जब भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों ने देखा कि बिना नेम प्लेट पुलिस वाले, सादी वर्दी में तैनात गुंडे-लाठी डंडे लिए हुए नियम विरुद्ध पुलिस के साथ खड़े थे और लड़कियों और लड़कों पर क्रूरता से लाठी मार रहे थे। यह लाठियां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की रीढ़ तोड़ रही थीं। लाठियां नियम के विरुद्ध सर पर भी मारी गईं और उनमें से एक छात्र गंभीर रूप से जख्मी, अस्पताल में है। पूंजीवादी कार्यपालिका ही नहीं न्यायपालिका भी जख्मी है, बल्कि कोमा में है।
आज जरूरत है कि छात्र और उनके किसान, मजदूर, मध्यवर्ग की जनता सरकार ही नहीं न्यायपालिका को ‘जन अदालत’ में पेश करे। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जजों की बेंच ने 20 जुलाई के जनता के मासूम बच्चों के खिलाफ सरकार के अघोषित युद्ध की और गैर कानूनी रूप से दमन के खिलाफ उपलब्ध वीडियो को पेश करने की इजाजत न देकर पुनः यह साबित किया है कि न्यायपालिका भी (पूंजीवादी) राज्य सत्ता का ही एक अंग है। यानी, भारत के पूंजीवादी जनतंत्र में मामला अब कार्यपालिका के एक मामूली प्यादे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से बहुत आगे निकल चला है। अब तो बस जनता को फैसला करना है कि वह विभिन्न रंग-रूपों वाली पार्टियों और इस आउट आफ डेट हो चुकी व्यवस्था का क्या करे। जनता को अपनी जन अदालत लगानी है, जनता को अपनी संसद बुलानी है जैसे कि 6 साल पहले किसान आंदोलन के दौरान किसान संसद का आयोजन किया गया। किसानों, मजदूरों आदि व्यापक जनता को अपने बच्चों के साथ इसमें आना चाहिए।
प्रश्न इसलिए भी है कि वर्तमान नेतृत्व जिसकी कोई भी स्पष्ट राजनीतिक समझ नहीं है, वह केवल एक पंचमेल खिचड़ी विचारधारा है जहां अंबेडकर, भगत सिंह आदि अलग-अलग विचारधाराओं के व्यक्तियों की मात्र तस्वीर लगाना ही अपनी राजनीतिक लाइन है जो कि कोई भी स्पष्ट राजनीतिक लाइन नहीं है। अन्यथा तो आने वाले समय में बिना किसी स्पष्ट क्रांतिकारी नेतृत्व के इस आंदोलन का भविष्य क्या होगा सिर्फ अटकलों का विषय रहेगा। -डा. उमेश चंदोला