सूरत के नासिर नगर में सैकड़ों परिवारों को बेघर करने की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल सवाल

Published
Tue, 06/16/2026 - 09:56
/surat-ke-nasir-nagar-mein-saikadon-parivaaron-ko-beghar-karane-ki-kaaryavahi-par

अब तो मुसलमान होना ही काफी है बिना कोई नोटिस बिना कोई सूचना बस बुलडोजर लाओ और घरों को तोड़ दो। गुजरात के सूरत शहर स्थित नासिर नगर क्षेत्र में 30 मई से 2 जून तक बड़े पैमाने पर तोड़-फोड़ की कार्रवाई की गई। इसमें प्रशासन, पुलिस और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर किये जा रहे हैं। भारी पुलिस बल, बुलडोजरों और मशीनों की अचानक गड़गड़ाहट ने बेरहमी के साथ 100 से अधिक घरों को ध्वस्त कर दिया। जिससे सैकड़ों मुस्लिम परिवार बेघर हो गए। स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सामने घरों को तोड़ा जा रहा था। लेकिन वे रोकने के लिए आगे नहीं आये, दूर खड़े तमाशा देखते रहे। प्रभावित लोगों का आरोप है कि उन्हें न तो पर्याप्त समय दिया गया और न ही कानूनी प्रक्रिया के तहत उचित नोटिस प्रदान किया गया।
    
तोड़-फोड़ के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इस कार्रवाई का आदेश किसने दिया था। हैरानी की बात यह है कि नगर निगम, पुलिस प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि अब इस पूरी कार्रवाई से खुद को अलग बताते हुए जिम्मेदारी लेने से बच रहे हैं। यदि इतनी बड़ी कार्रवाई की गई, जिसमें भारी संख्या में पुलिसकर्मी और सरकारी संसाधन लगाए गए, तो फिर इसकी जवाबदेही किसकी है?
    
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह कार्रवाई किसी कथित अतिक्रमण हटाने के नाम पर नहीं, बल्कि एक निजी निर्माण परियोजना या व्यवसायिक हितों को रास्ता देने के लिए की गई। स्थानीय नेता भी इस कार्रवाई में शामिल हैं। उनका कहना है कि वर्षों से रह रहे गरीब और मेहनतकश परिवारों को अचानक उजाड़ दिया गया, जबकि उन्हें अपने पक्ष को रखने या वैकल्पिक पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं दी गई।
    
इस घटना के बाद कई परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। भीषण गर्मी के बीच छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हो गए हैं। लोगों का कहना है कि उनके घरों के साथ-साथ उनकी जमा-पूंजी, घरेलू सामान और जीवनभर की मेहनत भी मलबे में बदल गई।
    
मामले के तूल पकड़ने के बाद जांच के आदेश दिए गए हैं। लेकिन प्रभावित परिवारों के बारे में अभी तक सरकार द्वारा कोई आश्वासन नहीं दिया गया। तब तक उनके रहने, खाने और बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा? पीड़ित परिवारों का कहना है कि केवल जांच के आदेश पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए तथा बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे की तत्काल व्यवस्था की जानी चाहिए।
    
लेकिन क्या ऐसा होगा। कतई नहीं। ऐसे सैकड़ों मामले हो चुके हैं जहां सरकार और प्रशासन द्वारा तोड़े गये घरों के गरीब परिवारों को न पुनर्वास मिला है न ही उचित मुआवजा मिला।

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।