चार श्रम संहिताएं लागू
21 नवम्बर को मोदी सरकार ने चार श्रम संहिताओं को लागू करने की घोषणा कर दी। इन श्रम संहिताओं के जरिये सरकार ने मजदूर वर्ग द्वारा बीते सौ वर्षों में संघर्षों के दम पर हासिल तमाम अधिकारों को एक झटके में छीन लिया। एक तरह से मजदूरों को ढेरों मामलों में अधिकार विहीनता की स्थिति में धकेल दिया गया। मजदूर वर्ग पर इतने क्रूर हमले के बावजूद निर्लज्ज मोदी सरकार प्रचार माध्यमों के जरिये ‘श्रमेव जयते’ का नारा लगा इन बदलावों को मजदूर हितैषी बताने में जुटी हुयी है। इस तरह का प्रचार किया जा रहा है कि इन संहिताओं से मजदूर वर्ग को ढेरों नयी सुख-सुविधायें मिल जायेंगी, उसका जीवन खुशहाल हो जायेगा। भेड़िये की तरह हमलावर मोदी सरकार सेण्टा क्लाज के रूप में पेश की जा रही है और मजदूरों को सेण्टा क्लाज के उपहारों से भरमा कर भेड़िये के मुंह पर लगे मजदूरों के खून को छिपाने की कोशिश की जा रही है।
2019 व 2020 में पारित इन घोर मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को लागू करने की सरकार ने बीते 5 वर्षों में काफी तैयारियां की थीं। जगह-जगह प्रांतीय स्तर पर इसके कई प्रावधानों को लागू कर सरकार ने मजदूर वर्ग के गुस्से की मात्रा का अनुमान लगाया। सरकार द्वारा 5 वर्षों तक इन संहिताओं को लटकाये रखने में एक बड़ी भूमिका मजदूर वर्ग के प्रतिरोध की भी थी। इस प्रतिरोध की संभावना को ही ध्यान में रखते हुए सरकार इन संहिताओं के लागू करते ही इसके पक्ष में भारी मात्रा में झूठे-भरमाने वाले प्रचार में जुट गयी। कहने की बात नहीं कि भाजपा-संघ से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ भी इन संहिताओं को मजदूरों के हित में प्रचारित करने लगा।
इन संहिताओं के जरिये संगठित मजदूरों का यूनियन बनाना, हड़ताल करना, मालिकों से सौदेबाजी करना यानी कुल मिलाकर पूंजी से संघर्ष करना कठिन बना दिया गया है। मजदूरों के संगठित संघर्ष को कठिन बना कर जुमलेबाज सरकार न्यूनतम वेतन, नियुक्ति पत्र, एक वर्ष सेवा के बाद ग्रेच्युटी, निःशुल्क वार्षिक जांच, सबको सामाजिक सुरक्षा के दावे कर रही है। प्रश्न यही उठता है कि कागजों पर लिखे इन अधिकारों को बगैर संगठित संघर्ष मजदूर वर्ग लागू कैसे करा पायेगा। जाहिर है कि ये अधिकार सरकारी प्रचार से ऊपर उठ कर तभी धरातल पर उतर सकते हैं जब मजदूर वर्ग इन्हें लागू कराने के लिए व्यापक संघर्ष छेड़ेगा और संघर्ष की राह ही मोदी सरकार ने कठिन बना दी है।
निर्लज्ज मोदी सरकार इन श्रम संहिताओं को एक साथ मजदूर व मालिक दोनों के लिए फायदेमंद बता रही है। वह मजदूरों को वर्ग संघर्ष से दूर करके वर्ग सहयोग की भावना अपनाने का उपदेश दे रही है। वह कह रही है कि मालिक व मजदूर एक परिवार की तरह रहकर परस्पर सहयोग कर देश का विकास करेंगे। सरकार की इन घोर पूंजीपरस्त बातों को पहचानना कठिन काम नहीं है।
इसी तरह सरकार इन संहिताओं के पक्ष में दावा कर रही है कि अब तक सारे अधिकार संगठित मजदूरों को हासिल थे कि अब पहली बार असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ मजदूरों को भी उसने तमाम अधिकार दे दिये हैं। सरकार का यह दावा भी पाखण्ड के सिवाय कुछ नहीं है। अगर संगठित मजदूरों के अधिकार छीने जायेंगे, उनकी हालत कमजोर होगी तो असंगठित मजदूर जो असंगठित होने के चलते संघर्ष नहीं कर सकते, वे और अधिक दुर्दशा के शिकार होंगे। अगर फैक्टरियों में 12 घण्टे का कार्यदिवस होगा तो असंगठित क्षेत्र में यह 12 घण्टे से भी अधिक का बना दिया जायेगा।
पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी और श्रम का अंतरविरोध ही समाज का प्रधान अंतरविरोध होता है। पूंजी और श्रम शक्ति इस अंतरविरोध के दो विरोधी पहलू हैं। पूंजी श्रम शक्ति को यानी मजदूर को शोषण की हद तक निचोड़ना चाहती है तो मजदूर अपनी श्रम शक्ति की बिक्री की वाजिब शर्तों के लिए पूंंजी से संघर्ष करता है। पूंजीवादी व्यवस्था में यह संघर्ष निरंतर जारी रहता है। श्रम कानून इस संघर्ष को नियमित करने का काम करते हैं। जब मजदूर वर्ग का पलड़ा भारी होता है यानी वह एकजुट हो संघर्ष तेज करने की स्थिति में होता है तो वह श्रम कानूनों में नये अधिकार सूत्रित करवा लेता है और जब उसके संघर्ष कमजोर स्थिति में होते हैं और पूंजी को हमलावर होने का मौका मिलता है तो वह बने कानूनों को भी मानने से इंकार कर देती है या फिर वर्तमान श्रम संहिताओं की तरह नये कानूनों से मजदूरों के तमाम अधिकार छीन लेती है।
इसीलिए पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी वे श्रम के बीच वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग की बात करना दरअसल पूंजीपतियों के हित में मजदूर वर्ग को बरगलाने के सिवा कुछ नहीं है। यही काम मोदी सरकार कर रही है।
पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर वर्ग संगठित हो संघर्ष कर कुछ कानूनी अधिकार तो हासिल कर सकता है पर अपने शोषण से मुक्ति हासिल नहीं कर सकता। शोषण से मुक्ति के लिए जरूरी है कि पूंजी व पूंजीपति वर्ग का अंत हो जाये। ऐसा समाजवादी व्यवस्था से होते हुए अंततः साम्यवादी व्यवस्था में ही संभव है। इसीलिए मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक मिशन एक ऐसे वर्गविहीन समाज साम्यवादी समाज की स्थापना है जहां कोई वर्ग न हो व कोई किसी का शोषण न कर सके। इस साम्यवादी समाज की ओर बढ़ने के पहले कदम के रूप में मजदूर वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था का अंत कर एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था कायम करनी होगी जिसकी सत्ता मजदूर वर्ग के हाथ में हो।
पिछली सदी में जब दुनिया में एक मजबूत समाजवादी खेमा कायम हुआ था तो दुनिया भर में मजदूर आंदोलन आगे बढ़ रहा था पूंजीवादी देशों में भी मजदूर वर्ग संघर्ष कर तमाम अधिकार हासिल कर ले रहा था। पर समाजवादी देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने मजदूर आंदोलन को गहरी क्षति पहुंचायी और दुनिया भर में मजदूर वर्ग का क्रांतिकारी संघर्ष कमजोर पड़ते हुए पीछे हटने लगा। मजदूर आंदोलन टूट-फूट बिखराव का शिकार हो गया। पूंजी को हमलावर होने का मौका मिल गया। भारत भी इससे अछूता नहीं था। यहां भी उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के जरिये मजदूर वर्ग पर हमला बोला गया। श्रम कानूनों में लिखे तमाम अधिकार लागू होने बंद हो गये। और इन्हीं मजदूर संघर्षों की कमजोर स्थिति में ही पूंजी नयी श्रम संहितायें थोपने की स्थिति में पहुंच गयी।
पर ये तथ्य यही बताते हैं कि मजदूर वर्ग जैसे ही प्रत्युत्तर देना शुरू करेगा, जैसे ही पीछे हटना छोड़ हमला बोलना शुरू करेगा, जैसे ही अपनी क्रांतिकारी पार्टी में संगठित हो आगे बढ़ेगा वैसे ही स्थिति फिर बदलना शुरू हो जायेगी। वह फिर से शोषकों को पीछे ढकेलते हुए नये श्रम कानून ही नहीं हासिल करेगा बल्कि पूंजी का तख्ता पलटते हुए समाजवादी समाज कायम करते हुए अपने ऐतिहासिक मिशन की ओर बढ़ जायेगा। तब न फासीवादी मोदी सरकार का दुष्प्रचार और न कोई अन्य ताकत उसकी राह रोक पायेगी। आज वक्त मजदूर वर्ग को शासकों के हमले के प्रत्युत्तर के लिए तैयार करने का है। मजदूर वर्ग को उसके ऐतिहासिक मिशन पर खड़ा करने का है। मजदूर वर्ग की जीत और पूंजीपति वर्ग की पराजय दोनों तय हैं। भले ही आज पूंजी नया हमला बोलने में कामयाब हुई हो पर कल को उसे शिकस्त खानी ही होगी।