मोदी ये ना करे तो क्या करे

आम चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद कुछ ऐसा हुआ कि मोदी एण्ड कम्पनी को लगने लगा कि चुनाव जीतना है तो अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा। मोदी का ब्रह्मास्त्र क्या था। मुसलमानों को राक्षस, आक्रान्ता आदि के रूप में दिखाओ और हिन्दुओं का भयादोहन करो। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा हवा-हवाई नारा था। असल नारा तो मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’, ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने वाला’ आदि गालियां देना है। ‘वोहरा मुसलमान’, ‘शिया मुसलमान’, ‘पसमांदा मुसलमान’ जिनको कल तक मोदी-भाजपा-संघ को अपने खेमे में लाना था अब सब घुसपैठिये, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हो गये। पहले चरण के मतदान के तुरंत बाद मोदी ने अपने चेहरे पर अपने आप चढ़ा हुआ नकाब खुद ही उतार फेंका। दूसरे, तीसरे, आदि चरण के बाद मोदी का कौन सा चेहरा सामने होगा। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, साम्प्रदायिक उन्माद के लिए अब और खराब बातें मोदी एण्ड कम्पनी करेगी। 
    
असल में मोदी ये ना करे तो क्या करे। यही उनका चुनाव जीतने का मूल मंत्र रहा है। गुजरात से लेकर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा ऐसे ही किया गया है।  

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।