विविध

शहीद दिवस पर पदयात्रा

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पंतनगर/ दिनांक 13 अप्रैल को पंतनगर गोलीकांड व जलियांवाला बाग कांड की स्मृति में इंकलाबी मजदूर केंद्र एवं ठेका मजदूर कल्याण समिति पंतनगर, प्रगतिशील महिला

हरियाणा में वेतन वृद्धि और पूंजीपतियों की चीख-पुकार

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पिछले दिनों गुड़गांव के आई एम टी मानेसर में हरियाणा सरकार द्वारा लागू न्यूनतम वेतन वृद्धि को लागू करवाने के लिए मजदूरों हड़तालों का तांता लगा रहा। होंडा फैक्टरी से शुरू हुआ

गिरफ्तार मजदूरों व मजदूर नेताओं को रिहा करो!

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....विगत 2 अप्रैल से गुड़गांव के मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में होंडा कंपनी के ठेका मजदूरों से शुरू हुई मजदूरों की स्वतः स्फूर्त हड़तालें और प्रदर्शन मानेसर की अनेकों कंपनियों

मजदूरों व इमके कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का विरोध

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मानेसर के प्डज् औद्योगिक क्षेत्र गुड़गांव में ठेका मजदूरों द्वारा न्यूनतम वेतन वृद्धि, 8 घंटे काम, ओवरटाइम भुगतान और काम की बेहतर स्थितियों की जायज मांग को लेकर चल रहे शां

अमरीका-ईरान समझौता वार्ता असफल- आगे क्या?

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लेकिन इसके बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी रणनीतिक पराजय स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि इसे वह स्वीकार कर लें तो उसकी धौंसपट्टी, हमले, हुकूमत परिवर्तन की सारी कोशिशों पर पलीता लग सकता है? वैसे भी दुनिया भर में उसकी साख गिर रही है और प्रभाव भी कमजोर होता जा रहा है। 

अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून, व्यवस्था और अव्यवस्था

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देशों के बीच संबंधों में भी अंततः ताकत ही निर्णायक होती है। आर्थिक और सामरिक दोनों मिलकर यह तय करते हैं। तात्कालिक तौर पर सामरिक ताकत के महत्वपूर्ण होते हुए भी अंततः आर्थिक ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होती है। 

सिगनेचर ग्लोबल में मजदूरों की मौत

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चमचमाती दुनिया के पीछे और भी दुनिया है। वह दुनिया मजदूरों-किसानों की बदहाली की है। यह एक उजड़ती हुयी दुनिया है। पूंजीपतियों के मुनाफे के चक्कर में आज मजदूर-किसान बुनियाद म

अमेरिकी साम्राज्यवाद के हमले व आतंक के साये में ‘मई दिवस’

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यह एक सच्चाई है कि जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे उससे कहीं अधिक लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के हमले, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे जो चुके हैं। और यह भी सच है कि जब तक साम्राज्यवाद, पूंजीवाद जिन्दा रहेगा तब तक मानव जाति का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा। 

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

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शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

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जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।