पंजाब बाढ़ : दोषी कौन

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वैसे तो इस वर्ष अगस्त-सितम्बर माह में पंजाब, उत्तराखण्ड, हिमाचल, जम्मू और कश्मीर समेत कई राज्य आपदाओं के शिकार हुए हैं पर सबसे ज्यादा प्रभावित पंजाब हुआ है। 

पंजाब की 4 प्रमुख नदियों में आयी बाढ़ से 23 जिलों के 2000 से अधिक गांव प्रभावित हुए है। लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। 50 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। करीब 4 लाख एकड़ फसल के चौपट होने की बात सामने आ रही है। मरने वाले पशुओं और ध्वस्त हुए मकानों का तो अभी आंकड़ा भी सामने नहीं आया है। यहां यह ध्यान रहे कि पाकिस्तान के पंजाब में बाढ़ के हालात कहीं ज्यादा खराब हैं जहां सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। 

इन बुरे हालातों में पंजाब ही नहीं समूचे देश से जनता हर तरह की मदद भेजकर भाईचारे की मिसाल कायम कर रही है। वहीं सरकारी राहत ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। 

अगर बाढ़ के कारणों की बात करें तो लगभग ऐसी ही बाढ़ 1988 में आयी थी। तब भी सरकारों की गलतियां चिन्हित हुई थी और इस बाढ़ के पीछे भी लगभग उन्हीं गलतियों का दोहराव चिन्हित हो रहा है। वैसे पंजाब में 1947 से 2025 तक 13 बार बड़ी बाढ़़ें आ चुकी हैं। हाल में 2019 व 2023 में भी यहां बाढ़ आयी थी। 

अब इतने बाढ़ प्रभावित इलाके में बाढ़ नियंत्रण व आपदा प्रबंधन के उपाय बेहद जरूरी हैं। हर वर्ष बारिश से पूर्व तटबंधों की मरम्मत, बांधों का रख रखाव, नदियों-नहरों की सफाई उनसे गाद की निकासी जरूरी है। क्योंकि पहाड़ों से आने वाली रेत के कारण नदियों का तल ऊंचा हो जाता है। पर सरकारी मशीनरी इस मामले में घोर लापरवाही बरतती रही है। नतीजा यह है कि जो नदियां 8 लाख क्यूसिक पानी संभाल सकती थी वे अब एक बार में 1.5 लाख क्यूसेक पानी भी नहीं ले जा पा रही हैं। नदियों का तल ऊंचा होने से तटबंधों पर जल्दी दबाव पड़ता है और वे टूट जाते हैं। 
    
जहां नदियों-नालों से गाद तो साफ नहीं की जाती पर तटबंधों के करीब रेत खनन का धंधा जोरों पर बेतरतीब ढंग से चलता है। इस रेत खनन से हर वर्ष करोड़ों रु. सरकार-नेताओं के जेब में जाते हैं। नतीजा यह होता है कि बड़े-बड़े गड्ढे तटबंधों के करीब बन जाते हैं और जब बाढ़ का पानी आता है तो गड्ढों से कमजोर हुए तटबंधों को बहा ले जाता है। 
    
इसी के साथ सरकारें तरह-तरह के निर्माण को बढ़ावा दे रही हैं जो नदियों के प्राकृतिक बहाव को रोकते हैं। इसमें सड़कें सर्वप्रमुख हैं। राजमार्ग बनाते हुए अधिकारी व सरकारें नदियों के बहाव का ध्यान रखे बगैर इन्हें बना देते हैं। फिर नदियों के पानी से सड़कें बचाने के लिए बहाव दूसरी दिशा में मोड़ा जाता है जो भारी तबाही पैदा करते हैं।
    
इसके साथ ही विकास के नाम पर बड़े-बड़े बांध बनाते वक्त इससे पैदा होने वाले संभावित विनाश को ध्यान में नहीं रखा जाता। यहां तक कि नदियों के 100-200 वर्षों के पैटर्न, बाढ़ की संभावना की भी कायदे से गणना नहीं की जाती। परिणामतः कभी भी बाढ़ की आपदा आती रहती है। पहाड़ों में भूकम्प के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में भी बांध बना नई आपदा का इंतजाम किया जाता है। निश्चय ही बिजली व सिंचाई आदि के लिए छोटे-बड़े बांध बनने चाहिए पर इसका निर्माण करते वक्त भौगोलिक व प्राकृतिक खतरों का ध्यान रखना चाहिए व संवेदनशील जगहों पर बड़े बांधों की तुलना में छोटे-छोटे बांधों की ओर भी कदम बढ़ाये जा सकते हैं। बड़े बांध बनाते वक्त इस बात का इंतजाम होना चाहिए कि बांध से छोड़ा गया पानी कभी भी आस-पास बाढ़ न ला सके जैसा कि पंजाब में इस वक्त हुआ। 
    
लापरवाही की हद तो तब हो जाती है जब बांधों में पानी होने के बावजूद नहरों में पानी की मांग के बावजूद पानी नहीं छोड़ा जाता। वह भी तब जब मौसम विभाग भारी बारिश की चेतावनी जारी कर चुका था। अगर बांधों का कुछ पानी समय रहते छोड़ दिया जाता तो बारिश के चलते नदी में आया पानी बांधों में उस स्तर पर नहीं पहुंचता जिसे एक झटके में छोड़ने पर इतनी भारी तबाही आती। इस पर भी कोढ़ में खाज यह कि पानी छोड़ने से पहले सरकार ने संभावित डूबने वाली आबादी को सचेत करने, सुरक्षित जगहों पर जाने की सूचना देने की भी जरूरत नहीं समझी। अगर वक्त रहते यह सूचना दी जाती और लोगों-जानवरों को व अन्य महत्वपूर्ण चीजों को हटा दिया जाता तो नुकसान को कम किया जा सकता था। 
    
बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाने, जान बचाने, लोगों की निकासी के मामले में सरकारों का हाल और बुरा रहा। पंजाब सरकार केन्द्र को कोसती रही और केन्द्र सरकार चुप बैठी रही। राज्य की आप सरकार केन्द्र से मदद के इंतजार में रही। उसके पास आपदा प्रबंधन का 12,000 करोड़ रु. पड़ा है पर केन्द्र के पुराने नियमों के चलते वह उसे खर्च नहीं कर सकती। वह नियम बदलने की मांग करती रही पर अपने पल्ले से बाढ़ राहत पर कुछ खर्च को तैयार नहीं हुई। वहीं मोदी सरकार काफी देर से महज 1600 करोड़ रु. की मदद की घोषणा कर शांत हो गयी। 
    
केन्द्र व राज्य सरकार दोनों का रुख लोगों की मदद से ज्यादा एक दूसरे पर आरोप लगाने का बना हुआ है। वह तो आम जनता का भाईचारा व पूरे देश से आ रही मदद है जिस के दम पर बाढ़ से निपटा जा रहा है। 
    
वैसे भी सरकारी महकमा मोदी के आपदा में अवसर फार्मूले पर चल बाढ़ में कमाई ढूंढ़ता है। सरकारी मदद हर बार भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती है। 
    
स्पष्ट है कि पूंजीवादी विकास के एजेण्डे पर पूंजीपतियों की जरूरतें-मुनाफे हैं आम जन नहीं। ऐसे में पूंजीवादी व्यवस्था ऐसी आपदायें लाती रहेंगी। जन विरोधी केन्द्र-राज्य सरकारें व सरकारी महकमे की लापरवाहियां लोगों को बेवजह मौत के मुंह में डालती रहेंगी। 
    
पंजाब की जनता के इन मुश्किल हालातों में उसके साथ खड़े होने, उसकी मदद में हर संभव प्रयास करने की जरूरत है। साथ ही साथ इन आपदाओं के लिए दोषी सरकारों-सरकारी महकमे व पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ भी संघर्ष तेज करना जरूरी है। 

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