कांवड़ यात्रा और कांवड़िये

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही जगह 2017 से भाजपा की सरकारें हैं। उत्तर भारत में हर साल जुलाई-अगस्त (सावन) के महीने में कांवड यात्रा शुरू होती है। इस यात्रा में कांवड़िये हरिद्वार से गंगा जल उत्तर भारत के अलग-अलग राज्यों में ले जाते हैं और शिव मंदिरों में इसे चढ़ाते हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पिछले नौ सालों से इस कांवड़ यात्रा का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश और नये-नये फरमान जारी कर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का काम करती रही है। 
    
कांवड़ यात्रा के दौरान मार्ग में पड़ने वाली मीट की दुकानों को बंद करा दिया जाता है (अभी हाल ही में एक दुकान पर नान वेज बिरयानी मिलने पर उसे बुलडोजर से ढहा दिया गया), स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई रोक दी जाती है, हाइवे को वन वे कर दिया जाता है जिससे भारी जाम की स्थिति पैदा हो जाती है। 
    
कांवड़ यात्रा के दौरान योगी सरकार द्वारा कांवड़ियों पर हेलीकाप्टर से फूल गिराये जाते हैं। शासन प्रशासन और पुलिस प्रशासन के आला अफसर कांवड़ियों के पैर दबाते पाये जाते हैं (इस बार तो उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री तक ने कांवडियों के पैर धोने का काम किया)।  
    
यह कांवड़ यात्रा का एक पहलू है। दूसरा पहलू इस यात्रा की अश्लीलता, भौंडापन, उपद्रव है। कांवड़ को किसी वाहन की जरा सी खरोंच पर कांवड़ियों द्वारा जो उत्पात मचाया जाता है वो रौंगटे खड़े कर देता है। उ.प्र. के हापुड़ जिले में कांवड़ियों ने एक 24 वर्षीय मुसलमान युवक की इसलिए पीट-पीट कर हत्या कर दी कि उसकी मिनी ट्रक कांवड़ियों को लिए हुए आटो रिक्शा से टकरा गयी थी। गाड़ियों (यहां तक कि पुलिस की गाड़ियों को भी) को तोड़ा-फोड़ा जाता है वो भी पुलिस की मौजूदगी में। महिलाओं-बच्चों तक को नहीं बख्शा जाता है। तेज व कर्कश ध्वनि के डीजे जिस रास्ते से गुजरते हैं वहां के बाशिंदों का सोना दूभर कर देते हैं, कई बुजुर्ग तो दिल में धकड़न के बढ़ जाने से परेशान हो जाते हैं। अश्लील नाच-गाना और खुलेआम नशाखोरी (शराब, चरस, गांजा, भांग और न जाने क्या) इसके धार्मिकता वाले पहलू को हवा में कपूर की तरह उड़ा देता है।
    
इस बार कांवड़ यात्रा को कुंभ मेले की तरह प्रायोजित किया गया। कांवड़ यात्रा में ज्यादा से ज्यादा लोग पहुंचें इसकी पूरी व्यवस्था उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड सरकार ने की। आर एस एस और उसके अनुषंगी संगठनों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका इन आयोजनों को करवाने में रहती है। 
    
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जो हिन्दू हृदय सम्राट बनने में मोदी से आगे निकलना चाहते हैं, जुमे की नमाज के सड़क पर पढ़े जाने का विरोध करते हुए कहते हैं कि सड़क चलने के लिए होती है, नमाज सड़क पर पढ़ने से आने-जाने वाले लोगों को परेशानी होती है, जाम लगता है, लेकिन कांवड़ यात्रा के दौरान वे पूरे हाइवे को ही बंद कर देते हैं जिससे पूरे-पूरे दिन के जाम लगते हैं। मरीजों को ले जाने वाली एंबुलेंस जाम में फंस जाती हैं लेकिन तब उन्हें वह सब याद नहीं आता जो नमाज पढ़ने के बारे में उन्होंने बोला था। धर्म के नाम पर मीट की दुकानों को बंद करना लेकिन शराब की दुकानों को खुले रखना भी योगी सरकार के साम्प्रदायिक रुख को ही दिखाता है। 
    
कांवड़ लाने वाले युवाओं पर योगी सरकार फूल बरसाती है लेकिन जब वही युवा रोजगार की मांग करते हैं तो योगी उन्हें खुले मंच से धमकी देते हैं और उनकी पुलिस उन पर लाठी भांजती है।
    
कांवड़ यात्रा के दौरान पहले छोटी-छोटी कांवड़ लोग लाते थे जो उनकी धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक होती थी लेकिन आज कांवड़ यात्रा को हिन्दू फासीवादियों ने अपने हिसाब से ढाला है। उन्होंने पाखंड को अन्य धार्मिक आयोजनों की तरह इसमें भी शामिल करवा दिया है। कांवड़ यात्रा के दौरान 51 किलो, 101 किलो तक पानी को लाने वाली कांवड़ यात्राओं का बढ़ता प्रचलन, कई-कई लाख रुपये की कांवड़, बड़े-बड़े और तेज संगीत वाले डी जे और उन पर होने वाला फूहड़ नाच गाना, कांवड़ियों के बीच बढ़ती नशाखोरी कोई और ही कहानी कहता है। इस धार्मिक पाखण्ड और इसमें हिन्दू फासीवादियों की बढ़ती भूमिका को आज समझने की जरूरत है। 

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