आत्ममुग्धता व प्रपंच में जीता एक बौना तानाशाह

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
/aatmmugdhata-v-prapanch-mein-jeetaa-ek-bauna-tanashah

सत्ता के शीर्ष पर बैठे शासकों के भीतर आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा, यथार्थ को विरूपित करना आदि दुर्गुण स्वाभाविक तौर पर होते हैं। और इसी तरह सत्ता में बैठा कोई भी तानाशाह जो इतिहास में हमेशा बौना साबित होता है, सत्ता में बने रहने के लिए खूब प्रपंच रचता है। 
    
हमारे देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो आत्ममुग्धता व प्रपंच की पराकाष्ठा है। साथ ही वह सत्ता में अपने हर दिन के साथ साबित कर रहा है कि वह एक ऐसा तानाशाह है जो इतिहास में बौना और बौना साबित होने के लिए अभिशप्त है। 
    
भारत में अब तक जितने प्रधानमंत्री हुए हैं, उनमें से कोई भी मोदी की तरह आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा व प्रपंच का शिकार नहीं था। मोदी के सबसे करीब बाजपेयी ही ठहरते हैं। बाकियों के कई गुणों-दुर्गुणों की चर्चा की जा सकती है परन्तु कोई भी मोदी की तरह अपनी छवि गढ़ने के लिए इस तरह के फर्जीवाड़े नहीं करते थे, जैसे मोदी करते हैं। 
    
पिछले दिनों मोदी जी ने एक नया कारनामा कर डाला। एक ऐसे स्वामी से मुलाकात कर व आशीर्वाद मांग डाला जिनकी मृत्यु 33 साल पहले 1993 में हो चुकी है। मोदी के प्रपंचों को चमत्कार मानने वाले अम्बानी-अडाणी मीडिया ने इसे एक वास्तविक बातचीत की संज्ञा दे डाली। मोदी जी के प्रपंच का झूठा प्रचार व प्रसार करने के लिए ये किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। 
    
हुआ यूं कि मोदी ने स्वामी चिन्मयानंद के ‘होलोग्राम’ से अपनी भूरि-भूरि प्रशंसा करवायी और यह घोषणा करवायी कि ‘नरेन्द्र, भारत आपके साथ है’। और यह सब ए आई तकनीक के जरिये संभव कराया गया कि 1993 को दिवगंत हुआ व्यक्ति 23 अक्टूबर 2026 को मोदी जी की प्रशंसा करता है और आशीर्वाद देता है। और मीडिया इसे ऐसे पेश करता है मानो किसी जीवित स्वामी से मुलाकात हुयी हो। 
    
मोदी जी का यह नया कारनामा जितना भी नया हो परन्तु अपने बारे में बड़ी-बड़ी झूठी बातें करना, झूठे किस्से-कहानियां गढ़ने की आदत बहुत-बहुत पुरानी है। श्रीमान जी! सोचते हैं कि वे अपने बारे में, अपने माता-पिता के बारे में, अपने अतीत के बारे में जो कुछ कहेंगे वह पूरा देश ज्यों का त्यों मान लेगा। अपने को ‘अजैविक’ (नान बायलोजिकल) साबित करते-करते वे अजैविक व्यक्तियों (होलोग्राम) से अपनी प्रशंसा करवाने लगे हैं। हद है! 
    
आत्ममुग्धता व प्रपंच के शिकार मोदी ने अपने 25 साल के ‘‘सेवा काल’’ में बार-बार साबित किया है कि उन्होंने कैसे-कैसे ढंग से चुनाव जीते और कैसे-कैसे तरीकों से अपने तानाशाही पूर्ण शासन को कायम किया है। ‘‘गुजरात नरसंहार’’ से शुरू हुयी उनकी यात्रा जब अपने अवसान की ओर जा रही है तब भी वे जन आंदोलनों को दबाने के लिए तानाशाही पूर्ण कदम उठाते रहे हैं। गुजरात में अपने ‘‘सेवा काल’’ में सामाजिक कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं व अपने राजनैतिक विरोधियों व प्रतिद्वन्द्वियों को जेल में ठूंसा और यहां तक कि हत्यायें तक करवाई गयीं। और नई दिल्ली में इनके ‘‘सेवा काल’’ में किसानों, मजदूरों, नौजवानों, मुसलमानों, आदिवासियों आदि के लोकप्रिय आंदोलनों के दमन में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। इनकी नीतियों की विफलता कभी नोटबंदी, कभी जी एस टी तो कभी मणिपुर में वर्षों से चल रही हिंसा के रूप में सामने आती रही है। परन्तु बेपरवाह, बौने तानाशाह अपनी आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा की दुनिया से कभी बाहर नहीं आये। और भारत के मजदूर-मेहनतकश इनकी हकीकत से रू-ब-रू न हो जायें इसके लिए एक के बाद एक प्रपंच रचते गये। बस इस वर्ष यह हुआ कि छात्र-युवा आंदोलन ने मोदी की छवि को तोड़कर रख दिया और उसके बाद मोदी जी की छटपटाहट बढ़ती गयी है। वे स्वयं और उनके लगुए-भगुए, चाटुकार किसी भी तरह से मोदी की छवि को पुनः गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन सबकी, हर नयी कोशिश मोदी को आम जनमानस की नजरों में और, और ज्यादा गिरा रही है। 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।