यूजीसी नियमावली : कागजी होने को अभिशप्त

Published
Fri, 01/30/2026 - 21:03

13 जनवरी को यूजीसी (वि.वि. अनुदान आयोग) द्वारा वि.वि. में जातीय भेदभाव समाप्त करने के लिए एक नियमावली बनायी गयी। नियमावली को ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम 2026’ नाम दिया गया। दावे किये जा रहे हैं कि इससे उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, दिव्यांगता, लैंगिक भेदभाव से निपट लिया जायेगा। यह भी दावा है कि इन नियमों के बाद उच्च शिक्षण संस्थानों में एस सी/एस टी व ओबीसी के साथ होने वाला भेदभाव रोक दिया जायेगा। फिलहाल इन नियमों का विरोध कर रहे लोगों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।

जैसे ही यह नियम सामने आये वैसे ही समाज और सोशल मीडिया में पक्ष-विपक्ष बन गये और तीखी बहस शुरू हो गयी। भाजपा, आरएसएस से जुड़े लोग और सवर्ण मानसिकता से बुरी तरह ग्रसित लोग इसका बड़ा विरोध कर रहे हैं। वे मोदी-योगी के प्रति अपने प्रेम छोड़ने तक की बातें कर रहे हैं। बरेली के एक अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने तो इस्तीफा तक दे दिया। कई भाजपा नेता बगलें झांक रहे हैं तो कई ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा अलाप रहे हैं। वे कह रहे हैं मोदी है तो किसी सवर्ण का अहित हो ही नहीं सकता है। कई विपक्षी दल ‘दोषी को बख्शा न जाये निर्दोष को फंसाया न जाये’ कहकर यूजीसी नियमों को संतुलित करने की बातें कर रहे हैं।

यूजीसी की नयी नियमावली 2026 यूजीसी नियमावली 2012 की जगह लेगी। 2012 नियमावली के मुकाबले 2026 नियमावली में जातीय उत्पीड़न का दायरा बढ़ाते हुए ओबीसी को भी इसमें शामिल किया गया।

नियमावली 2026 के अनुसार हर संस्थान को समान अवसर केन्द्र (म्व्ब्), इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वाड बनाने होंगे। म्व्ब् वंचित समूह के लिये नीतियां लागू करेगा। जिला प्रशासन और पुलिस से समन्वय करेगा, कानूनी सहायता उपलब्ध करवायेगा।

10 सदस्यों की इक्विटी कमेटी बनायी जायेगी जिसमें आधे आरक्षित वर्ग श्रेणी (ैबए ैजए व्इबए महिला, दिव्यांग) से होंगे। कमेटी के अध्यक्ष संस्थान के प्रमुख होंगे। गौरतलब है यह कमेटी किसी चुनाव से नहीं बल्कि मनोनयन से बनायी जायेगी। शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्यवाही शुरू करनी होगी। इक्विटी स्क्वाड परिसरों की निगरानी करेंगे।

यहीं पर उच्च शिक्षा संस्थानों में मौजूद जातिगत भेदभाव पर एक नजर डाल लेना मामले की गंभीरता को समझने के लिए उपयोगी होगा।

2019 से 2021 के दौरान केन्द्रीय वि.वि., आई आई टी, एन आई टी, आई आई एम, आई आई एस ई आर जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में एस सी/एस टी व ओबीसी के 98 छात्रों ने आत्महत्या की है। यह जानकारी 2023 में राज्यसभा में दी गयी। वहीं 2021 में लोकसभा में बताया गया कि 2014-21 के दौरान शीर्ष संस्थानों में 122 छात्रों ने आत्महत्या की जिसमें 55 प्रतिशत पिछड़े समुदाय से थे (24 एस सी, 3 एस टी व 41 ओ बी सी)।

यूजीसी के अनुसार ही 2019-20 से 2023-24 के दौरान जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 118.4 प्रतिशत बढ़ी हैं। ऐसे मामलों की 1160 शिकायतें दर्ज की गयी हैं।

अलग-अलग संस्थाओं द्वारा दिये गये आंकड़े कालेज कैम्पसों में पसरे जातीय उत्पीड़न की एक तस्वीर पेश कर देते हैं। हालांकि विभिन्न वजहों से शिकायतों में न दर्ज होने वाले मामलों को भी जोड़ दिया जाये तो तस्वीर और भी खौफनाक बन जायेगी।

कालेज कैम्पसों में इस कदर फैले जातीय भेदभाव को खत्म कर, निश्चित ही हर दमित-वंचित छात्र-छात्रा के लिए पूर्ण बराबरी और सुरक्षा का माहौल होना चाहिए। जातीय भेदभाव-उत्पीड़न हमारे समाज और कालेज-कैम्पसों में पसरी हुयी एक बड़ी सामाजिक समस्या है।

इस सामाजिक समस्या से निपटने के नाम पर यूजीसी नियमावली 2026 आयी है। गौरतलब है कि यह नियमावली मोदी सरकार या यूजीसी की कोई मेहरबानी नहीं है। इस नियमावली की पृष्ठभूमि में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मां की कोर्ट में दायर याचिका और छात्रों का संघर्ष है। जातीय हिंसा की पीड़ित दोनों मांओं ने एक याचिका दायर की थी। जिसमें कालेजों में जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए कठोर नियम बनाने की बात कही गयी थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यूजीसी को नियम बनाने को कहा गया। लगभग एक साल पूर्व यूजीसी द्वारा ये नियम बनाये गये और परामर्श के लिए जारी किये। फिर कोर्ट के कहने पर इन्हें अंतिम रूप देकर जारी कर दिया गया। परामर्श हेतु जारी नियमों में झूठी शिकायत पर दण्ड का प्रावधान भी था जबकि अंतिम नियमावली में इसे हटा लिया गया।

यूं तो यूजीसी की नियमावली को ‘कुछ नहीं से कुछ तो है’ कहा जा सकता है। लेकिन आज के हिन्दू फासीवाद के दौर में ‘कुछ तो है’ के लागू होने की भी बहुत चुनौती है।

2014 में सत्ता में घोर जातिवादी हिन्दू फासीवादी भाजपा सरकार के आने के बाद से शिक्षा का भगवाकरण तेजी से किया गया। शिक्षण संस्थानों में हर जगह आर एस एस की सोच के लोगों को बैठाया गया। न सिर्फ आर एस एस के विश्वास पात्रों को पदों पर बिठाया गया बल्कि भाजपा के लिए थोड़ी भी असुविधा पैदा करने वाले शिक्षकों-प्रोफेसरों को भी निशाना बनाया गया है। शिक्षण संस्थानों में संघी सोच आज हर जगह साफ-साफ देखी जा सकती है। एक तरफ सरकार या हिन्दू फासीवादियों का कब्जा हो। दूसरी ओर शिक्षण संस्थानों में इसकी सोच के लोग काबिज हों। ऐसे हालात में यूजीसी की नियमावली/तंत्र क्या कालेज कैम्पसों में जातीय भेदभाव को रोक सकता है। तथ्य तो यही कहते हैं पिछले समय में हर जगह जातीय भेदभाव बढ़ा ही है। रोहित वेमुला का उदाहरण हमारे सामने है। जिसमें सत्ता समर्थित हिन्दू फासीवादी राजनीति और कालेज के तंत्र ने वो हालात पैदा कर दिये जिसमें एक छात्र को आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाना पड़ा।

इतिहास के सबक हमारे सामने हैं कि फासीवाद हर तरीके के जनवाद को खत्म करता है। भारत में जातिवाद का संस्करण हिन्दू फासीवाद है। जनवाद के तकाजे की बात करें तो यूजीसी की नियमावली/तंत्र के बनने व उसके क्रियान्वयन को कहीं ज्यादा जनवादी बनाया जाना चाहिए था। नियम बनाने में छात्र-छात्राओं-शिक्षक-कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी बनायी जानी चाहिए थी। क्रियान्वयन के लिए भी कमेटियों में व्यापक भागीदारी बनायी जानी चाहिए थी लेकिन इसके बरक्स यूजीसी द्वारा गैर जनवादी तरीका अपनाया गया। कुछ लोगों ने नियम बनाये और उन नियमों को लागू करवाने के लिए कुछ लोगों को लेकर मनोनीत कमेटी बना दी जायेगी।

किसी सामाजिक समस्या के समाधान के लिए एक मजबूत अल्पतंत्र, कठोर से कठोर दंड विधान यही पूंजीवादी तंत्र की सोच है। लेकिन फासीवाद के दौर में तो यह और भी संकीर्णता, कठोरता से भर जाता है।

किसी भी तरह सत्ता में बने रहना हिन्दू फासीवादियों का मूल मंत्र है। इसके लिए सही-गलत, झूठ-सच कोई मायने नहीं रखता। यूजीसी की नियमावली एस सी/एस टी व ओबीसी के बीच भाजपा की चुनावी रणनीति भी हो सकती है। क्योंकि भाजपा की आरक्षण विरोधी, मनुवादी पार्टी की छवि आम है। विपक्षी पार्टियां भी इसे निरंतर उठाती रहती हैं। कागजों में समानता, भेदभाव निवारण की बातें कर भाजपा दलित-पिछड़ों का वोट साधने का काम भी कर रही है। सवर्ण वोट तात्कालिक तौर पर जरूर नाराज दिख रहा है लेकिन व्यवहार में इन कागजी दावों की हकीकत देख वह फिर से मोदी के पीछे लामबंद हो जायेगा। निशिकांत दुबे से लेकर तमाम भाजपा नेता निरंतर लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं।

वैसे भी लम्बे समय से फासीवादी प्रचार ने सवर्ण मानसिकता से ग्रसित लोगों को इस सोच पर खड़ा कर दिया है कि तालाब में कमल ही एक मात्र सुरक्षित जगह है बाकी तालाब पूरा मगरमच्छों से भरा हुआ है। यहां भाजपा इनके साथ ‘भय बिन प्रीत न होई’ के फार्मूले पर है। इन सभी कारणों से यूजीसी द्वारा जातिगत भेदभाव मिटाने का दावा करने वाली नियमावली कागजी साबित होने को अभिशप्त है। यह नियमावली ‘सेमल के फूल’ के मुहावरे को चरितार्थ करेगी। कुछ आकर्षक लेकिन हकीकत में बेकार।

जहां तक विरोधियों की मांगों का सवाल है वे इस नियमावली से सवर्ण या सामान्य वर्ग के प्रति झूठी शिकायतें कर तंग किये जाने का खतरा जता रहे हैं। इस हेतु वे झूठी शिकायत पर कार्यवाही की बात व सामान्य वर्ग से भी भेदभाव की बात डलवाना चाहते हैं। जाहिर है ये प्रावधान पहले से ही लचर नियमावली को एकदम लचर बना देंगे। तब कोई जातिगत उत्पीड़न का शिकार छात्र भी इस डर से शिकायत करने से डरेगा कि शिकायत साबित न होने पर उस पर कार्यवाही होगी। सवर्ण मानसिकता के लोग दरअसल अपने उत्पीड़न के अधिकार को खोना नहीं चाहते, इसलिए सड़कों पर हैं। झूठी शिकायत की बात तो महज बहाना है। आखिर एक ऐसे प्रशासनिक तंत्र में जहां ऊपर से नीचे सवर्णों का वर्चस्व हो वहां दबी-कुचली जाति का छात्र झूठी शिकायत करने की हिम्मत क्यों करेगा। जब सच्ची शिकायत या आवाज उठाने पर उसका जीना दूभर कर दिया जाता है तो झूठी शिकायत पर क्या हाल किया जायेगा, इसे सहज ही समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सवर्णों के तर्क पर भरोसा कर इन नियमों पर रोक लगा दिखा दिया है कि वहां भी ‘सवर्ण मानसिकता व संघी आत्मा’ काफी मात्रा में घर बसा चुकी है।

जरूरत है कि इस नियमावली को एकदम कागजी बनाने के प्रयासों के विरोध के साथ इन्हें व्यवहार में लागू कराने के लिए, अधिक कारगर बनाने के लिए संघर्ष किया जाये। अन्यथा तो संघी शासन में जब पूरे देश में जातिगत भेदभाव-उत्पीड़न बढ़ रहा हो तो परिसरों में इसकी बढ़त को कोई नियम रोक नहीं सकते।

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