कहे सतलुज का पानी -सुरजीत पातर

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कहे सतलुज का पानी
कहे ब्यास की रवानी

अपनी लहरों की ज़ुबानी
हमारा झेलम चिनाब को सलाम कहना
हम मांगते हैं ख़ैर, सुबह शाम कहना
जी सलाम कहना !

रावी इधर भी बहे
रावी उधर भी बहे
ले जाती कोई सुख का सन्देश सा लगे
इसकी चाल को प्यार का पैग़ाम कहना
हम मांगते हैं ख़ैर, सुबह शाम कहना
जी सलाम कहना !

जहां सजन के क़दम
जहां गूंजते हैं गीत
जहां उगती है प्रीत
वही जगह है पुनीत
उन्हीं जगहों को हमारा प्रणाम कहना
हम मांगते हैं ख़ैर, सुबह शाम कहना
जी सलाम कहना !

जब मिलना तो मिलना
गहरा प्यार लेकर
जब बिछड़ना तो
मिलने का इक़रार लेकर
किसी शाम को न अलविदा की शाम कहना
हम मांगते हैं ख़ैर, सुबह शाम कहना
जी सलाम कहना !

दीवारें हों और ऊपर तस्वीरें
सुन्दर भी हों दीवारें
पर अन्धी न हों
दरवाज़े-खिड़कियां भी हों
दरस-परस का भी रहे इन्तज़ाम कहना
हम मांगते हैं ख़ैर, सुबह शाम कहना
जी सलाम कहना !

(साभार : कविता कोश 
पंजाबी से अनुवाद : योजना रावत)

आलेख

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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