हाल में ही जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने संसद भंग कर 8 फरवरी को नए चुनावों की घोषणा कर दी। ताकाइची की पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को उम्मीद है कि इन चुनावों के जरिये वे फिर से जनादेश हासिल कर लेंगे। जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी कान्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ जापान (सी डी पी) भी इस चुनाव में जीत की उम्मीद लगाये है। सी डी पी ने कोमेइटो पार्टी के साथ विलय कर एक नई मध्यमार्गी पार्टी सेंट्रिस्ट रिफार्म्स एलायंस (सी आर ए) का गठन किया है।
संसद के 465 सदस्यीय निचले सदन में जहां सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 199 सीटें थीं। वह धुर दक्षिणपंथी पार्टी निप्पान इशिन नो काई (34 सीटें) के साथ गठबंधन बना सत्ता में थी। जबकि विपक्षी सेंट्रिस्ट रिफार्म्स एलायंस पर 172 सीटें थीं। सत्तारूढ़ गठबंधन के पास ऊपरी सदन में बहुमत नहीं था। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अक्टूबर, 24 के चुनाव में निचले सदन व पिछले साल जुलाई में ऊपरी सदन में बहुमत खो दिया था। जुलाई में ऊपरी सदन में बहुमत खोने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शिगेरू इशीबा को इस्तीफा देना पड़ा था व अक्टूबर 25 में ताकाइची प्रधानमंत्री बनी थी।
दरअसल जापान में दोनों गठबंधनों में कोई नीतिगत अंतर नहीं बचा है। दोनों जापानी शासक वर्ग के हितों को साधती हैं। दोनों ही गठबंधन आज अधिकाधिक दक्षिणपंथी रूझानों व सैन्यीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं। पर इसके बावजूद अगर जापान में राजनैतिक स्थिरता कायम नहीं हो पा रही है तो इसकी जड़ें जापानी अर्थव्यवस्था के गहराते संकट में हैं।
2021 से जापान में मजदूरों का वार्षिक वेतन बढ़ती मुद्रास्फीति के मद्देनजर गिर रहा है। खाद्य पदार्थों की महंगाई जापान में आसमान छू रही है। चावल के दाम जापान में 4416 येन प्रति 5 किलो तक जा पहुंचे हैं। इससे जनता में सत्तारूढ़ दलों की साख गिरती जा रही है।
मजदूर वर्ग की इस गिरती हालत में दोनों गठबंधन कर व मुद्रास्फीति में राहत देने के दावे कर रहे हैं। ताकाइची सरकार ने नवम्बर माह में 135 अरब डालर के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की थी व कर कटौती का वायदा किया था। पर पैकेज हेतु राशि कहां से आयेगी, इसका कोई संकेत न होने के चलते जापानी बांडों की कीमत गिरने लगी। सी आर ए गठबंधन सरकारी ऋण की बढ़त थामने का झूठा ख्वाब पेश कर रहा है। वर्तमान में जापान में ऋण सकल घरेलू उत्पाद का 237 प्रतिशत है।
दोनों गठबंधन जापान के सैन्यीकरण के धुर समर्थक हैं। वे जापान को चीन के खतरे से भयभीत दिखा इस सैन्यीकरण को जायज ठहराते रहे हैं। पिछले वर्ष जापान ने सकल घरेलू उत्पाद का 2 प्रतिशत सेना पर खर्च किया था। अब इसके और बढ़ने की संभावना है। जापान 2015 से ही अपने सैन्यीकरण पर जोर दे रहा है। उसने पहले आत्मरक्षा हेतु युद्ध को मान्यता दी अब वह अपने अस्तित्व के लिए खतरा बने देश से युद्ध को जायज ठहरा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा-नागासाकी विस्फोटों के बाद जापान का सैन्य खर्च बेहद कम हो गया था व बाहरी हमले से उसकी सुरक्षा की गारंटी अमेरिका ने ले ली थी। उस वक्त अमेरिकी साम्राज्यवादी जापान के फिर से सैन्य ताकत बनने की संभावना से डरे हुए थे और उसे बेहद कम सैन्य खर्च के प्रावधान पर सहमत किये हुए थे। पर आज स्थितियां बदल गयी हैं। अब चीन को घेरने के लिए जापानी सैन्य खर्च बढ़ाने का अमेरिकी साम्राज्यवादी समर्थन कर रहे हैं।
ऐसे में आगामी चुनाव में जो भी दल जीतेगा वह आम जापानी जनता के हितों के उलट जापान को नये सिरे से सैन्यीकरण की ओर ले जायेगा। यह सब अपनी बारी में महंगाई बढ़ने की ओर व श्रमिकों की और दुर्दशा की ओर ले जायेगा।
वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोने की चढ़ती कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट के नये संकेत दे रही है। सोने की कीमतों में 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। हाल में यह वृद्धि काफी तेजी से हुई है। यह दिखलाता है कि ट्रम्प के सत्तासीन होने के बाद उसके मनमाने तटकरों, डालर की गिरती की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक जोखिमों का शिकार है। ऐसे में सुरक्षित निवेश की चाह में सभी देश सोना खरीद उसमें निवेश कर रहे हैं।
डालर की हैसियत में गिरावट, सोने का महंगा होने के साथ जापानी बांडों की भारी बिकवाली जापान ही नहीं दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के संकट को गहरा रही है। खुद अमेरिकी साम्राज्यवादी भी इस संकट की मार से अछूते नहीं रहेंगे।
इन्हीं परिस्थितियों में जापान के नये चुनाव में जो भी दल सत्तासीन होगा वो संकट को झेलने को अभिशप्त होगा।