पिछले महीने जब एप्पल के नये आई फोन की बिक्री खुली तो देश के कुछ शहरों में दुकानों के सामने उसे खरीदने वालों की लम्बी-लम्बी कतारें देखने को मिलीं। आई फोन के पहले संस्करणों के मामले में भी ऐसा हो चुका था। सरकार समर्थक भोंपुओं ने इस बार भी शोर मचाया कि एक लाख रुपये से ज्यादा कीमत का फोन खरीदने की ये कतारें दिखाती हैं कि मोदी राज में देश में समृद्धि कितनी तेजी से बढ़ रही है। ऐसा कहते हुए उन्होंने एकदम सुविधापूर्वक यह भुला दिया कि खुद सरकार के अनुसार देश के अस्सी करोड़ लोग सरकार द्वारा दिये जा रहे मुफ्त पांच किलोग्राम राशन पर जिन्दा हैं।
तब भी आई फोन का नया संस्करण खरीदने के लिए लगने वाली यह कतार कुछ तो दिखाती है। जब यह खबर आती है कि एक व्यक्ति ने यह फोन खरीदने के लिए अपनी एक किडनी बेच दी तो कुछ तो मतलब बनता है।
आज स्मार्ट फोन को लेकर यह दीवानगी सामान्य उपभोक्तावाद से कुछ ज्यादा है। पूंजीपति वर्ग ने अपने मालों की अधिकाधिक बिक्री के लिए समूची बीसवीं सदी में उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया। ‘असेम्बली लाइन’ के ‘मास प्रोडक्शन’ के साथ यह बखूबी आगे बढ़ा। दैनिक उपभोग की बहुत सारी नयी चीजें ईजाद हुईं तथा अपेक्षाकृत व्यापक दायरे तक पहुंची। कारें, फ्रिज, एसी, टीवी, इत्यादि इनमें से कुछ प्रमुख थीं। इन्हें हासिल करना जीवन का लक्ष्य बनने लगा। जीवन का मूल्य और सार्थकता इनमें ढूंढ़ी जाने लगी। ये सामान्य जरूरत की चीजों से आगे बढ़कर अपनी अलग हैसियत हासिल करने लगी। इनके उपयोग मूल्य के बदले इनका हैसियत मूल्य ज्यादा महत्वपूर्ण होने लगा। बल्कि हैसियत मूल्य ही इनका उपयोग मूल्य हो गया। अधिकाधिक श्रम विभाजन के जरिये इंसानों के श्रम ही हैसियत और इस कारण इंसानों की हैसियत घटती गयी जबकि उपभोक्ता सामानों की हैसियत बढ़ती गयी।
उपभोक्तावाद के इस दौर में तब भी इंसान ही उपभोक्ता सामानों का मालिक होता था और उनकी हैसियत से अपनी हैसियत हासिल करता था। एक सीमित अर्थ में ही ये सामान इंसानों के मालिक होते थे। जब किसी की हैसियत किसी दूसरे से तय होने लगे तो दूसरा स्वभावतः ही एक अर्थ में पहले वाले का मालिक होने लगता है। दूसरा पहले को चलाने लगता है। उपभोक्तावादी सामान इंसानों के जीवन की गति को तय करने लगते हैं।
जिस हद तक स्मार्ट फोन एक चमकता-दमकता उपभोक्तावादी सामान है, उस हद तक उपरोक्त बातें उस पर भी लागू होती हैं। अच्छी से अच्छी कंपनी का अच्छे से अच्छा स्मार्ट फोन और उसका बिल्कुल नया संस्करण खरीदना शान की बात हो जाती है। उसे हाथ में चमकाने की बात ही कुछ और होती है। यहां तक कि कुछ आम मजदूर भी अपनी मासिक मजदूरी के दुगुने-तिगुने दाम वाला स्मार्ट फोन खरीद लेते हैं- किस्तों पर।
लेकिन तब भी स्मार्ट फोन और उसके जरिये संचालित स्मार्ट गैजेट्स का मामला सामान्य उपभोक्तावाद से कहीं आगे का है। यह मामला चतुर मशीनों और बुद्धू इंसान का है। मशीनें (स्मार्ट फोन और स्मार्ट गैजेट्स) अधिकाधिक चतुर या स्मार्ट होती जा रही है जबकि उनके मालिक इंसान अधिकाधिक बुद्धू या इडियट। हम उस समय से बहुत आगे निकल आये हैं जब मशीनें चतुर इंसानों का औजार मात्र हुआ करती थीं।
आज स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने वालों को जरा भी एहसास नहीं होता कि वे फोन को नहीं चला रहे हैं बल्कि फोन उनको चला रहा है। यह बिल्कुल शाब्दिक अर्थों में भी होता है जब किसी जगह पहुंचने के लिए व्यक्ति अपने स्मार्ट फोन में ‘रूट मैप’ लगा लेता है लेकिन यह एकदम बौद्धिक मामलों में भी होता है जब स्मार्ट फोन व्यक्ति को निश्चित लेखों, किताबों य किन्हीं अन्य स्रोत तक ले जाता है। इससे भी ज्यादा रोज-ब-रोज के संचार और मनोरंजन में स्मार्ट फोन व्यक्ति को चलाता है। यह इस कदर होता है कि व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसके घंटे कहां गुजर गये। एक तरह से अर्द्ध-मदहोशी की दशा में व्यक्ति स्मार्ट फोन की स्क्रीन पर उंगलियां चलाता रहता है।
यदि स्मार्ट फोन के मामले में इंसान की हालत ऐसी हो गयी है तो उसे अत्यन्त चतुर ही माना जाना चाहिए। उसके ‘स्मार्ट’ होने का यह खास मतलब है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
अभी ज्यादा समय नहीं हुए जब आम आदमी के मनोरंजन की दुनिया में टी वी का बोलबाला था। विकसित देशों में यह 1960-70 के दशक में हुआ था जबकि अपने देश में 1980-90 के दशक में। तब लोग घंटों टी वी के सामने बैठे रहते थे। आर के लक्ष्मण का एक कार्टून इस प्रसंग में मौजूं है। उसमें दिखाया गया था घर के सारे सदस्य अपने ड्राइंग रूम में कुछ इस तरह बैठे हुए हैं मानो वे टी वी देख रहे हों जबकि टी वी वाली जगह खाली थी। कार्टून में नीचे लिखा था- ‘हालांकि टी वी ठीक होने के लिए गया हुआ है पर तब भी लोग आदतवश बैठे हुए हैं’।
विकसित देशों में तब टी वी को ‘बुद्धू बक्सा’ (इडियट बाक्स) नाम दिया गया था जिसका मतलब यह था कि टी वी लोगों को बुद्धू बना देता था। इसके मनोरंजन के कार्यक्रम अत्यन्त सतही होते थे (इसके सीरियलों को ‘सोप आपेरा’ नाम दिया गया जिसका मतलब था साबुन बेचने के लिए घटिया संगीत-नृत्य नाटक)। इसमें प्रस्तुत समाचार व अन्य कार्यक्रम सूचनाओं की भरमार करते थे पर इंसान को समझदार नहीं बनाते थे। इसके उलट लोग बुद्धू बनते थे। यह परिणाम न केवल बाजार की जरूरत से निकलता था (ज्यादा से ज्यादा लोगां को आकर्षित करने के लिए सरल से सरल मनोरंजन और समाचार जिसमें सनसनी और उत्तेजना का पुट भी हो) बल्कि शासक वर्गीय जरूरतों के मद्देनजर सचेत तौर पर भी किया जाता था। यह पूंजीपति वर्ग के तात्कालिक मुनाफे और उसकी व्यवस्था की रक्षा दोनों के लिए बहुत मुफीद था। यह अकारण नहीं था कि वामपंथी दायरे के लोग ‘बुद्धू बक्सा’ से इतना खफा रहते थे।
लेकिन तब भी बुद्धू बक्से का लोगों पर प्रभाव किसी हद तक निष्क्रिय रहता था। टी वी पर कोई कार्यक्रम कितना असर डाल रहा है, इसको जांचने का कोई सटीक तरीका भी नहीं था। समय-समय के सर्वेक्षण का मुंहा-मुंही बात ही इसका कोई अंदाज देते थे। बुद्धू बक्सा लोगों को बुद्धू बना तो रहा था पर एकतरफा क्रिया के जरिये। टी वी तब स्मार्ट या चतुर नहीं था। तब फ्रिज, कार, एसी और धुलाई मशीन इत्यादि भी स्मार्ट नहीं थे। अब ये मशीनें स्मार्ट हो गयी हैं और फिलहाल इनके केन्द्र में है स्मार्ट लोग। सारे स्मार्ट गैजेट्स स्मार्ट फोन से जुड़ कर अपनी चतुराई दिखा रहे हैं।
चतुर स्मार्ट फोन टी वी से इस मायने में भिन्न है कि वह लोगों पर निष्क्रिय और एकतरफा तरीके से प्रभाव नहीं डाल रहा है। बल्कि वह सक्रिय ढंग से लगातार लोगों से क्रिया-प्रतिक्रिया करते हुए उन्हें प्रभावित कर रहा है। वह लोगों की हर गतिविधि पर नजर रख रहा है और इस कारण वह उनकी भावनाओं का भी कमोबेश सटीक आकलन कर ले रहा है। किस तरह की भावना में कोई व्यक्ति क्या इच्छा करेगा या क्या करना चाहेगा इसका पूर्वानुमान लगाते हुए वह अत्यन्त अदृश्य और सूक्ष्म तरीके से उसे निर्देशित भी कर सकता है। इंटरनेट पर उपलब्द्ध किसी सामग्री को देखने-सुनने को प्रेरित करने से लेकर शापिंग माल या किसी रेस्ट्रां में ले जाने का काम भी वह कर सकता है।
यह सब करने के लिए इंटरनेट की बड़ी टेक्नालाजी कंपनियों- गूगल, मेटा या फेसबुक, अमेजन, माइक्रोसाफ्ट, एप्पल, ट्रेन्सेन्ट, इत्यादि- ने स्मार्टफोन के जरिये लोगों की हर गतिविधि को रिकार्ड करने का एक भारी-भरकम तंत्र विकसित कर लिया है। इसके जरिये वे विशाल पैमाने का डाटा इकट्ठा करते हैं तथा फिर उस डाटा के विश्लेषण के जरिये वे भविष्यवाणी करते हैं कि किसी निश्चित दशा में उपभोक्ता क्या करेगा। इसे प्रयोग में लाया जाता है और फिर नये सिरे से डाटा इकट्ठा किया जाता है। यह अनवरत चलता रहता है और भविष्यवाणी ज्यादा सटीक होती जाती है। ठीक इसी कारण स्मार्ट फोन धारक को अपने हिसाब से चलाना ज्यादा सटीक होता जाता है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का यह वह पहलू है जिस पर शायद ही कभी चर्चा होती हो। बड़ी टेक कंपनियों से लेकर सरकारें तक सब सचेत तौर पर इस पर चुप्पी साधे हुए हैं।
स्मार्ट गैजेट्स और स्मार्ट फोन के जरिये आज बड़ी टेक कंपनियां लोगों की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। उनके सामने लोगों की निजता का कोई मतलब नहीं है। वे जानती हैं कि लोग अपने शयन कक्ष में क्या कर रहे हैं। निजता के इतने शोर-शराबे के इस जमाने में यह अजीब बात है कि निजता के इस घोर उल्लंघन की कोई खास चर्चा नहीं है। लोगों ने स्वेच्छा से अपनी निजता बड़ी टेक कंपनियों को समर्पित कर दी है। लगता है कि लोगों को इससे कोई आपत्ति नहीं है।
पर यह ऊपरी तौर पर है। असल में तो ज्यादातर लोगों को बड़ी टेक कंपनियों द्वारा निजता के इस घोर उल्लंघन का पता भी नहीं है। उन्हें पता नहीं कि स्मार्ट गैजेट्स और स्मार्ट फोन के जरिये उनके पल-पल की जानकारी इन कंपनियों के सर्वर को भेजी जा रही है और रिकार्ड हो रही है जिसका बाद में इस्तेमाल किया जायेगा। जिन्हें पता भी है वे ज्यादा कुछ कर नहीं सकते। जिन्दगी का ढर्रा कुछ इस तरह का बन गया है कि बिना स्मार्ट फोन के व्यक्ति अपंग सा हो जाता है। आम आदमी के लिए वह अनिवार्य सा हो गया है। और इसे इस्तेमाल करने के लिए बड़ी टेक कंपनियों के सामने समर्पण करना मजबूरी है। बिना इसके कोई भी स्मार्ट फोन या उस पर ऐप ढंग से काम नहीं करेंगे। इसी तरह स्मार्ट गैजेट्स भी काम नहीं करेंगे। इससे भी आगे, बड़ी टेक कंपनियां बिना ग्राहक की अनुमति के भी उसका डाटा इकट्ठा कर सकती हैं। इस मामले में उनकी क्षमता सरकारों से कहीं-कहीं ज्यादा है।
इस तरह स्मार्ट फोन या स्मार्ट गैजेट्स से होने वाली सुविधा की खातिर या मजबूरी में लोग अपनी निजता को दांव पर लगा देते हैं और परिणाम स्वरूप वे चतुर मशीनों के शिकार हो जाते हैं।
सवाल उठता है कि इन चतुर मशीनों के वास्तविक संचालकों या बड़ी टेक कंपनियों का इनमें उद्देश्य क्या है? उनका उद्देश्य है अपने ग्राहकों को विज्ञापन करने वाली कंपनियों या अन्य ऐसे संस्थानों-लोगों के सामने परोसना जो उन्हें प्रभावित करने में रुचि रखते हैं। किसी माल को बनाने वाली कंपनी अपने माल का विज्ञापन करती है और चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उस विज्ञापन को देखें और उससे प्रभावित होकर वह माल खरीदें। कोई नेता या पार्टी चाहती है कि लोग उसके विज्ञापन देखें और उससे प्रभावित होकर उसे वोट दें। कोई अन्य किसी और उद्देश्य के लिए लोगों को प्रभावित करना चाहेगा मसलन कोई बाबा अपना आध्यात्मिक प्रवचन बेचना चाहेगा। कोई मशहूर हस्ती के रूप में स्थापित होना चाहेगा।
बड़ी टेक कंपनियां अपने ग्राहकों को ऐसे लोगों के सामने परोसती हैं और बदले में पैसा कमाती हैं। और यही उनका मूल लक्ष्य होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि विज्ञापन की दुनिया में बड़ी टेक कंपनियों का हिस्सा तेजी से बढ़ता जा रहा है यानी विज्ञापन पर खर्च होने वाला पैसा ज्यादा से ज्यादा उनकी झोली में जा रहा है।
एक रूप में देखें तो यह किस्सा पुराना है। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को प्रकाशित करने का उनके मालिकों का उद्देश्य पैसा कमाने का होता था जो ज्यादातर उनमें छपने वाले विज्ञापनों से होता था। इसी तरह टी वी चैनलों के मालिकों का उद्देश्य उन पर विज्ञापन के जरिये पैसा कमाना होता था। अब बड़ी टेक कंपनियों का भी यही उद्देश्य है जो स्मार्ट फोन पर अपने ऐप के जरिये ये कर रही हैं। पहले ‘हार्डवेयर’ कागज से निर्मित अखबार व पत्रिका थे, फिर ट्यूब या चिप्स से निर्मित इलेक्ट्रानिक टी वी और अब इलेक्ट्रानिक स्मार्ट फोन। एप्पल की खासियत यह है कि वह ‘हार्डवेयर’ और ‘साफ्टवेयर’ दोनों बनाती है। वह अपने ही स्मार्ट फोन अपने आपरेटिंग सिस्टम और अपने ऐप से चलाती है।
लेकिन इस पुराने किस्से में जो कुछ नया है वह बहुत मारक है। उद्देश्य अभी भी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। माध्यम भी विज्ञापन है। पर जिस तरीके से यह किया जा रहा है वह एकदम नया है और सभ्यता-संस्कृति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला। बड़ी टेक कंपनियों का लक्ष्य है कि लोग उनके इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियां बन जायें जिन्हें फिर वे उन लोगों के सामने परोस सकें जो इन कठपुतलियों को अपने हिसाब से चलाना चाहते हों। कोई माल खरीदवाना, वोट दिलवाना, दंगे करवाना या तालियां बजवाना सारा तब आसान हो जाएगा। लोगों को ऊपरी तौर पर यही लगेगा कि वे अपनी मर्जी से चल रहे हैं पर असल में अदृश्य शक्तियों से संचालित हो रहे होंगे।
इंसान एक सामाजिक प्राणी है। इंसान के व्यक्तित्व, उसकी इच्छाओं-आकांक्षाओं, पसंदगी-नापसंदगी, नैतिकता इत्यादि सबका निर्माण समाज में और समाज के द्वारा होता है। बदले में अकेला इंसान पूरे समाज से अंतर्क्रिया करते हुए उस पर कुछ असर भी डालता है- सचेत और अचेत दोनों तरीकों से।
इस तरह दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करना मानव समाज का हमेशा से हिस्सा रहा है। इसी तरह वर्गीय समाजों में सरकार द्वारा या शासक वर्गों द्वारा लोगों को नियमित-संचालित करने की कोशिशें होती रही हैं- भौंड़े व सूक्ष्म दोनों तरीकों से। पूंजीवादी जनतंत्र में नेता और पार्टियां भी यह करने का प्रयास करते हैं।
चतुर मशीनों के आज के दौर में फर्क यह आया है कि यह कुछ बड़ी एकाधिकारी निजी कंपनियों द्वारा सारी दुनिया के पैमाने पर अत्यन्त व्यापक, सघन और सूक्ष्म तरीके से किया जा रहा है- ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए। चंद पूंजीपति अपने मुनाफे की हवस में आधुनिक तकनीक के जरिये बाकी मानवता को जीवित रोबोट में तब्दील कर देने की कोशिश कर रहे हैं। आज के छुट्टे पूंजीवाद के जमाने में वे धड़ल्ले से बिना रोक-टोक के इसे करते चले जा रहे हैं। यह विज्ञान-तकनीक के विकास के ‘दुरुपयोग’ का अप्रतिम नमूना है।
इस आधुनिक तकनीक के विकास में समूची मानवता की मुक्ति की संभावना भी छिपी है। इसमें समूची मानवता के बौद्धिक-सांस्कृतिक विकास ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया के पैमाने पर योजनाबद्ध उत्पादन-वितरण तथा चीजों के प्रबंधन की संभावना भी छिपी है। पर यह संभावना तब तक फलीभूत नहीं हो सकती जब तक यह तकनीक पूंजी के अधीन रहती है- उसका मुनाफा बढ़ाने के साधन के तौर पर। तब तक चतुर मशीनें और चतुर होती जायेंगी और इंसान और बुद्धू।