नेपाल की हालिया घटनाओं के बाद उदारवादी और वाम-उदारवादी एक स्वर से कह रहे हैं कि हमारे यहां ऐसा नहीं हो सकता। इसके लिए भांति-भांति के तर्क दिये जा रहे हैं।
इनके द्वारा ऐसा कहे जाने के पीछे इनकी सोच भी हो सकती है और इनका डर भी। ऐसा यहां भी हो सकता है, यह कहने का मतलब सरकार द्वारा यह निकाला जा सकता है कि लोगों को विद्रोह के लिए भड़काया जा रहा है। हिन्दू फासीवादी सरकार के लिए दमन का यह अच्छा बहाना हो सकता है। ऐसे में डरना स्वाभाविक है।
लेकिन ये लोग भी ‘ऐसा यहां नहीं हो सकता’ कहते हुए अपने देश के हालात के बारे में जो कहते हैं वह ठीक उल्टे निष्कर्षों की ओर ले जाता है। उनसे यही स्थापित होता है कि भारत के भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं। एक लोकतंत्र के मामले में ही भारत थोड़ा भिन्न है, पर हिन्दू फासीवादियों के राज में यह फर्क भी मिटता जा रहा है।
पिछले चार सालों में भारत के परिधि के देश एक के बाद एक जन विद्रोह या राजनीतिक उथल-पुथल के शिकार हुए हैं। इसकी शुरूआत 2021 में म्यांमार (बर्मा) से हुई थी जहां सेना ने चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट कर सत्ता अपने हाथों में ले ली। तब से आज तक वह देश राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है और उत्तर के बड़़े हिस्से में हथियारबंद विद्रोह चल रहा है।
इसके एक साल बाद 2022 में श्रीलंका में जन विद्रोह हुआ और राजपक्षे सरकार को न केवल इस्तीफा देना पड़ा बल्कि उन्हें देश छोड़कर भागना भी पड़ा। अभी दो साल पहले वे करीब साठ प्रतिशत वोट से जीते थे। जन विद्रोह में उनका सिंहली बौद्ध राष्ट्रवाद हवा हो गया।
2023 में पाकिस्तान राजनीतिक उथल-पुथल से गुजरा जिसकी शुरूआत 2022 में ही हो गयी थी। पाकिस्तानी सेना के दुलारे और उनकी मदद से सत्ता में काबिज इमरान खान की किसी वजह से सेना से खटक गयी और संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिये वे सत्ता से बाहर हो गये। पर इमरान खान ने इसे स्वीकार नहीं किया और 2023 में उनके समर्थक विद्रोह पर उतर आये। सेना की मदद से इस पर काबू पा लिया गया पर जन असंतोष भीतर ही भीतर सुलग रहा है।
इसके बाद बारी आई बांग्लादेश की। 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना की अवामी लीग की सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आये और अंत में शेख हसीना को भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था जन असंतोष को शांत न कर सकी बल्कि उसे और बढ़ाने का कारण बन गयी।
और अब 2025 में नेपाल! सात सितम्बर तक किसी को गुमान नहीं था कि दो दिन बाद न केवल सरकार चली जायेगी बल्कि तीनों प्रमुख पार्टियों के नेताओं व उनके घरों पर हमले होंगे। संसद और सर्वोच्च न्यायालय तक को आग के हवाले कर दिया जायेगा।
नेपाल का जन विद्रोह बाकियों से थोड़ा इस रूप में भिन्न है कि इसमें केवल सत्ताधारी पार्टी जन विद्रोह के निशाने पर नहीं थी। बल्कि अन्य प्रमुख पार्टियां और उनके नेता भी उनके निशाने पर थे। यही नहीं, दो पूर्व प्रधानमंत्री (झालनाथ खनाल और बाबूराम भट्टाराई) भी इनके निशाने पर थे, हालांकि आज नेपाली राजनीति में इनकी कोई हैसियत नहीं है।
सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का जन विद्रोह के निशाने पर होना जहां इनके प्रति जन आक्रोश की अभिव्यक्ति था वहीं इस बात का संकेत भी कि जन विद्रोह का फायदा उठाकर कुछ अन्य शक्तियां अपना खेल खेल रही हैं। गौरतलब है कि न तो सेना को निशाना बनाया गया और न सेना ने संसद, सर्वोच्च न्यायालय तथा अन्य सरकारी भवनों की रक्षा की जबकि इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना की ही थी। दूसरी ओर राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को निशाना नहीं बनाया गया। पहली राजतंत्र समर्थकों की पार्टी है जबकि दूसरी के नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद थे जिन्हें जन विद्रोह का फायदा उठाकर जेल से छुड़ा लिया गया। इनके खिलाफ मुहिम चलाने वाले देश के सबसे प्रमुख मीडिया समूह ‘कांतिपुर टाइम्स’ के दफ्तर को आग के हवाले कर दिया गया।
इस समय अटकल बाजी जोरों पर है कि नेपाल में जन विद्रोह का फायदा उठाकर अमरीकी साम्राज्यवादियों और भारत के हिन्दू फासीवादियों ने अपने मंसूबों को परवान चढ़ाने का प्रयास किया। यहां तक कि जन विद्रोह को भड़काने में भी इनकी सक्रिय भूमिका की बात की जा रही है। ओली सरकार चीन की ओर झुकी हुई थी जो भारत और अमरीकी सरकार दोनों को पसंद नहीं था। भारत में हिन्दू फासीवादी तो खुलेआम राजतंत्र की वापसी के आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर जिस प्रतिबंध से सारा मामला भड़का उसकी ज्यादातर कंपनियां अमरीकी हैं। ऐसे में अमरीकी साम्राज्यवादियों का नाराज होना स्वाभाविक था।
यदि ये सारी अटकलबाजियां सच भी हों तो भी इसमें कोई अनोखी बात नहीं है। दुनिया भर के सारे जन विद्रोहों में यह सब होता रहता है। भांति-भांति की शक्तियां अपने-अपने हित में किसी देश में सक्रिय होती हैं। वे जन आक्रोश को दबाने या भड़काने का प्रयास करती हैं। इसी तरह एक बार जन विद्रोह शुरू हो जाने पर ये शक्तियां उसका फायदा उठाने का प्रयास करती हैं। उसे खास दिशा में मोड़ने का प्रयास करती हैं।
इन सबसे यह सत्य खारिज नहीं हो जाता कि किसी भी देश में जन विद्रोह का मूल प्रेरक तत्व आंतरिक होता है। आंतरिक हालात कुल मिलाकर वहां पहुंचते हैं जहां जन विद्रोह की संभावना पैदा हो जाती है। बाहरी शक्तियां तो इसमें बस गौण भूमिका ही निभाती हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो किसी भी देश में रोज-रोज जन विद्रोह होते रहते क्योंकि किसी न किसी बाहरी शक्ति का इसमें हित होता है।
अस्तु, जन विद्रोह का मूल कारण आंतरिक होता है। जब जन में यह भावना व्यापक तौर पर घर कर जाती है कि जीवन असहनीय हो गया है तथा इसके जिम्मेदार सत्ताधारी लोग हैं तब छोटी से छोटी बात भी चिंगारी का काम कर जाती है। लोग सड़कों पर उतर आते हैं और जन विद्रोह शुरू हो जाता है।
‘जीवन असहनीय हो गया है’ में सबसे बड़ा कारक आर्थिक होता है। जब ज्यादातर आबादी के आर्थिक हालात बेहद खराब हो जाते हैं तथा बेहतरी की कोई उम्मीद नजर नहीं आती तो लोगों में भीतर ही भीतर असंतोष बढ़ने लगता है। जितना लोग हालात के और ज्यादा बदतर होने के खिलाफ संघर्ष करते जाते हैं उतना ही असंतोष बढ़ता जाता है।
इस मामले में एक गलतफहमी से निजात पाने की जरूरत है। आर्थिक हालात निरपेक्ष तौर पर भी खराब हो सकते हैं और सापेक्ष तौर पर भी। अक्सर लोग निरपेक्ष तौर पर हालात खराब होने को तो स्वीकार करते हैं पर सापेक्ष तौर पर खराब होने को नहीं। यानी जब लोगां की आय या क्रय शक्ति घट जाये तभी इसे स्वीकार किया जाता है। लेकिन आय या क्रय शक्ति बढ़ने पर भी हालात खराब हो सकते हैं।
आज ‘एस्पिरेशनल क्लास’ की काफी चर्चा होती है। यहां आशय उस युवा वर्ग से होता है जो अपनी स्थिति को बेहतर बनाने की अभिलाषा रखता है। यह वर्ग जब अपनी स्थिति को बेहतर नहीं बना पाता तो उसे भारी निराशा होती है। और जब पाता है कि उसके आस-पास के लोग आगे बढ़ गये हैं तो वह भारी आक्रोश से भर जाता है। ऐसा होते समय कोई जरूरी नहीं कि उसकी आय और क्रय शक्ति में कमी आई हो। दूसरों की आय और क्रय शक्ति में बढ़ोत्तरी स्वतः ही उसकी अपनी हैसियत को नीची कर देती है। नेपाल में नेताओं के बेटे-बेटियों की आलीशान जिन्दगी देखकर गुस्से से भर जाने वाले युवाओं की अपनी हैसियत उनके मां-बाप के जमाने से खराब हुई हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन उनकी अपनी जिन्दगी में थोड़ी सी बढ़ोत्तरी शासकों के जीवन में आसमान छूती बढ़ोत्तरी के मद्देनजर स्वतः बदतरी में तब्दील हो जाती है।
यहीं से दूसरे अन्य कारक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। लोगों को लगने लगता है कि उनके साथ धोखाधड़ी हो रही है। राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता जनता के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं। वे जनता के साथ वायदा कुछ करते हैं और व्यवहार में कुछ और करते हैं। लोगों में छले जाने का भाव तीखा होने लगता है। भ्रष्टाचार के प्रति घोर नफरत के पीछे यही छले जाने का भाव होता है। किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा किये जाने वाले भ्रष्टाचार के मामले में छले जाने का भाव नहीं होता। वहां बस आर्थिक नुकसान, काम में देरी, इत्यादि से चिढ़ होती है। पर राजनीतिक पार्टियों और नेताओं द्वारा भ्रष्टाचार का मामला कुछ और हो जाता है।
आम जन में ये स्थितियां असहाय और असंतोष दोनों के भाव को एक साथ पैदा करती हैं। समूचे तंत्र के सामने व्यक्ति असहाय महसूस करता है। ‘कुछ नहीं हो सकता’ का भाव यहीं से पनपता है। पर यह भीतर ही भीतर घनीभूत हो रहे असंतोष को कम नहीं करता। असंतोष का लावा बढ़ता रहता है और एक दिन वह असहायता के ढक्कन को तोड़कर बाहर निकल पड़ता है। जन विद्रोह अपने सामने आने वाली हर चीज को बहा ले जाता है।
आज ये स्थितियां कमोवेश दुनिया के सभी देशों में हैं। दुनिया के सारे ही देशों में व्याप्त राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता इसकी एक अभिव्यक्ति है तो धुर दक्षिणपंथ व फासीवाद का उभार दूसरी। यहां उन बीसियों देशां की बात ही नहीं हो रही है जो सीधे-सीधे गृहयुद्ध में उलझे हुए हैं।
बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता तथा धुर-दक्षिणपंथ का उभार यह दिखाता है कि पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर के तमाम ‘सेफ्टी वाल्व’ अब काम करना बंद कर रहे हैं। ‘प्रेशर’ या तनाव बढ़ रहा है तथा भांति-भांति से फूट रहा है।
अपने देश की बात करें तो हिन्दू फासीवाद का उभार ही देश की पूंजीवाद व्यवस्था के घनीभूत होते संकट की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। यह उभार यह दिखाता है कि देश का पूंजीवादी लोकतंत्र देश को नहीं संभाल पा रहा है। देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग इस खतरे को देख रहा है और अपनी व्यवस्था की रक्षा की खातिर हिन्दू फासीवादियों को सत्ता में बैठा रहा है। आज वह उन्हें सत्ता में बनाये रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।
जो लोग यह सोचते हैं कि भारत में पड़ोसी देशों जैसा जन विद्रोह नहीं हो सकता वे हिन्दू फासीवादियों के उभार के निहितार्थ को समझने में पूर्णतया अक्षम हैं। हिन्दू फासीवादियों का उभार उन्हें भारत के पूंजीवादी लोकतंत्र का एक विक्षेप लगता है। उन्हें लगता है कि इस लोकतंत्र में इतनी ताकत है कि वह इस विक्षेप को आत्मसात कर लेगा। वे यह समझने में अक्षम हैं कि यहां मामला विक्षेप का नहीं है। यहां मामला सार का है।
आज भारत की पूंजीवादी व्यवस्था पर एक नजर डालते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक हर मामले में यह व्यवस्था घोर संकट की शिकार है। उदारवादी और वाम-उदारवादी भी इसे नकार नहीं पाते। इस स्थिति से कैसे निजात पाई जा सकती है? क्या पीछे लौटकर? आगे किधर जाया जा सकता है? इनके पास कोई जवाब नहीं है। हिन्दू फासीवादियों के पास इसका जवाब है। उनके पास इसका एक नक्शा भी है। पर मध्ययुगीनता से सराबोर यह जवाब आधुनिक जमाने में केवल भयानक तबाही ही ला सकता है- हिटलर और मुसोलिनी की तर्ज पर।
स्पष्ट है कि चीजें ऐसे ही लम्बे समय तक नहीं चल सकतीं। तात्कालिक तौर पर यदि मोदी को राहुल प्रतिस्थापित भी कर दें तो भी मूलभूत तौर पर कुछ नहीं बदलेगा। यह प्रचंड, ओली और देउबा की कुर्सी दौड़ की तरह का ही साबित होगा।
ऐसे में इस निष्कर्ष से नहीं बचा जा सकता कि परिधि में घटित हो रही परिघटना देर-सबेर केन्द्र में घटित होगी ही। यानी यहां भी जन विद्रोह देर-सबेर फूटेगा ही। बात केवल वक्त की है। यदि 2021 में दिल्ली को घेर कर बैठे किसानों में दिल्ली के मजदूर शामिल हो गये होते तो यह तभी हो गया होता।
यहां सवाल यह नहीं है कि भारत में जन विद्रोह कब होगा? सवाल यह है कि यह जब भी होगा क्या तब के लिए संगठित क्रांतिकारी शक्तियां तैयार हैं? क्या वे इतनी सचेत और संगठित हैं कि उस विद्रोह की कमान अपने हाथ में ले सकें? ऐसा होगा तभी जन विद्रोहों के उस हश्र से बचा जा सकेगा जो पड़ोसी मुल्कों में हुआ।