केन्द्रीय बजट का राजनीतिक अर्थशास्त्र

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आजकल भारत सरकार का सालाना बजट, जिसे साल की शुरूआत में संसद में पेश और पास किया जाता है, केवल केन्द्रीय सरकार का हिसाब-किताब नहीं रह गया है। इसके बदले वह एक राजनीतिक वक्तव्य बन गया है। सत्ता पक्ष इसे आम मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए तमाम घोषणाओं के दस्तावेज की तरह पेश करता है तो विपक्ष उसे इस मामले में नाकारा बताता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में कौन है। साल-दर-साल यह चलता रहता है। 
    
साल 1991 से तो केन्द्र सरकार का बजट देश की आर्थिक नीतियों में फेर-बदल का भी अवसर बन गया है। बात इतनी भर नहीं है कि बजट के समय करों की दरों में बदलाव की घोषणा की जाती है। इससे भी आगे आम आर्थिक नीतियों में बदलाव की भी घोषणा की जाती है। पूंजीपति वर्ग अपने प्रचार माध्यमों से इस बदलाव की उम्मीदों का समां बांधता है और फिर बाद में बजट को इसकी कसौटी पर कसा जाता है। 
    
इस तरह बजट के खुला राजनीतिक चरित्र ग्रहण कर लेने के बाद स्वाभाविक है कि आज की पूंजीवादी राजनीति की तरह इसमें भी झूठ-फरेब का बोलबाला हो जाये। किया कुछ जाये और बताया कुछ जाये। इसके लिए स्वयं बजट के वक्तव्य में आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण में हेरा-फेरी की जाती है। बजट के आंकड़ों में लुका-छिपी का खेल सारी पूंजीवादी सरकारों की आम विशेषता है। पर अब यह विशाल पैमाने पर होने लगा है। इससे स्वयं बजट ही संदेह के दायरे में आने लगा है। कुछ उदाहरणों से बात स्पष्ट हो जायेगी। 
    
आम जन से संबंधित सामाजिक मदों में खर्च को सरकार मजदूर-मेहनतकश जनता के कल्याण के लिए खर्च के रूप में पेश करती है। इन मदों में बढ़ोत्तरी को खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और सरकार समर्थक पूंजीवादी प्रचारतंत्र इसका खूब प्रचार करता है। इन मदों में वास्तव में कटौती का सरकार ने एक तरीका निकाल लिया है। वह यह कि इन मदों में वास्तविक खर्च बहुत कम किया जाता है। या तो इन मदों में सरकार पैसा देती ही नहीं है या फिर ऊपर से मौखिक आदेश के तहत संबंधित विभाग पैसा खर्च नहीं करते। किन्हीं मदों में तो यह कटौती अस्सी-नब्बे प्रतिशत तक पहुंच जाती है। साल के अंत में जब नये बजट में सरकार इनका संशोधित आंकड़ा पेश करती है तो कुछ आलोचकों के अलावा इस पर कोई चर्चा नहीं होती। पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी प्रचारतंत्र इस पर पूर्णतया चुप्पी साध जाता है। यानी जिन योजनाओं के लिए सरकार की वाहवाही हुई होती है, उन्हीं के लिए नये साल में फिर वाहवाही होती है पर पिछले साल में वास्तविक कटौती पर चुप्पी साध ली जाती है। पिछले साल प्रधानमंत्री के नाम की 19 योजनाओं में वास्तव में दस से पचास प्रतिशत की कटौती की गई। 
    
इसके ठीक उलट बजट में पूंजीपति वर्ग को सीधा फायदा पहुंचाने वाले आंकड़ों पर शुरू से ही चुप्पी साध ली जाती है। स्वयं सरकार बजट में इन आंकड़ों को इस तरह रखती है कि विशेषज्ञों के अलावा इन पर किसी की नजर न पड़े। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘रिविन्यू फोरगान’ का है यानी वह कर जिसकी वसूली नहीं हुई। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के जमाने से ही इस मद में कई लाख करोड़ रुपये के कर हर साल माफ होते रहे। ये अक्सर जनता की राहत पर होने वाले सारे खर्च के बराबर होते हैं। पर इन्हें चुपचाप बजट के परिशिष्ट में डाल कर छिपा दिया जाता है। वित्त मंत्री के बजट वक्तव्य में तो इस पर कभी भी चर्चा नहीं होती। 
    
इस तरह जनता पर खर्च की फर्जी घोषणाओं पर खूब चर्चा होती है पर पूंजीपतियों पर लुटाये गये वास्तविक धन की कोई बात नहीं होती। 
    
आंकड़ों की हेरा-फेरी के और बारीक तरीके भी हैं। मसलन सरकर ने ‘मध्यम वर्ग’ के आय कर पर जो छूट की घोषणा की उससे सरकार को करीब एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान बताया गया। लेकिन उसी समय वित्त मंत्री ने बताया कि इस साल आय कर में करीब दो लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होगी। इसके दो ही तरीके हो सकते हैं। या तो एक हाथ के बदले दूसरे हाथ से कान पकड़ा जाये यानी ‘मध्यम वर्ग’ से अन्य तरीकों से ज्यादा कर वसूला जाये। या फिर इस कर छूट की भरपाई के लिए इसका बोझ बाकी जनता पर डाला जाये। और पूरी संभावना है कि यही हो। 
    
यहीं से ‘मध्यम वर्ग’ को करों में छूट पर आया जा सकता है। बारह लाख रुपये सालाना कमाने वाले लोगों के आय कर पर पूरी छूट तथा चौबीस लाख रुपये सालाना आमदनी पर कर दरों में कुछ कटौती को ‘मध्यम वर्ग’ को राहत घोषित कर खूब प्रचारित किया गया। इसकी भांति-भांति से व्याख्या कर सरकार के पक्ष में माहौल बनाया गया। पर यहां दो बातें स्पष्ट हैं। एक तो यह कि यह ‘मध्यम वर्ग’ विशिष्ट ‘मध्यम वर्ग’ है। दूसरे, ‘मध्यम वर्ग’ को यह राहत आम मजदूर-मेहनतकश जनता की कीमत पर दी गयी। 
    
कई लोगों ने इस बात को रेखांकित किया है कि देश में एक लाख रुपया महीना कमाने वाले लोगों की संख्या अत्यन्त कम है। यह बामुश्किल चार या पांच प्रतिशत है। इसी तरह दो लाख रुपया कमाने वाले लोग बामुश्किल दो प्रतिशत हैं। स्वयं भारत सरकार की एक समिति के अनुसार (जो ठीक आय और उपभोग की असमानता के अध्ययन के लिए बनाई गयी थी) देश में केवल दस प्रतिशत लोग ही महीने में पच्चीस हजार रुपये से ज्यादा कमा पाते हैं। ऐसे में एक लाख या दो लाख रुपये महीना कमाने वाले लोग ‘मध्यम वर्ग’ की विशिष्ट श्रेणी में ही आते हैं। इसीलिए कुछ लोग इन्हें मध्यम वर्ग के बदले ‘अभिजात’ या ‘अमीर’ कहना पसंद करते हैं। कुछ भी हो यह स्पष्ट है कि आय करों में जिस छूट की घोषणा हुई है, उसका लाभ आबादी के सबसे ऊपर के चार-पांच प्रतिशत लोगों को ही मिलेगा। 
    
ऊपर के चार-प्रतिशत लोगों को यह लाभ शेष मजदूर-मेहनतकश जनता की कीमत पर ही मिलेगा। यह बजट के सामाजिक मदों में खर्चों की घोषणा से स्पष्ट है। अक्सर ही सामाजिक मदों में खर्चों में बढ़ोत्तरी महंगाई की दर से भी कम है तथा कई मदों में तो भारी कटौती की गई है। इसके ऊपर उस चीज को जोड़ लिया जाये जिसकी पहले चर्चा की गई है, यानी वास्तविक खर्च का बजट घोषणा से कम होना, तो तस्वीर और मुकम्मल हो जाती है। 
    
निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर की आम विशेषता ही यह रही है कि इसमें मजदूर वर्ग एवं अन्य मेहनतकश जनता की कीमत पर पूंजीपति वर्ग का मुनाफा और दौलत दोनों बढ़े हैं। बल्कि इन नीतियों का उद्देश्य ही यही था। इन सबका परिणाम यह हुआ है कि पूंजीपतियों की आय व सम्पत्ति में भारी बढ़ोत्तरी हुई है जबकि आम मजदूर-मेहनतकश जनता का जीवन स्तर गिरा है। सापेक्ष तौर पर तो यह गिरा ही है, अक्सर ही यह निरपेक्ष तौर पर गिरा है। काम के घंटों का बढ़ना, काम की सघनता का बढ़ना, मजदूरी का गिरना या स्थिर बने रहना, बेरोजगारी, छोटी सम्पत्ति वालों की तबाही, इत्यादि इस दौर की आम विशेषता है। हद तो तब हो गयी जब दुनिया भर के पूंजीपतियों ने 2008-09 के घनघोर आर्थिक संकट तथा कोविड महामारी के दौर में भी रिकार्ड मुनाफा कमाया। आक्सफैम नामक दानदाता संस्था साल-दर-साल इस खतरनाक स्थिति पर रिपोर्ट जारी कर दुनिया भर के पूंजीपतियों और सरकारों को चेता रही है। यह अलग बात है कि इनके कानों पर जूं भी नहीं रेंग रही है। 
    
भारत में भी यही हो रहा है। खासकर 2019 से बड़े पूंजीपतियों का मुनाफा सारी हदें पार कर रहा है। लाकडाउन के साल में जब सरकारी आंकड़ों के हिसाब से सकल घरेलू उत्पाद में सात प्रतिशत की गिरावट हुई तब बड़े पूंजीवादी घरानों का मुनाफा रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। दूसरी ओर ऊपर चर्चित ‘मध्यम वर्ग’ की आय में कुछ कमी ही आई। जैसा कि कई लोगों ने इंगित किया है, अपने कर्मचारियों को सत्तर-अस्सी या नब्बे घंटे, साप्ताहिक काम की नसीहत देने वाले पूंजीपतियों की कंपनियों में पिछले सालों में तनख्वाहों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है जबकि उनका मुनाफा रिकार्ड बढ़ा है। 
    
ऐसे में इस ‘मध्यम वर्ग’ में असंतोष पैदा होना लाजिमी था। पढ़े-लिखे ‘मध्यम वर्ग’ में पिछले महीनों में बड़े पूंजीपतियों और ‘मध्यम वर्ग’ की इस विपरीत गति की चर्चा आम हो गयी थी। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण का असली मतलब इस वर्ग को समझ में आने लगा था और वह हल्ला मचाने लगा। 
    
इस वर्ग के लिए आय करों में छूट सरकार द्वारा असल में इस असंतोष को कम करने की कोशिश है। यह वर्ग भाजपा का आधार भी है। अपने ही आधार वर्ग को नाराज करने का खतरा यह सरकार नहीं उठा सकती, भले ही बड़े पूंजीपतियों पर चाहे जितनी निर्भर हो। 
    
अब सवाल यह है कि इस ‘मध्यम वर्ग’ को यह राहत किसकी कीमत पर मिली? क्या पूंजीपति वर्ग की कीमत पर या मजदूर वर्ग या अन्य मेहनतकश जनता की कीमत पर? इसमें कोई दो राय नहीं कि यह राहत पूंजीपति वर्ग की कीमत पर नहीं मिली है। न तो पूंजीपतियों के आयकर की दरों में बढ़ोत्तरी हुई और न ही कारपोरेट करों में। इसी तरह पूंजीपतियों पर लगने वाले अन्य करों में भी कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। उल्टे खूब महंगे उपभोक्ता सामानों के आयात पर कर दर को जरूर घटाया गया जिसमें हवाई जहाज, कारें और मोटर साइकिल शामिल हैं। 
    
ऐसे में तार्किक निष्कर्ष यही है कि ‘मध्यम वर्ग’ को यह राहत आम मजदूर-मेहनतकश जनता की कीमत पर मिली है। आम मजदूर-मेहनतकश जनता को और ज्यादा निचोड़ कर ‘मध्यम वर्ग’ के असंतोष को कम करने की कोशिश की गयी है। 
    
वैसे निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर की यह आम विशेषता रही है कि इसमें पूंजीपति वर्ग को बेलगाम लूटपाट का जो मौका मिला था उसकी जूठन को मध्यम वर्ग के ऊपरी हिस्से को परोसा गया था। इससे मध्यम वर्ग के ऊपरी हिस्से की आमदनी और उपभोग तेजी से बढ़े। हालात ऐसे हो गये कि मध्यम वर्ग के नौजवान सुरक्षित सरकारी नौकरी के ऊपर असुरक्षित निजी क्षेत्र की नौकरी को तरजीह देने लगे। मध्यम वर्ग के निचले हिस्से भी, जिनकी विशाल बहुसंख्या थी, इसकी ओर ललचाई नजरों से देखने लगे। सरकारी बाबू का बेटा भी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रबंधक बनने का सपना देखने लगा। उधार पर उपभोग ने इसमें चार-चांद लगा दिये। इस सबने निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के समर्थन के लिए एक सामाजिक आधार पैदा किया। इनके शोर में इन नीतियों की शिकार विशाल बहुसंख्या की आवाज दबा दी गई। 
    
अब पिछले दस-पन्द्रह सालों से मध्यम वर्ग का यह ऊपरी हिस्सा भी पूंजीपति वर्ग की बेलगाम लूटपाट की आंच महसूस कर रहा है। ‘अन्ना आंदोलन’ इसी की एक अभिव्यक्ति था जब इस वर्ग की चिंता और आकांक्षा दोनों एक साथ अभिव्यक्त हुई। उसके बाद चिंता वाला पहलू बढ़ता गया है और आकांक्षा स्थितियों के दबाव में काफूर होती गयी है। जब आई आई टी और आई आई एम से निकले नौजवान बेरोजगार घूमने लगे तो आकांक्षा की हालत को समझा जा सकता है। जब ‘मध्यम वर्ग’ के ऊपरी हिस्से की तनख्वाहें भी गिरने लगें तो स्थिति की गंभीरता का अंदाज लगाया जा सकता है। 
    
हो सकता है कि आम-मजदूर मेहनतकश जनता की कीमत पर ‘मध्यम वर्ग’ को मिली राहत से यह वर्ग हाल-फिलहाल शांत हो जाये। पर आखिर कब तक? और वह भी जब कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था की हालत बद से बदतर होती चली जाये। यह राहत इस बदतरी में योगदान ही करेगी। 
    
आज पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की आम समस्या के साथ इसकी विशिष्ट समस्या सबके लिए स्पष्ट है- विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के लिए भी। वह यह है कि आम मजदूर-मेहनतकश जनता के जीवन स्तर को गिराकर बड़े पूंजीपति वर्ग का मुनाफा और धन बढ़ाया जा रहा है। यह बाजार में मांग की समस्या को और विकराल बना रहा है। अकूत मुनाफे और दौलत से सराबोर पूंजीपति वर्ग इसका समाधान आपूर्ति बढ़ाने में देख रहा है जो वास्तव में मांग की समस्या को और विकराल बना रहा है। 
    
भारत में पिछले दस सालों के सारे आंकड़े शहरी और देहाती दोनों क्षेत्रों में उपभोग के गिरने को दिखा रहे हैं। अक्सर सरकार इन आंकड़ों को दबा देती है। पूंजीवादी प्रचारतंत्र इस पर चुप्पी साधे हुए है। पर इससे कड़वी हकीकत तो गायब नहीं हो जायेगी। नतीजा यह है कि रोजमर्रा के उपभोग की चीजों को बनाने वाली कंपनियों के मालिक शिकायत करने लगे हैं कि मालों की खपत कम हो रही है। कारों जैसी चीजों की भी बिक्री घट रही है। हालांकि बहुत महंगी और आयातित चीजों की बिक्री बढ़ रही है जैसे एप्पल के फोन या महंगी आयातित कारें। 
    
ऐसे में अर्थव्यवस्था की विकास दर का धीमा हो जाना लाजिमी है। मांग कम होने पर देर-सबेर उत्पादन को कम होना ही है। तब पूंजी एक तो सट्टेबाजी की ओर बढ़ेगी, दूसरे मजदूर-मेहनतकश जनता की आय में कटौती की जायेगी। छोटी सम्पत्ति और छोटा व्यवसाय भी बड़ी पूंजी की चपेट में आयेंगे- सामान्य प्रतियोगिता के नियमों से इतर भी। 
    
अरविन्द सुब्रमणियम जैसे अर्थशास्त्री जो कभी मोदी सरकार के शुरूआती काल में मुख्य आर्थिक सलाहकार थे, कह रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले छः-सात साल से दो से ढाई प्रतिशत सालाना से ज्यादा नहीं है। ढेरों संकेतक इधर ही इशारा करते हैं। दूसरी ओर हाल के तीन-चार महीनों को छोड़कर शेयर बाजार चढ़ता ही जा रहा था। सरकार स्वयं मध्यम वर्ग तक को सट्टेबाजी की ओर धकेल रही थी। 
    
रही आम मजदूर-मेहनतकश जनता तथा छोटे व्यवसाय की बात तो केन्द्र सरकार द्वारा अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बांटना ही इस मामले में गंभीर स्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण है। बाकी सारी बातें और आंकड़े इसके सामने बेमानी हो जाते हैं। 
    
इस बजट में राजकोषीय और वित्तीय दोनों घाटों को घटाने की बात की गई है। राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 1.9 प्रतिशत से घटाकर 1.5 प्रतिशत किया जायेगा जबकि वित्तीय घाटे को 4.8 प्रतिशत से घटाकर 4.4 प्रतिशत किया जायेगा। देशी-विदेशी पूंजी तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की मांग भी यही है। लेकिन इसका सीधा सा मतलब यह होगा कि मजदूर-मेहनतकश जनता पर राहत के मदों में कटौती की जायेगी। यह मांग को और ज्यादा सिकोड़ेगी तथा अर्थव्यवस्था की मंदी को और ज्यादा गहरायेगी। 
    
चाहे जिस भी कोण से देखा जाये हालात गंभीर ही नजर आते हैं। स्वयं सरकार चलाने वाले भी इससे नावाकिफ नहीं हैं। इसीलिए वे अपने हिन्दू फासीवादी अभियान को और ज्यादा तेज कर रहे हैं जिससे लोगों का ध्यान इन गंभीर हालात से हटाया जा सके।    

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