झूठा कौन?
अक्सर ही भारत की राजनीति में नकली, बनावटी मुद्दे छाये रहते हैं। ये मुद्दे कभी सत्ता पक्ष से तो कभी विपक्ष की ओर से उछाले जाते हैं। इन मुद्दों को ऐसे पेश किया जाता है मानो
अक्सर ही भारत की राजनीति में नकली, बनावटी मुद्दे छाये रहते हैं। ये मुद्दे कभी सत्ता पक्ष से तो कभी विपक्ष की ओर से उछाले जाते हैं। इन मुद्दों को ऐसे पेश किया जाता है मानो
हाल में ही जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने संसद भंग कर 8 फरवरी को नए चुनावों की घोषणा कर दी। ताकाइची की पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को उम्मीद है कि इन चुनावों क
आखिर भाजपा को उसका नया अथवा नवीन अध्यक्ष मिल गया। संयोग से उसका नाम भी नबीन है। अब नबीन का बिहार में क्या मतलब होता है पता नहीं पर वह भाजपा का नवीन अध्यक्ष होगा यह तय है।
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे निकट आते जा रहे हैं वैसे-वैसे मोदी-शाह की चुनाव मशीनरी पूरी तरह से सक्रिय हो गयी है।
यह हमेशा से होता रहा है कि जब भी शोषित-उत्पीड़ित जनता अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए उठ खड़ी होती है और अपना संगठित आक्रोश व्यक्त करती है तो व्यवस्थापोषक लोग शांति और संयम की अपील करके उनको ठंडा करने की कोशिश करते हैं, ताकि उनका लूट का तंत्र चलता रहे। उनके लिए शांति और व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। न्याय की मांग को वे व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं।
मोदी सरकार ने आखिर में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम) का ‘राम नाम सत्य’ कर दिया। मनरेगा की जगह ‘वी बी-जी-राम-जी’ (विकसित V भारत B गारण्टी
पिछले दिनों इंडिगो कम्पनी की उड़ानों के रद्द होने ने हवाई अड्डों पर जो दृश्य दिखाये उसने विकास करते भारत की पोल खोल दी। चंद दिनों में भारत की इस सबसे बड़ी विमानन कम्पनी की
हिंदू राष्ट्रवादी अपनी फासीवादी मंशा को लगातार आगे बढ़ाते जा रहे हैं। जो विरोध या जो फैसले उनकी राह में रोड़े बनते हैं फिलहाल वे उन्हें भी हटाकर आगे बढ़ने में कामयाब हो जा र
न्यूयार्क शहर के मेयर के चुनाव में जोहरान ममदानी की जीत ने वाम उदारवादियों को खुशी से पागल कर दिया है। सरकारी वामपंथी भी पर्याप्त खुश हैं। उनकी खुशी किसी हद तक जायज भी है
तंजानिया अफ्रीकी महाद्वीप का एक देश है। 29 अक्टूबर 2025 को यहां राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ। चुनाव पूर्व ही सत्ताधारी पार्टी ने विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डालने के
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।