6 दिसम्बर बाबरी विध्वंस
6 दिसम्बर 2025 को बाबरी विध्वंस को 33 वर्ष हो गये। ऐसा दिन जब इस देश के अल्पसंख्यकों को यह बता दिया गया कि उनके वर्तमान और भविष्य का निर्धारण देश का संविधान नहीं करेगा वरन् हिन्दू कट्टरपंथी करेंगे। बाबरी विध्वंस इस बात का उद््घोष था कि भारत की नियति का निर्धारण अब बहुमतवाद के आधार पर होगा। बाबरी विध्वंस इस बात का भी द्योतक था कि देश की संवैधानिक संस्थाओं ने भी बहुमतवाद के आगे समर्पण कर दिया है।
यह घटना इस बात का भी उद्घोष थी कि देश औपचारिक रूप से भी संविधान की प्रस्तावना से पीछे हट चुका है। यहां तक कि एक मंत्री ने 6 दिसम्बर को शौर्य दिवस सभी स्कूलों में मनाने का एलान भी कर डाला। बाद में शोर मचने पर आदेश वापस लेना पड़ा।
विगत 33 वर्षों के भारतीय इतिहास ने उपरोक्त को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है। इन वर्षों में संघ परिवार बहुलतावाद के आधार पर समाज को काफी हद तक बांटने में सफल रहा है। नफरत के जो बीज संघ परिवार और मुस्लिम लीग ने बोये थे, संघ परिवार उसी नफरत की लहलहाती फसल को देख कर खुशी से झूम रहा है।
90 के दशक से उदारीकरण-निजीकरण की जनविरोधी नीतियां देश में लागू की गयीं। इसके साथ ही शासक पूंजीपति वर्ग ने जनता के संभावित विरोध को रोकने के लिए दो कदम उठाये। पहला जनतंत्र को संकुचित करना और दूसरा साम्प्रदायिक विभाजनकारी संघ-भाजपा को बढ़ावा देना। 2014 तक आते-आते तो शासक एकाधिकारी पूंजी ने संघ से गठजोड़ ही कायम कर लिया। कहने की बात नहीं कि जनतंत्र को लात लगाने व साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाते संघी अपने हितों के साथ बड़ी पूंजी के हित भी साध रहे हैं। इन वर्षों में विभाजनकारी और नफरती राजनीति के आधार पर संघी न सिर्फ केन्द्रीय सत्ता पर अपनी पूर्ण पकड़ जमा चुके हैं बल्कि इस सत्ता का इस्तेमाल वे पुनः विभाजन और नफरत को भारतीय समाज में गहराई तक फैलाने में कर रहे हैं। इन वर्षों में वे धार्मिक दृष्टिकोण को भारतीय समाज के बहुलांश का दृष्टिकोण बनाने में सफल रहे हैं। इस कारण ही विगत दशक से भारतीय समाज सतत नफरत और विभाजन की स्थिति में मौजूद है। उनकी वर्तमान सफलता की यह एक महत्वपूर्ण कुंजी है।
इस सबका परिणाम यह हुआ कि भारत के संविधान की प्रस्तावना के आधार पर खड़ा हुआ जनतंत्र आज अपनी अंतिम सांसे ले रहा है। ‘अनेकता में एकता’, ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘वसुधैव कुटम्बकम’ संघ परिवार के बहुमतवाद (हिन्दूवाद) से प्रतिस्थापित हो रहा है जहां सिर्फ एक देश, एक भाषा और एक संस्कृति का विचार स्थापित किया जा रहा है। जो प्रस्तावना भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों को बराबरी से और अपने धार्मिक व सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से जीने का अधिकार देती थी, संघ परिवार की हिन्दूवादी राजनीति में उसके लिए जगह बहुत सीमित हो चुकी है। राममंदिर आंदोलन में वे मुसलमानों से सिर्फ अयोध्या, काशी व मथुरा मांग रहे थे आज वे हर शहर, गांव व कस्बों की मस्जिदों-दरगाहों पर विवाद पैदा कर रहे हैं।
वे केवल मंदिर-मस्जिद विवाद तक सीमित नहीं रहे। इससे बढ़कर वे ‘दाढ़ी और टोपी’ के आधार पर उनकी रसोई में घुसकर उनके खाने को तलाश रहे हैं। बहुमतवाद (हिन्दूवाद) के आधार पर वे अल्पसंख्यकों को न सिर्फ मार देते हैं वरन् कानूनेत्तर जाकर उनके घरों, दुकानों को सिर्फ आरोप के आधार पर गिरा दे रहे हैं। सत्ता के विरोध के संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों के इस्तेमाल पर वे सीधे सीने में गोली उतार रहे हैं या फिर कानूनेत्तर वे विरोध करने वालों के पोस्टर लगवा के कर रहे हैं। ऐसा सभी ने सीएए के विरोध प्रदर्शनों में देखा है। यहां तक कि वे नागरिकों, दुकानदारों, ऑटो-चालकों व अन्य को उनकी धार्मिक पहचान को उजागर करने को मजबूर कर रहे हैं।
संघ परिवार यहां तक अब निर्धारित कर रहा है कि किसका वोट होगा और किसका कटेगा और कौन वोट डाल पायेगा। मुस्लिम बहुल सीटों पर वे मुस्लिमों की बड़ी संख्या को मताधिकार से भी वंचित कर दे रहे हैं। अधिकांश राज्य मशीनरी और उसमें मौजूद संघी सोच के अफसर संविधान की औपचारिक शपथ लेते हैं लेकिन वास्तविक शपथ वे संघ के प्रति निष्ठा की ले रहे हैं।
राममंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने बता दिया कि सर्वोच्च न्यायालय संविधान की प्रस्तावना से ज्यादा बहुमतवादी (हिन्दूवादी) सोच से संचालित हो रहा है। सर्वोच्च अदालत अपराधियों को दण्डित करती है लेकिन वह तो उनके हाथ का खिलौना बन गयी जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में बाबरी मस्जिद को न गिराने का झूठा हलफनामा दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने राममंदिर के पक्ष में फैसला देकर यह जता दिया कि अब इस देश में मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों को बहुमतवाद के हिसाब से जीना पड़ेगा और वह भी बहुमतवाद (हिन्दूवाद) की शर्तों पर। और कि इस देश की सर्वोच्च अदालत अब स्वयं संविधान से नहीं, न्याय की भावना से नहीं तर्क व साहस से नहीं ‘‘जनमत’’ के आधार पर फैसले सुनायेगी।
देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपने नियंत्रण में लेकर वे अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने पर आमादा है। संसद, चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक, सेना, न्यायपालिका, पुलिस, कचहरियों तक और व्यापार, नौकरी, पढ़ाई तक वे सभी जगह से मुसलमानों को बहिष्कृत करने की कोशिशें कर रहे है। आज प्रदेशों की विधानसभाओं (जहां भाजपा सत्ता में हैं) से लेकर संसद तक में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम हो चुका है।
सच तो यह है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस तो एक सीढ़ी थी ताकि वे सत्ता पर पहुंच सके। भारत के औपचारिक पूंजीवादी जनतंत्र का ध्वंस ही इन संघियों का असली उद्देश्य था। सत्ता में आने के बाद वे वही कर भी रहे हैं और वो भी पूरे जोर-शोर से।
जनतंत्र विध्वंस के बिना वे अपने घृणित मकसद में एक हद से ज्यादा सफल हो नहीं सकते थे क्योंकि नागरिक अधिकार, स्वतंत्रता व समानता के मूल्य उनके मार्ग में बार-बार प्रतिरोध की बेड़ियां बनकर खड़े हो जाते। तब एक देश, एक भाषा व एक संस्कृति का उनका सपना आसानी से पूरा नहीं हो सकता था। सीएए से लेकर किसानों छात्रों तक के संघर्ष ने संघियों को चुनौती एक हद तक पूंजीवादी जनतंत्र के तहत मिले अधिकारों के इस्तेमाल के आधार पर दी थी और इन अधिकारों को बचाने के लिए भी। वे जनतंत्र का विध्वंस कर नग्न फासीवादी तानाशाही स्थापित करना चाहते हैं। बाबरी विध्वंस से अभी तक संघ की यात्रा का यही सारतत्व है।