उपराष्ट्रपति धनखड़ के अचानक इस्तीफे पर तरह-तरह की अटकलबाजियां की जा रही हैं। हर कोई इस बात पर एकमत है कि धनखड़ द्वारा स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफे की जो बात कही गयी वह सच्चाई से कोसों दूर है। यह भी जगजाहिर है कि मोदी-शाह के इस्तीफा लेने अथवा महाभियोग से हटाने की धमकी के बाद ही यह इस्तीफा दिया गया।
स्पष्ट है मोदी-शाह की जोड़ी ही आज देश की सत्ता संचालन के केन्द्र में है। इनके आगे किसी मंत्री की तो बात छोड़िये संवैधानिक पदों पर बैठे लोकसभा-राज्यसभा के स्पीकरों-राष्ट्रपति तक की कोई औकात नहीं है। इसीलिए ये हर उस व्यक्ति को सबक सिखाने में कोई देरी नहीं कर रहे हैं जो इनके इशारे पर न चल रहा हो या इनसे पूछ कर काम न कर रहा हो। इन्हें थोड़ी बहुत चुनौती संघ या उ.प्र. के मुखिया योगी की तरफ से ही मिलती रही है।
पर कल तक सरकार के समर्थन में निर्लज्जता से विपक्षी सांसदों को अपमानजनक ढंग से टोकने वाले धनखड़ से मोदी-शाह क्यों नाराज हो गये, इस पर तरह-तरह के अनुमान लगाये जा रहे हैं। कोई यह कह रहा है कि धनखड़ मोदी की तस्वीरों के साथ अपनी भी तस्वीरें लगवाना चाह रहे थे तो कोई मोदी-शाह की इच्छा के उलट जस्टिस वर्मा-शेखर यादव पर महाभियोग राज्यसभा में चलाने की विपक्षी मांग को स्वीकारने को कारण बता रहा है। तो कोई बिहार चुनाव के मद्देनजर किसी बिहारवासी को उपराष्ट्रपति की गद्दी देने के लिए धनखड़ को हटाने के पीछे देख रहा है।
कारण कुछ भी हो यह स्पष्ट है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठी जोड़ी धनखड़ से नाराज थी। और धनखड़ को जबरन पद से इस्तीफा देने को मजबूर किया गया। कभी जाट वोटों को साधने के लिए धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाया गया था।
देश की सत्ता जब दो फासीवादियों के हाथ में केन्द्रित हो जाये। जब सत्ताधारी दल के नेताओं-सदस्यों-मंत्रियों का ही सारा जनवाद छिन जाये, जब सारे निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय ही करने लग जाये तब आम जनता के जनवादी अधिकारों की स्थिति समझी जा सकती है। स्पष्ट है कि यह स्थिति सारे जनवाद को कुचलकर फासीवादी तानाशाही की ओर ले जा रही है।
भारत का शासक एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग इस जोड़ी की तानाशाही को पूर्ण समर्थन दिये हुए है। ये जोड़ी भी पूंजी के हित में देश के सारे संसाधन निर्लज्जता से लुटाने में जुटी है। ऐसे में संघ-भाजपा का शासन आम जनता के लिए हालात बद से बदतर बनाता जा रहा है। उसकी आर्थिक दुर्दशा बढ़ रही है और उसे सरकार का विरोध करने के अधिकार से भी दूर किया जा रहा है।
संघ-भाजपा के भीतर वर्चस्व को लेकर टकराहटें हैं। धनखड़ प्रकरण या योगी-संघ की मोदी-शाह से नाराजगी इसी को दर्शाते हैं। पर ये फासीवादियों के भीतर के झगड़े हैं। जहां तक पूंजीपति वर्ग की चाकरी व जनता को साम्प्रदायिक वैमनस्य की ओर धकेलने की बात है, ये एकमत हैं। इसीलिए मोदी-शाह के वर्चस्व के शिकार होने वाले धनखड़, शिवराज सिंह, खट्टर आदि किसी सहानुभूति के पात्र नहीं हैं। ये जिस फासीवादी राजनीति के झण्डाबरदार हैं उसी के खुद शिकार हुए हैं। इन्होंने ताउम्र बबूल के पेड़ को रोपा है अब उसके कांटे चुभने की ये शिकायत नहीं कर सकते।