चाय बागान मजदूरों के अनशन-आंदोलन के 100 दिन

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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दार्जिलिंग पहाड़ियों के गाड़ीधुरा और पंखाबाड़ी के बीच स्थित लांगव्यू चाय बागान कभी दार्जिलिंग के सबसे बड़े बागानों में से एक था। इसकी उत्पादकता भी काफी अधिक थी। 1879 में स्थापित इस बागान का कुल क्षेत्रफल 1,020 हेक्टेयर है। वर्तमान में इसका आधा हिस्सा जंगल में तब्दील हो चुका है, चाय की खेती के तहत अब केवल 502 हेक्टेयर भूमि ही बची है। 
    
कर्मचारियों की संख्या कभी 1,244 थी, लेकिन आज वहां केवल 300 से कुछ अधिक मजदूर काम कर रहे हैं। मजदूरी, वेतन, पीएफ और ग्रेच्युटी की भारी गड़बड़ियों से तंग आकर मजदूरों ने काम छोड़ दिया। मजदूर और उनके परिवार के लोग दूर-दराज के इलाकों में या आस-पास के 6-7 बागानों में काम तलाशने पर मजबूर हो गए।
    
दार्जिलिंग-कालिम्पोंग पहाड़ियों के बागान मजदूरों के संघ (यूनियन) के रूप में 1 मई 2023 (मई दिवस) को ‘हिल प्लांटेशंस एम्प्लाइज यूनियन’ (HPEU) ने अपने पंजीकरण की घोषणा करते हुए काम शुरू किया। मार्गरेट्स होप, धोत्रे, पेशोक, बड़ाफागु, बालासन जैसे विभिन्न बागानों में कई कार्यक्रम चल रहे थे, वहीं रिंगटोंग बागान में उसी मानसून में एक जोरदार आंदोलन हुआ। द्विपक्षीय समझौते के जरिए वह मामला अभी थोड़ा शांत ही हुआ था कि पंखाबाड़ी के पास स्थित लांगव्यू चाय बागान का आंदोलन सिर उठाने लगा। जुलाई 2024 के अंत में यूनियन की एक शाखा गठित की गई।

लांगव्यू आंदोलन: 2024
    
मजदूरों के बकाया 16.9 करोड़ रु. के भुगतान की मांग को लेकर कई डेपुटेशन और द्विपक्षीय बैठकों के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला, तो 17 अगस्त से धरना शुरू हुआ और चाय की पत्तियां तोड़ने का काम बंद कर दिया गया। 6 सितंबर को एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें बकाया राशि के भुगतान की एक निश्चित समय-सीमा तय की गई। यह मजदूरों की पहली महत्वपूर्ण जीत थी। हालांकि, एक-दो महीने पैसे देने के बाद आखिरकार मालिक पक्ष ने उस समझौते को तोड़ दिया।
    
जब पूरे चाय क्षेत्र में मजदूरों के बोनस आंदोलन के दौरान लांगव्यू मालिक ने केवल 10 प्रतिशत बोनस देने की बात कही, तो मजदूरों ने अनशन शुरू कर दिया। दूसरी ओर, पूरे पहाड़ में बोनस आंदोलन का सुर अभूतपूर्व रूप ले चुका था। पुलिस के दमन, मुकदमों, सत्ताधारी पार्टी और प्रशासन की धमकियों की परवाह किए बिना विभिन्न बागानों के निडर मजदूर भारी संख्या में सड़कों पर उतर आए। अंततः सरकार को सभी बागानों में 16 प्रतिशत बोनस की एडवाइजरी जारी करना पड़ी, लेकिन लांगव्यू के मालिक ने इसे देने से इनकार कर दिया। मजदूरों के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए, उन्हें शारीरिक उत्पीड़न और मौखिक अपमान भी सहना पड़ा। आखिरकार, लगातार 32 दिनों के अनशन के बाद मालिक पक्ष को झुकना पड़ा और 9 नवंबर को सभी को 16 प्रतिशत बोनस मिला।

लांगव्यू बागान का जंगलराज
    
हाजिरी और वेतन में ढिलाई, पीएफ तथा ग्रेच्युटी का गबन और एलटीए, डीएलआई, पेंशन एवं एरियर को लेकर टालमटोल तो था ही। इसके अलावा, कई मजदूरों के सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर जाने के बाद भी कंपनी ने उन्हें रिटायरमेंट नहीं दिया, ताकि उन्हें ग्रेच्युटी और पीएफ न देना पड़े। नतीजतन, उन बुजुर्ग मजदूरों को मजबूरी में काम करते रहना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त कागजातों में अनगिनत खामियां, UAN नंबर न होना, और मजदूरों को विभिन्न कानूनी सुविधाओं से वंचित रखने के आरोप भी हैं। मजदूरों के अनुसार, लंबे समय से चला आ रहा भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
    
अनगिनत मजदूर परिवार घोर आर्थिक संकट में फंसकर आजीविका की तलाश में दूसरी जगहों पर पलायन करने को मजबूर हुए हैं। दूसरी ओर, चाय बागान में नए पौधे लगाने या चाय के पौधों को पुनर्जीवित करने के लिए कोई प्रभावी कदम न उठाए जाने के कारण मजदूरों को सांप, बिच्छू, हाथी और तेंदुए के डर से भरे खतरनाक माहौल में काम करना पड़ रहा है। फलस्वरूप, उनका जीवन और सुरक्षा लगातार खतरे में बनी हुई है।
    
इसके साथ ही, अपनी ही जमीन/आवास के अधिकार की अनिश्चितता से उपजी मजदूरों की पीड़ा- ‘परजा-पट्टा’ (भूमि स्वामित्व का अधिकार पत्र) की मांग ‘जहां जो जैसा है’ के आधार पर है। कई वादों के बावजूद वह भी आज तक अधूरी है।

2026: प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और जायज अधिकारों की लड़ाई
    
2026 में लांगव्यू के मजदूरों के संघर्ष का मुख्य केंद्र बिंदु मालिक पक्ष द्वारा प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी से जुड़ी धोखाधड़ी बन गया। मजदूरों ने फस्ट फ्लश की पत्तियां तोड़ना शुरू किया, तो मालिक पक्ष ने हाजिरी और वेतन देने में ढिलाई बरतनी शुरू कर दी। मजदूरों की 250 रु. की दैनिक मजदूरी में से पीएफ के नाम पर रोज काटे जाने वाले 30 रु. भी मालिक ने जमा नहीं किए थे, मालिक के अपने हिस्से की बात तो दूर की है।
    
मजदूरों के आंदोलन के दबाव में 10 मार्च को कोलकाता में श्रम मंत्री के कार्यालय में त्रिपक्षीय बैठक हुई। समझौता हुआ कि मालिक 15 अप्रैल तक मजदूरों के अंशदान का 3.5 करोड़ रु. प्रोविडेंट फंड खाते में जमा कराएगा। लेकिन समझौता लागू न होने पर मजदूरों को 20 अप्रैल से क्रमिक अनशन (रिले हंगर स्ट्राइक) शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा। चुनाव के कारण 21 अप्रैल को पुलिस ने आकर अनशन समाप्त करने को कहा। 25 अप्रैल से फिर से क्रमिक अनशन शुरू हुआ।
    
अनशन मंच पर ही क्रमबद्ध रूप से मई दिवस, बिरसा मुंडा जयंती (9 जून), 1955 के मार्गरेट्स होप गोलीकांड का चाय मजदूर शहीद दिवस (25 जून), गोरखा जातीयता आंदोलन का शहीद दिवस (27 जुलाई) और कई अन्य कार्यक्रम आयोजित किए गए।
    
आंदोलन के समर्थन में कुर्सांग, मिरिक, सौरेनी, गाड़ीधुरा, दूधिया, बागराकोट सहित विभिन्न स्थानों पर हस्ताक्षर अभियान चलाए गए, जहां चाय बागान के मजदूरों और आम युवाओं का व्यापक समर्थन देखने को मिला। सिलीगुड़ी में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने प्रेस कांफ्रेंस की, कोलकाता में श्रम विभाग में CSTU के साथियों ने डेपुटेशन दिया। दिल्ली में पीएफ दफ्तर में CSTU और MASA के साथियों ने मांगें रखीं। कई जगहों से एकजुटता, सहानुभूति और मदद मिलने लगी।
    
PF का बड़ा हिस्सा जमा न करने के कारण म्च्थ्व् ने 1 जुलाई को बागान का दफ्तर, कारखाना और बंगला सील कर दिया। मामला दर्ज हुआ, वारंट जारी हुआ, लेकिन मालिक ने जमानत करवा ली। 22 जुलाई को मालिक के खिलाफ एक और थ्प्त् दर्ज की गई। इसके परिप्रेक्ष्य में, प्रोविडेंट फंड का पैसा EPFO में जमा न करने के आरोप में 25 जुलाई को लांगव्यू चाय बागान के मालिक गोविंद गर्ग को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 5 दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। पश्चिम बंगाल के मजदूर आंदोलन के इतिहास में पीएफ के लिए किसी मालिक की गिरफ्तारी की यह एक दुर्लभ घटना है।
    
दूसरी ओर, विभिन्न कदमों की प्रगति का हवाला देकर अनशन आंदोलन वापस लेने के लिए मंत्रियों, विधायकों और उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारियों द्वारा बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद मजदूरों ने विनम्रतापूर्वक लेकिन स्पष्ट शब्दों में कह दिया - वे वादों को नहीं, केवल ठोस कदमों को ही स्वीकार करेंगे।
    
26 जुलाई को मजदूरों के संघर्ष के प्रति एकजुटता प्रकट करने के लिए ‘हिल प्लांटेशंस एम्प्लाइज यूनियन’ की पहल पर तथा ‘लांगव्यू परिवर्तन मूवमेंट’, ‘लाली गुरास’, ‘गोरखालैंड एक्टिविस्ट समूह’, ‘इवान फाउंडेशन’ सहित विभिन्न संगठनों के सदस्यों, विभिन्न क्षेत्रों के छात्र-युवाओं, चाय मजदूरों और समाजसेवियों ने दार्जिलिंग के चैरास्ता (माल) से ‘चलो लांगव्यू’ पदयात्रा शुरू की। 
    
दूसरी ओर, बागान में एक विशाल ‘चेतावनी जुलूस’ का आयोजन किया गया। ‘चलो लांगव्यू’ पदयात्रा दो दिनों तक पैदल चलकर अनशन के 95वें दिन जब अनशन मंच की ओर बढ़ी, तो उनके स्वागत के लिए सैकड़ों मजदूर कतारबद्ध खड़े थे। 
    
कलकत्ता उच्च न्यायालय की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच में पीएफ मामले के संदर्भ में लांगव्यू चाय बागान के मालिक पक्ष ने बताया कि उन्होंने पीएफ की बाकी रकम में से 2 करोड़ रु. परसों ही जमा कर दिए हैं, लेकिन वहां भी उन्हें कोई छूट नहीं मिली, हाईकोर्ट ने मजदूरों की मजदूरी से काटे गए बाकी 1.32 करोड़ रु. दो हफ्ते के भीतर चुकाने का निर्देश दिया है। तब तक कोर्ट ने पीएफ आफिस से कोई कड़ा कदम न उठाने का अनुरोध किया है। कुल मिलाकर, अनशन आंदोलन के 99वें दिन इस गौरवशाली मजदूर आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की है।
    
100वें दिन अनशन मंच पर अनशनकारियों का नया जत्था 72 घंटे के अनशन पर बैठ गया है।
 

(साभार: संघर्षरत मेहनतकश फेसबुक वाल से) 

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