नोबेल शांति पुरस्कार व आई सी सी पर नये हमले

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
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2026 का नोबेल शांति पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आई सी सी) की पूर्व न्यायधीश नवी पिल्ले को मिला है। नवी पिल्ले भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी महिला हैं। नवी पिल्ले को यह पुरस्कार शांति व अंतर्राष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के नाम पर मिला है। नवी पिल्ले ने द.अफ्रीकी हाईकोर्ट, रवांडा के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल व अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में जज के बतौर काम किया। वे मानवाधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की हाई कमिश्नर थीं और उन्होंने हाल मंे ही फिलिस्तीनी क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता की थी। 
    
नवी पिल्ले कानूनी उपायों से युद्ध व हिंसा रोकने की प्र्रवक्ता रही हैं और अंतर्राष्ट्रीय कानून की संस्थाओं की मजबूती की पक्षधर रही हैं। एक ऐसे वक्त में जब संयुक्त राष्ट्र व उसकी तमाम संस्थायें देशों के बीच के झगड़ों को रोकने में पंगु साबित हो रही हों; जब अमेरिकी साम्राज्यवादी इन संस्थाओं को ताक पर रखकर अपने अंतर्राष्ट्रीय युद्ध अभियान छेड़े हुए हों; जब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के वारंटों को दो कौड़ी का माना जा रहा हो, तब इस संस्था की एक पूर्व न्यायधीश को नोबेल शांति पुरस्कार देना दरअसल मौजूदा साम्राज्यवादी व्यवस्था के असली चरित्र पर पर्दा डालने का प्रयास है। 
    
यह प्रयास दुनिया में यह झूठ फैलाने की कोशिश से प्रेरित हैं कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन से मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया में शांति कायम हो सकती है। जबकि संयुक्त राष्ट्र का बीते 7-8 दशकों का इतिहास ही यह बताने को काफी है कि साम्राज्यवाद का अर्थ ही है युद्ध। और युद्धों के खात्मे-स्थायी शांति के लिए साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का खात्मा जरूरी है। बीते 2-3 दशकों में अमेरिकी व चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों की प्रतिद्वन्द्विता ने तो इन अंतर्राष्ट्रीय कानूनों व संस्थाओं को एकदम नकारा बना दिया है। ये न्यायालय आदेश देते रहते हैं पर कोई उन्हें सुनने वाला नहीं है। वे नेतन्याहू-पुतिन के गिरफ्तारी वारंट जारी करते हैं पर दोनों खुलेआम दुनिया भर में घूमते रहते हैं। 
    
नवी पिल्ले व उसका अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय रंगभेद, फिलिस्तीनियों के उत्पीड़न की चाहे जितनी अच्छी व्याख्या कर ले, जितने भी फैसले सुना ले, आज इन्हें कोई मानने वाला नहीं है। नोबेल शांति पुरस्कार भी इन संस्थाओं से शांति कायम करने की झूठी प्रेरणा नहीं पैदा कर सकता। 
    
आज हालात साम्राज्यवादी प्रतिद्वन्द्विता में इस कदर बुरे हो चुके हैं कि एक के बाद एक देश अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय से अपना समर्थन वापस ले रहे हैं। 2002 में जब अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आई सी सी) की शुरूआत हुई तो दुनिया के तमाम देशों ने इसे नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध पर मुकदमा चलाने की मान्यता दी। रोम संधि के जरिये इसे व्यक्तियों पर मुकदमा चलाने व उनकी गिरफ्तारी का अधिकार मिला। लगभग दो तिहाई देशों ने रोम संधि पर हस्ताक्षर किये। पर अमेरिकी साम्राज्यवादी शुरू से ही इस न्यायालय के प्रति सतर्क व आशंकित रहे। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने रोम संधि पर हस्ताक्षर तो किये पर अमेरिकी सीनेट से इसका अनुमोदन यह कहते हुए नहीं कराया कि इसमें कई कमियां हैं और यह अमेरिकी अधिकारियों की सुरक्षा के मामले में असमर्थ है। 2002 मेें जार्ज बुश ने इस संधि को अस्वीकृत कर दिया। ट्रम्प ने भी आई सी सी की खुलेआम निन्दा की और इसे अमेरिकी हितों के खिलाफ बताया। 
    
रूसी साम्राज्यवादियों का रुख भी इसी तरह का रहा। शुरू में रोम संधि पर हस्ताक्षर के बाद शीघ्र ही उन्हें भी इस संधि से पल्ला झाड़ना पड़ा। 2014-15 में यूक्रेन द्वारा आई सी सी में यूक्रेन में रूसी युद्ध अपराधों की जांच करने की अपील के बाद रूस इस संधि से पीछे हट गया। 2023 में आई सी सी ने पुतिन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। यह वारंट हजारों यूक्रेनी बच्चों के अपहरण के आरोप में जारी किया गया। 
    
इसी तरह आई सी सी ने नवंबर 2024 में फिलिस्तीन में युद्ध अपराधों के लिए नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया। 
    
अमेरिका-रूस के आई सी सी से पीछे हटने के बाद वेनेजुएला-चाड़ ने रोम संधि से नाम वापस ले लिया। बुर्किना फासो, माली, नाइजर भी इससे पीछे हट चुके हैं। 
    
अभी जब नवी पिल्ले को नोबेल शांति पुरस्कार मिला तो अमेरिकी सरगना ट्रम्प खुद को नोबेल पुरस्कार न मिलने से खफा हो गये। ट्रम्प बीते 2 वर्षों से खुद को नोबेल शांति पुरस्कार देने का दावा करते रहे हैं। वे दावा करते रहे हैं कि उन्होंने 8 युद्ध रुकवाये हैं। अब नोबेल न मिलने से खफा होकर अमेरिकी सरकार के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने आई सी सी को भ्रष्ट न्यायालय की संज्ञा देते हुए इसे संसाधन रहित बनाने की धमकी दे दी है। 
    
कुल मिलाकर आई सी सी का यह हश्र बढ़ते साम्राज्यवादी टकराव के बीच लाजिमी ही था। नोबेल पुरस्कार देकर इस हकीकत को छुपाया नहीं जा सकता कि साम्राज्यवाद के रहते वैश्विक शांति असम्भव है।  

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