आज की वार्ता सकारात्मक रही। सहायक श्रमायुक्त महोदय ने प्रबंधक वर्ग से कहा कि आपको एन सी एल टी के तहत हुई नीलामी की शर्तों के अनुसार सभी 102 स्थाई श्रमिकों को नौकरी पर रखना होगा। उन्होंने प्रबंधन वर्ग को निर्देश दिया कि अगली तिथि में सभी श्रमिकों को नौकरी में रखने हेतु लिखित रोडमैप लेकर आयें। वार्ता की अगली तिथि 11 नवंबर 2025 को निर्धारित की गई थी।
    
श्रम विभाग में वार्ता के दौरान प्रबंधक पक्ष द्वारा गलत तर्क प्रस्तुत किया कि कंपनी बंदी से पहले ही सभी श्रमिकों का नागपुर प्लांट में ट्रांसफर हो चुका था। नीलामी के समय कोई भी श्रमिक कंपनी में नियोजित नहीं था। कि नीलामी के बाद सबको ग्रेच्युटी का भुगतान कर दिया था। इस पर सहायक श्रमायुक्त महोदय ने स्पष्ट किया कि कंपनी के और उत्तराखंड के स्टेडिंग आर्डर के अनुसार उक्त स्थानांतरण अवैध था। कि कम्पनी द्वारा किसी श्रमिक को ग्रेच्युटी देने से उसका कंपनी में नियोजन भंग हो जाता है, यह किस कानून में लिखा है। इसका प्रबंधक पक्ष के पास कोई उत्तर नहीं था।
    
यूनियन महामंत्री दिनेश कुमार ने यूनियन का पक्ष रखा कि इंसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) 2016 केंद्रीय कानून है जिसकी धारा 238 कहती है कि इसके प्रावधानों में और अन्य कानूनों के प्रावधानों में एवं अदालतों के आदेशों में यदि कोई असंगतता आती है तो प्ठब् कोड और इसके आधार पर एन सी एल टी द्वारा पारित आदेश ही सब पर प्रभावी होंगे। कि एन सी एल टी की दिल्ली शाखा द्वारा नियुक्त लिक्विडेटर श्री ज्ञान चंद नारंग की देखरेख में अपेक्स बिल्डसिस लिमिटेड सिडकुल पंतनगर की हुई नीलामी प्रक्रिया के तहत उसे जसमृत डिजाइनर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा कर्मचारियों और 102 श्रमिकों सहित खरीदा गया। एन सी एल टी द्वारा कम्पनी के स्वामित्व और प्रबंधन को जसमृत डिजाइनर को हस्तगत किया गया है। नये मालिक द्वारा नीलामी प्रक्रिया और स्वामित्व हस्तान्तरण में वर्णित सभी शर्तों को स्वीकार करते हुए एन सी एल टी को शपथ पत्र देकर सभी शर्तों के प्रति पूर्ण वचनबद्धता व्यक्त की गई। किन्तु एन सी एल टी के आदेशों के अनुरूप पुराने 102 श्रमिकों को कम्पनी ने काम पर नहीं रखा जो कि एन सी एल टी के उपरोक्त आदेश का, नीलामी के तहत स्वामित्व हस्तान्तरण में दर्ज शर्तों का और कम्पनी द्वारा दिए गये शपथ पत्र का एवं IBC कानून 2016 का घोर उल्लंघन है।
    
आज विडंबना यह है कि मजदूर एक हाथ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश, दूसरे हाथ में एन सी एल टी में हुए कम्पनी के रिजाल्यूशन प्लान के तहत स्वामित्व हस्तान्तरण के कागजों, प्ठब् कानून की धारा 238 को लेकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। साथ में संविधान का अनुच्छेद 256 को भी दिखा रहे हैं जिसमें स्पष्ट लिखा है केंद्रीय कानून को लागू कराने की जिम्मेदारी राज्य प्रशासन की ही है। इसके बावजूद भी कम्पनी प्रबंधक द्वारा उपरोक्त 102 स्थाई श्रमिकों को काम पर बहाल नहीं किया जा रहा है।
    
मजदूरों की स्थिति जस की तस बनी है और फैक्टरी चालू हालत में है। पिछले डेढ़ साल से फैक्टरी में पूरा उत्पादन हो रहा है जबकि ए एल सी अरविंद सैनी का कहना है कि मैंने फैक्टरी में कोई भी ठेकेदारी के लाइसेंस जारी नहीं किए हैं। क्योंकि वह हेवी इंजीनियरिंग उद्योग में आता है इसलिए वहां पर ठेकेदारी चल ही नहीं सकती है। श्रम कानून के हिसाब से बार-बार श्रम भवन रुद्रपुर और प्रशासनिक अधिकारी से शिकायत करने के बाद भी उनके नाक के नीचे यह मनमर्जी चल रही है।
    
यही वर्तमान समय में विडम्बना है कि अगर कोर्ट मजदूरों के खिलाफ आदेश दे दे तो पूरा प्रशासनिक अमला कोर्ट के आदेश को लागू करवाने में बेतहाशा मुस्तैदी दिखाता है। परंतु वहीं दूसरी तरफ अगर कोर्ट का फैसला (निचली से ऊपरी) किसी भी प्रकार मजदूरों के पक्ष में आ जाए तो वही प्रशासनिक अमला कोर्ट के आदेशों को धता बताते हुए उसे लागू करने में हद दर्जे की हीला-हवाली करता हुआ नजर आता है। मजदूरों व नेतृत्व को इस प्रकार के व्यवहार से अब काफी हद तक इस शोषणकरी व्यवस्था को समझना आसान हो गया है। कुछ का मोह अभी भी मौजूदा सरकार के प्रतिनिधियों के ऊपर बना हुआ है जिसे अभी हटना बाकी है। खबर लिखे जाने तक मजदूर कभी श्रम विभाग तो कभी जिला प्रशासन तो कभी सत्ताधारी नेताओं के पास कार्य बहाली के लिए भटक रहे हैं।        -रुद्रपुर संवाददाता

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