अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था: रहस्यमयी व अविश्वसनीय

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इस वर्ष के दो लोकप्रिय जनउभार के पीछे बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी (बदहाल शिक्षा के साथ) ही थे। पहला जनउभार इस वर्ष के अप्रैल-मई माह में भारत के बेहद कम मजदूरी व बढ़ती महंगाई से हैरान-परेशान मजदूरों का था। और दूसरा जनउभार जून-जुलाई माह में छात्र-युवाओं का था जो बार-बार विभिन्न परीक्षाओं के पेपर लीक होने से परेशान थे।

विकास दर को मुंह चिढ़ाती महंगाई-बेकारी की मार

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पिछले दिनों खबर सामने आयी कि इस वर्ष की पहली तिमाही में भारत की विकास दर 7.8 प्रतिशत रही। इस खबर पर मोदी सरकार ने सफलता का ढिंढोरा पीटना चाहा। पर यह विकास की बात लोगों के

‘आत्मनिर्भर भारत’ और हिन्दू फासीवाद

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पिछले 12 साल से हिंदू फासीवादी सत्ता पर हैं। इस दौरान लगातार ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम दावे और बातें इन्होंने की हैं। इन्होंने मेक इन इंडिया का नारा भी भारत

उदारीकरण-निजीकरण के रथ पर सवार मोदी सरकार

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मोदी सरकार द्वारा 2014 में सत्ता में आने के बाद से जिस तेजी के साथ उदारीकरण-निजीकरण की जन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाया गया है, उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार के विभिन्न वि

चले थे दुबे बनने बन गये छब्बे

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भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अनर्गल डींगे हांकने वाली संघी मशीनरी इतने खुशनुमा दावे करती रहती है कि जनता तो क्या पूंजीपति वर्ग भी उन पर भरोसा करने से इंकार करता रहा है

देश में शिक्षा और रोजगार की स्थिति

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* भारत में 15 से 29 वर्ष की उम्र के नौजवानों की आबादी 36 करोड़ 70 लाख है। इनमें से 26 करोड़ 30 लाख नौजवान शिक्षा के क्षेत्र से बाहर हैं। और देश के संभावित श्रम बल का हिस्सा

मोदी के बारह साल: न उत्तम, न मध्यम, केवल अधम

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मोदी काल में लोकतंत्र (जो कि एक पूंजीवादी लोकतंत्र है) दिनों दिन वहां पहुंच गया है जहां फासीवाद (हिटलर-मुसोलिनी राज) की आहट हर ओर से सुनायी दे रही है। हिन्दू फासीवाद आज के भारत की एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। इस हिन्दू फासीवाद को अम्बानी, अडाणी टाटा, मित्तल जैसे सबसे बड़े भारतीय पूंजीपतियों का आशीर्वाद प्राप्त है। 

पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों की निगाह में भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट

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अब भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट को छिपाना झूठ बोलने में माहिर मोदी सरकार के लिए भी असंभव हो गया है। कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर तेल-गैस की कीमत बढ़ाने और डाॅलर के मुकाबले रु

आपदा में अवसर का संघी माॅडल

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हालिया विधानसभा चुनावों में देश की बेहतरीन हालत का ढिंढोरा पीटने के कुछ दिन बाद देश के संघी प्रधानमंत्री ने विदेश की धरती से इसका ठीक उल्टा राग अलापा। उन्होंने कहा कि यह

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।