छात्रों-युवाओं की जीत के बाद सरकार व संघी लम्पटों के हमले

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं का संघर्ष इतिहास रच चुका है। किसी के आगे न झुकने का दम्भ भरने वाली मोदी सरकार को छात्रों-युवाओं ने झुकने को मजबूर कर दिया। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लेकर ही छात्र-युवा जंतर-मंतर से हटे। हालांकि सरकार ने आंदोलनकारी छात्रों पर कोई मुकदमा-कार्यवाही न होने का वायदा किया था। पर आंदोलन समाप्त होते ही न केवल सरकार बल्कि संघी लम्पट वाहिनी भी आंदोलनकारी छात्रों को धमकाने-निशाना बनाने में जुट गयी। जेलों में बंद आंदोलनकारियों की रिहाई से सरकार आनाकानी करने लगी। 
    
इस संघर्ष, जिसे जेन जी का संघर्ष कहा जा रहा है, ने छात्र-युवा संघर्षों में पूरे देश के पैमाने पर नयी उम्मीद-उत्साह का संचार किया है। इसने बीते डेढ़ दशक से संघी सरकार व संघी लम्पट वाहिनी द्वारा कालेज परिसरों में कायम किये जा रहे आतंक-भय के माहौल से उपजे छात्रों-युवाओं के आक्रोश को व्यक्त किया। इसने पूंजीवादी मीडिया व संघी ताकतों द्वारा गढ़ी मोदी की महामानव की छवि को तार-तार कर दिया। मोदी महामानव से गिरकर छात्रों के मीम्स का मुद्दा बन गये। 
    
संघर्ष का मुद्दा भले ही पेपर लीक का था व मुख्य मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी पर दिल्ली, कलकत्ता-बिहार सब जगह छात्रों-युवाओं का जो हुजूम सड़कों पर उमड़ा वह बताता है कि बीते 3-4 दशक और खासकर मोदी काल में देश की बदहाल होती जा रही शिक्षा व्यवस्था व बढ़ती बेकारी का दंश झेल रहे छात्रों-युवाओं की सहनशक्ति अब समाप्त हो चुकी है। कि अब वे संघ-भाजपा के हिन्दू-मुसलमान के तांडव व फर्जी राष्ट्रवाद से आजिज आ चुके हैं। कि अब उन्हें और भरमाया नहीं जा सकता।
    
शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा व बढ़ती बेकारी के लिए वैसे तो देश की पूंजीवादी व्यवस्था दोषी है पर बीते 3-4 दशकों की उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने शिक्षा को चैपट और सम्मानजनक-सुरक्षित रोजगार को स्वप्न सरीखा बना दिया है। इन्हीं नीतियों के चलते एनटीए-कोचिंग माफियाओं-शिक्षा विभाग का एक ऐसा गिरोह बन चुका है जहां हर पेपर लीक होने के साथ बाजार में बिकते नजर आ रहे हैं। ऐसे में 10 साल की सजा व 50 लाख जुर्माने (व संगठित अपराध के लिए न्यूनतम 7 साल की सजा और एक करोड़ रु. जुर्माना) के संघी सरकार के कठोर कानून से पेपर लीक की समस्या जरा भी हल नहीं होने वाली। पेपर लीक को एक हद तक निजी एजेंसियों-कोचिंग माफियाओं पर लगाम कस, एन टी ए को भंग कर, सरकार द्वारा पेपर सम्पन्न कराने की प्रक्रिया अपने हाथ में लेकर ही रोका जा सकता है। यह सब उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को पलटे बगैर संभव नहीं है।
    
इस संघर्ष में 20 जुलाई के प्रदर्शन व उसके बाद कलकत्ता-बिहार व कई अन्य जगहों पर प्रदर्शनकारी छात्रों ने राजसत्ता की क्रूरता को अपने शरीरों पर झेला। पुलिस की लाठियां-पैलेट गन, आंसू गैस व गोलियों के साथ छात्राओं के कपड़े नोंचने की हरकतों ने दिखाया कि संघी शासन में पुलिस-प्रशासन किस कदर बेरहम व क्रूर हो चुका है। 
    
संघर्ष के पश्चात अपनी हार से बौखलायी सरकार व संघी लम्पट संगठन संघर्षरत छात्रों पर हमलावर हो उठे। जगह-जगह ढूंढ-ढूंढ कर संघी लम्पट संघर्ष में शामिल छात्रों पर हमला बोलने लगे। वहीं सरकार मुकदमे वापसी के वायदे से मुकर कर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय की आड़ में कि राज्य एफ आई आर पर जांच कर सकते हैं, छात्रों-युवाओं पर नये-नये हमले बोलने लगी। छात्रों-युवाओं के दिलों से पुलिस-संघी लम्पट वाहिनी का डर-भय संघर्ष की प्रक्रिया में कमजोर पड़ गया था, ये कवायदें उसे फिर से स्थापित करने का प्रयास है। पर ये कितने भी हमले कर लें इस हकीकत को नहीं बदल सकते कि छात्रों-युवाओं ने अपने संघर्ष से दम्भी सरकार को झुका दिया है और आगे भी वे लड़कर सरकार को झुका सकते हैं। छात्रों-युवाओं से ये चेतना कोई नहीं छीन सकता।
    
जरूरत है कि छात्र-युवा अपनी इस पहलकदमी को बनाये रखें। वे काकरोच पार्टी के आह्वान के भरोसे न रहकर देश के हर कोने-अंतरे में एकजुट हो अपने हक-हकूक की लड़ाई लड़ें। वे भगत सिंह की दिखायी राह पर चलते हुए उस इंकलाब की तैयारी करें जो लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था का अंत कर समाजवाद के नये सबेरे का आगाज करेगा। 

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