बढ़ती महंगाई के विरोध में प्रदर्शन

Published
Thu, 10/01/2026 - 15:50
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देश भर में चीनी 39 रुपए प्रति किलो से बढ़कर लगभग 70 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। इसी के साथ सरसों का तेल, रिफाइंड, दाल, आटा, चावल, मसाले, प्याज, टमाटर, सब्जी, गैस, टेम्पो-आटो किराया, बस का किराया आदि सब की कीमतें बढ़ चुकी हैं। लेकिन मेहनतकश जनता की कमाई में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है। मजदूरों के वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई या हुई भी है तो वह नाममात्र की वृद्धि ही है। लेकिन इस बढ़ती महंगाई ने मजदूरों के वेतन को और घटा दिया है। यानी पहले जितना सामान 100 रुपए में मिल जाता था, अब उससे आधा सामान उतने ही रुपयों में मिल रहा है।
    
इस बढ़ती महंगाई की सबसे ज्यादा मार मजदूर-मेहनतकश जनता पर पड़ी है। उसमें भी सबसे ज्यादा असर रसोई पर पड़ा है। खाने की थाली में पौष्टिक आहार पहले ही कम थे, अब और कम होते जा रहे हैं। जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा मजदूर-मेहनतकशों को उठाना पड़ता है। अब तो हद यह हो गई है कि अपने बच्चों के दूध से लेकर जरूरी सामान तक में कटौती करनी पड़ रही है।
    
2014 में भाजपा सरकार सत्ता में आई। चुनाव से पहले मोदी ने नारा दिया था ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’। तब से आज तक नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं। लेकिन महंगाई घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। विश्व गुरू बनने वाले भारत की स्थिति यह है कि यहां भुखमरी, कुपोषण बढ़ता ही जा रहा है। देश की 80 करोड़ मेहनतकश जनता 5 किलो राशन पर किसी तरह अपना गुजारा करने को मजबूर है। भुखमरी का आलम यह है कि हमारे देश में एक छोटी बच्ची भात-भात करते हुए मर गई लेकिन उसको भात नहीं मिल सका। आज भी देश में भुखमरी और कुपोषण से छोटे-छोटे बच्चों की जान जा रही है। मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला इसका ताजा उदाहरण है, जहां 30 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई।
    
प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने एक पर्चा जारी कर विभिन्न जगहों पर प्रचार अभियान चलाया और रामनगर, हरिद्वार, हल्द्वानी में विरोध प्रदर्शन-पुतला दहन कार्यक्रम का आयोजन किया। इन कार्यवाहियों मंे बड़ी संख्या में भोजनमाताओं व घरेलू महिलाओं ने भागीदारी की। -विशेष संवाददाता

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