सुबह-सुबह का सपना हर रोज पीठ पर पड़ने वाली धौल से टूटता। ‘सात बज गये कब उठेगा’? मां ने चादर खींचते हुए नवल को आवाज दी। ‘आज तो संडे है सोने दो न मम्मी’। चादर खींचते हुए मां से जिरह होती है। ‘उठता है या एक और लगाऊं। जा देख कर आ तेरे पापा सुबह-सुबह निकल गये हैं।
नवल जानता है पिता कहां मिलेंगे। हर संडे सुबह-सुबह ही लगा ली होगी। वहीं फोकट की दारू पीने वालों को इकट्ठा कर रखा होगा। मन ही मन ये सब सोचता हुआ सुबह के कामों से फारिग होकर नवल ने कच्ची दारू के अड्डे की थाह ली।
‘पापा घर चलो मम्मी बुला रही है।’ रावत जी जानते हैं उन्हें लिए बिना बेटा टलने वाला नहीं है लिहाजा मोटर साइकिल पर बैठना ही सही रहेगा। दो आंखें फोकटिया शराबियों पर पड़ी और नफरत से उन्हें घूरती हुई आगे बढ़ गयी।
सुपरविजन की धूर्तता के किस्से बचपन से कोफ्त पैदा करते। फोकटिया दारू पीने वालों के प्रति एक नफरत जीवन का हिस्सा बन चुकी और शराब, शराब से एक घृणा बचपन से ही जिन्दगी ने उपहार रूप में दे दी थी। पिता जो कि फैक्टरी के भीतर की सडांध की उपज थे तो वहीं नवल उस सडांध के प्रति नफरत लेकर पला-बढ़ा था।
पत्नी इन हरकतों से आजिज आ चुकी है ‘‘तुम्हें घर में जगह नहीं मिलती। एक दिन छुट्टी का मिलता है और सुबह से थैली चढ़ा लेते हो। इतनी अच्छी तनख्वाह, अफसर की नौकरी ये कच्ची थैली ही रह जाती है पीने को।
रावत जी शराब फैक्टरी में सुपरवाइजर हैं अच्छी तनख्वाह है। अफसर गिरी के साथ मुफ्त की शराब भी जबान को लग गयी। जब छुट्टी पर रहते कच्ची शराब से काम चलाते। और दिन भर टुन्न रहते। बीते कई सालों से बदस्तूर यही चल रहा है।
शाम ढलते-ढलते आज तबियत बिगड़ गयी। ‘‘बेटा डाक्टर को बुला ला आज दिन से उल्टियां कर रहे हैं। चिंतातुर होते हुए मां के शब्द नवल के कान पर पड़े जो कहीं घूमने गया था।
डाॅक्टर आया, इंजेक्शन दिया गया कुछ देर भीतर का जहर शांत रहा फिर एकाएक उबाल बन कर बाहर फूट पड़ा। पहले अधपचा खाना, फिर पानी और अंत में धमनियों में बहने वाला लाल द्रव अपनी सीमाएं लांघ मुंह से निकल पड़ा। रात ढलते-ढलते रावत जी ने पत्नी और बेटे के सर पर आखिरी बार हाथ रखा और संसार को अलविदा बोल दिया।
पाॅलीटेक्निक का ये आखिरी साल है। ‘अब इसके आगे क्या सोचा है’? पार्क में बैठे हुए मित्र ने सवाल किया। नवल की आंखें पेड़ पर उछल-कूद मचाती गिलहरी पर टिकी है। ‘देखो किस पेड़ की डाल पर बसेरा बसे। इसके बाद तो बस नौकरी ढूंढनी है। शांत और गहरी आवाज।
पाॅली पूरा हुआ मगर नौकरी की तलाश इस शहर में न हो सकी, दूसरे शहर में एक प्राइवेट लिमिटेड फैक्टरी में मशीन आपरेटर का काम मिला है, कैजुअल मजदूर है।
मशीन चलाते हुए एक तेज आवाज ने नवल का ध्यान खींचा। ‘हर बात में टच क्यों करते हो, जो काम बोलना है बोलो यूं टच करना मुझे अच्छा नहीं लगता। अगली बार ठीक नहीं होगा तुम्हारे लिए। ये दीप्ति की आवाज थी जो नीम ट्रेनी के रूप में कुछ महीने पहले आई थी। उस दिन पहली दफा इस बेबाक और निडर लड़की से नवल की मुलाकात हुई थी जो अपने सुपरवाइजर की बदतमीजी का उत्तर दे रही थी। बहुत खूब बहादुर लड़की! अनायास ही नवल के मुंह से निकला।
कुछ दिन बीते आज दीप्ति की ड्यूटी नवल की मशीन पर है। ‘‘अच्छा सबक सिखाया तुमने उस गलीज सुपरवाइजर को’’। दीप्ति को संबोधित करते हुए नवल ने बात पूरी की। आज पहला मौका है जब नवल ने बातचीत शुरू की थी। हालांकि इससे पहले ही नवल के प्रति प्रेम, आकर्षण की एक दबी हुयी अनुभूति इस बहादुर लड़की की आंखों में जन्म ले चुकी थी।
‘‘वी आर नाट युअर स्लेव’’ कैंटीन में खाना खाते समय एक गरजती हुई नवल की आवाज दीप्ति के कानों में पड़ी थी। ये शब्द सुपरवाइजर के लिए संबोधन था। एक दुबला पतला नौजवान अपने मजदूर साथियों के लिए अड़िगता से खड़ा था। इस गम्भीर दिखने वाले चेहरे के पीछे एक भावुक दिल धड़कता है और गलत के प्रतिरोध का हौसला रखता है। उस दिन पहली दफा दीप्ति को इस बात की अनुभूति हुई थी।
आज जब खुद नवल ने बातचीत शुरू की जो शिफ्ट खत्म होने तक चलती रही। और बातचीत के सफर का यह सिलसिला कम्पनी की सीमाओं को लांघ गया।
नवल- ‘‘तो पापा तुम्हारे बचपन में ही गुजर गये थे।’’। रेस्तरां में बैठे हुए दो मजदूर आपसी बातचीत में मशगूल हैं। स्ट्राॅ से सुड़प-सुड़प की आवाज आ रही है। ब्रेसलेट के नग को छूते हुए नवल ने जानना चाहा।
दीप्ति- स्ट्राॅ से मुंह हटाकर। हां मां घरों में काम करती है, कभी खेतों में दिहाड़ी भी। जैसे-जैसे इंटर पास किया उसके बाद फिर नौकरी।
नवल- तो क्या तुम्हारा फैसला मंजूर होगा उन्हें। नवल प्रश्न भरी निगाहों से दीप्ति की तरफ देखता रहा।
दीप्ति- खुश तो नहीं होंगी, वो तो यही चाहती हैं कि अपनी बिरादरी में अपने तरीके से शादी हो। शायद तुम्हारी मम्मी भी ऐसा ही सोचती हों।
नवल- हम्म! हां लेकिन सही रास्ता तो यही है जो हमने चुना है। पुराने के नाम पर भविष्य को आग लगाना कोई समझदारी तो नहीं है।
दीप्ति- पहले शौक था बैंड-बाजा बारात, गहने कपड़े अब लगता है कि ये सब दिखावा है। ये पल भर का दिखावा और जिंदगी भर की गुलामी मुझे मंजूर नहीं है। दो लोगों के बीच परस्पर प्रेम और बराबरी जरूरी है। तुमने बता दिया है मम्मी को। दीप्ति का प्रश्न।
नवल- हां! थोड़ा दुःखी हैं। खैर छोड़ो! चलो चलें देर हो गयी है। जिंदगी तो हमें एक साथ जीनी है। रेस्ट्रां का बिल दिया गया।
बिना किसी दिखावट के, बिना पण्डित-बारात के हुयी शादी लम्बे समय तक चर्चा का विषय बन गयी। पुराने कमरे को छोड़कर दो प्रेमी जोड़े साफ-सुथरे बड़े कमरे में आ गये हैं। शादी की खबर दोनों ने घर पर फोन से दी। नवल की मां हफ्ता भर रुक कर गयीं। दीप्ति से मिलकर खुश थी।
नवल- क्या कहा मम्मी ने रुकने के नाम पर। खाने के दो टिफिन पैक करते हुए नवल ने पूछा। ?
दीप्ति- कह रही थीं कि तू तो सुबह निकल जाती है रात को आती है मैं बुढ़िया दिन भर क्या करूंगी अकेले।
नवल- साइकिल जाने को तैयार है। बैठने का इशारा करते हुए। फिर?
दीप्ति- कह रही थीं कि जब कोई खुशखबरी सुनाएगी तब आऊंगी। कम से कम कुछ महीने तेरे साथ रहने का मौका तो मिलेगा।
नवल- फिर तुमने क्या कहा? एक हल्की मुस्कुराहट। (एक शरारत भरी मुस्कराहट)
दीप्ति खामोशी से मुस्कुरा रही है। उसकी आंखें इस रेल पेल भरी सड़क में खूबसूरती बिखेर रही थी। कुछ छेड़ने के अंदाज में नवल ने पुनः पूछा। तभी उसे चिंगूटी काटने का अहसास हुआ। धीरे-धीरे साइकिल की रफ्तार तेज होती गयी।
-पथिक