मानेसर औद्योगिक इलाके में पिछले 2 अप्रैल से ठेका मजदूरों के संघर्ष शुरू हुये थे। ये संघर्ष स्वतः स्फूर्त थे। ठेका मजदूरों के इस आंदोलन की मुख्यतः मांगें न्यूनतम वेतन में बढ़ोत्तरी, ओवरटाइम का डबल भुगतान, बोनस की अदायगी, फैक्टरी का आई कार्ड, सम्मानजनक काम का अधिकार इत्यादि थीं। इन मांगों के साथ होण्डा फैक्टरी के ठेका मजदूरों का यह संघर्ष 2 अप्रैल से शुरू हुआ था। 2 अप्रैल को होण्डा के ठेका मजदूर इन मांगों के साथ काम छोड़कर फैक्टरी गेट पर जमा हुये। 3 अप्रैल को पुलिस-प्रशासन ने इन मजदूरों को फैक्टरी गेट से हटाकर मानेसर तहसील में भेज दिया। 3 अप्रैल को लगभग 700-800 की संख्या में मजदूर मानेसर तहसील में जमा हुये। मजदूरों ने अपना धरना शुरू किया। मजदूर अनुशासन में धरना चला रहे थे। सुबह लगभग 10 बजे पुलिस-प्रशासन ने मजदूरों को कहा कि आप अपनी कमेटी को तैयार करो हम आपकी वार्ता करायेंगे और कोई भी मजदूर कानून व्यवस्था को अपने हाथ में नहीं लेगा। पुलिस की मौजूदगी भी अच्छी-खासी संख्या में थी। मजदूरों ने अपने बीच से 20 मजदूरों की कमेटी का चयन कर वार्ता में भेज दिया। मजदूरों की मांग थी कि उन्हें इस समय जो न्यूनतम वेतन मिल रहा है वह लगभग 11 हजार के आस-पास है। उन्हें काट पीटकर लगभग साढ़े नौ हजार रुपये मिलते हैं। गैस की किल्लत ने उन्हें भूखा मरने पर मजबूर कर दिया है। हम मजदूरों को यहां गैस 500 से 600 रुपये किलो मिल रही है। हमारी दैनिक मजदूरी से गैस की कीमत ज्यादा हो गई है। मजदूरों ने यह भी बताया कि हम कमरे पर खाना नहीं बनाते क्योंकि गैस नहीं है और हम फैक्टरी में ही खाना खाकर आते हैं।
दिनांक 3 अप्रैल को 2 घंटे वार्ता चली। वार्ता में प्रबंधन, श्रम विभाग, पुलिस-प्रशासन भी मौजूद था। वार्ता खत्म कर मजदूर धरने पर आये और मजदूरों को बताया कि हमारा समझौता हो गया है। प्रबंधन ने हमारी मांगें मान ली हैं। कमेटी के साथियों ने मजदूरों को सम्बोधित कर बताया कि प्रबंधन ने हमारी जो मांगें मानी हैं उनमें यह है कि हमारी 8 घंटे की न्यूनतम मजदूरी अब 16 हजार रुपये हो गई है, दिवाली पर बोनस दिया जायेगा, रात की शिफ्ट का अलांउस दिया जायेगा। इन मांगों को प्रबंधन ने स्वीकार कर लिया है और दो दिनों के भीतर समझौते का ड्राफ्ट तैयार कर प्रबंधन, श्रम विभाग व मजदूरों की कमेटी के हस्ताक्षर कर लिये जायेंगे। मजदूर इस समझौते से खुश नजर आ रहे थे। क्योंकि मजदूरों ने अपनी न्यूनतम मजदूरी में 5 हजार रुपये की बढ़ोत्तरी करवाई थी। इसके बाद मजदूरों ने धरना समाप्त कर दिया।
इस बात की खबर मानेसर की अन्य फैक्टरियों के ठेका मजदूरों को लगी तो दिनांक 4 अप्रैल को मुन्जाल शोवा व सत्यम फैक्टरी के ठेका मजदूरों ने हड़ताल कर दी। हड़तालों का यह सिलसिला 7 अप्रैल तक चलता रहा। 7 अप्रैल को गारमेंट फैक्टरी के मजदूर भी हड़ताल कर मानेसर तहसील पहुंच गये। 7 अप्रैल को लगभग 7 फैक्टरियों के मजदूर मानेसर तहसील में मौजूद थे। इन सभी फैक्टरियों के मजदूरों की कमेटियां बन चुकी थीं और ये कमेटियां प्रबंधन व श्रम विभाग के साथ वार्ता कर रही थीं। एक के बाद एक फैक्टरी में हो रही इन हड़तालों को देखते हुये पुलिस-प्रशासन के हाथ-पैर फूलने लगे और दिनांक 7 अप्रैल को लगभग 7 बजे पुलिस ने मजदूरों को हिदायत दी कि सब मजदूर मानेसर तहसील को खाली कर दें। मानेसर तहसील में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया। धीरे-धीरे मजदूर मानेसर तहसील से निकलने लगे।
दिनांक 7 अप्रैल को हम वहीं मानेसर तहसील में मौजूद थे। पहले तो सी.आई.ए. ने तीन साथियों इंकलाबी मजदूर केन्द्र के राजू, हरीश और आकाश को मानेसर तहसील से उठाया। आकाश मुन्जाल शोवा फैक्टरी के ठेका मजदूरों की वार्ता बाॅडी में था। आकाश को वार्ता खत्म होने के बाद जैसे ही वह बाहर निकला, उठा लिया। इंकलाबी मजदूर केन्द्र के श्यामवीर और बेलसोनिका यूनियन के अजीत को रात 10ः30 बजे उनके कमरों से उठाया गया। काफी पूछताछ के बाद सभी को रात लगभग 1ः30 बजे छोड़ा गया। पुलिस ने हमें हिदायत दी कि आप मानेसर में नहीं आयेंगे।
दिनांक 8 अप्रैल को मजदूर सुबह मानेसर तहसील पहुंच गये। मानेसर तहसील में पुलिस बल बड़ी संख्या में मौजूद था लेकिन मजदूर अपनी मांगों के साथ डटे हुये थे। 8 अप्रैल को रात में हरियाणा सरकार ने घोषणा की कि हरियाणा का न्यूनतम वेतन 11,200 से बढ़कर 15,200 रुपये कर दिया गया है। इस घोषणा से मजदूर 9 अप्रैल को काम पर लौट गये। लेकिन गारमेंट क्षेत्र की दो फैक्टरियों के मजदूर अपनी फैक्टरी के गेट पर बैठ गये और प्रबंधन से गुजारिश करने लगे कि जो न्यूनतम वेतन हरियाणा सरकार ने बढ़ाया है फैक्टरी प्रबंधन अपने फैक्टरी गेट के नोटिस बोर्ड पर इसको दर्ज करें और यह लिखें कि अब मजदूरों को यह बढ़ा हुआ वेतन मिलेगा। प्रबंधन ने यह करने से मना कर दिया और पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने मजदूरों पर लाठी चार्ज किया। उस स्थान पर तोड़फोड़ किसने की? वाहन में आग किसने लगाई? यह सवाल अब भी मौजूद है। जब पुलिस वहां मौजूद है तो मजदूर तोड़-फोड़ व आगजनी करें, यह नहीं हो सकता। 12-12 घंटे कार्य करने वाले मजदूर यह काम नहीं कर सकते। जैसा कि हर आंदोलन में होता है कि संघर्षों का दमन करने का यह राज्य का पुराना तरीका है। यही यहां पर हुआ। इस घटना के बाद 13 मजदूरों को पुरानी धारा 307 लगा जेल में डाल दिया गया। लगभग 44 मजदूरों को अन्य धाराओं में जेल में डाल दिया गया जिसमें 22 महिला मजदूर थीं। इसके अलावा 12 अप्रैल को इंकलाबी मजदूर के 6 कार्यकर्ताओं को मजदूरों को भड़काने के आरोप में जेल में डाल दिया गया।
दिनांक 9 अप्रैल को जब यह घटना हुई तो इंकलाबी मजदूर केन्द्र के 6 कार्यकर्ताओं में से कोई भी घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। बल्कि 9 अप्रैल को हम ट्रेड यूनियनों के साथ मिलकर लघु सचिवालय गुड़गांव पर डी.सी. गुड़गांव को मानेसर में जो घटनाक्रम हुआ, उस पर ज्ञापन दे रहे थे। अजीत को लघु सचिवालय गुड़गांव से सी.आई.ए. ने उठाया, उसके बाद अन्य साथियों को। हमें फिर पूछताछ के बाद रात 11 बजे छोड़ दिया गया। दिनांक 12 अप्रैल को हम सभी 6 साथियों को अपने-अपने कमरों से रात 11 बजे उठाया गया। उसके बाद सी.आई.ए. वाले हमें नौरंगपुर थाने में ले गये और हमें कपड़े उतरवाकर हवालात में बंद कर दिया। हवालात में ही पेशाब करने के लिये एक बड़ी सी बोतल रख दी। पानी पीने के लिये दो लीटर की एक बोतल रख दी। जो सिपाही हवालात के बाहर ड्यूटी पर था, उसका व्यवहार बहुत खराब था। गालियों के साथ बात करना ये तो पुलिस वालों का सामान्य व्यवहार होता है। सुबह के समय लगभग 7 बजे हमें चाय दी गई। 9 बजे के लगभग हम सभी साथियों के दस्तावेज तैयार होने लगे। लगभग दो घंटे में कागजात तैयार किये गये। लेकिन हमें यह नहीं बताया गया कि हमें गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने हमें कोई जानकारी नहीं दी। दो बजे के आस-पास हमारे लिये एक थाली में खाना लाया गया जो कि हवालात में ही दरवाजे के नीचे से दे दिया गया। पुलिस स्टेशन में मानवीय व्यवहार की उम्मीद करना बेमानी है यह हमें वहां प्रत्यक्ष दिखाई दिया। लगभग 4 बजे के आस-पास हमें गाड़ियों में बैठा कर कोर्ट में पेश करने के लिये ले जाया गया। कुछ दूरी पर चलने के बाद पुलिस वालों ने हमें दो कोरे कागज दिये और बोले कि इस पर जहां हम बोले वहां हस्ताक्षर करो। एक साथी ने बोला कि कोरे कागजों पर हस्ताक्षर कैसे करें। तब एक पुलिस अधिकारी ने डांटते हुये बोला कि करते हो या वापिस लेकर चलें पुलिस स्टेशन उसके बाद तुम अपने आप कर दोगे। हमने कोरे कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये। उसके बाद हमें गुड़गांव के सिविल अस्पताल लेकर जाया गया जहां उन्होने मेडिकल के नाम पर बस हमसे पूछा कि पुलिस ने मारपीट तो नहीं की है और हमारी शर्ट उतरवाकर देखी। उसके बाद हमें कोर्ट में पेश कर दिया गया। कोर्ट में पेश करने से पहले हमारी गिरफ्तारी की सूचना परिजनों को नहीं दी गई। जैसे ही हम कोर्ट में पहुंचे तो हमारे साथी वहां खड़े मिले। कोर्ट ने हमें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उसके बाद पुलिस ने हमें लगभग शाम 6ः30 बजे भौंडसी जेल पहुंचा दिया।
जेल का अनुभवः- दिनांक 13 अप्रैल को शाम 6ः30 बजे हम 6 साथियों को भौंडसी जेल भेज दिया गया। जेल में जाते ही पुलिस वालों ने लाईन में खड़ा कर दिया। जेल के अधिकारी हमारे दस्तावेज से नाम पुकार कर हमारी डिटेल पूछने लगे। हमने सारी जानकारी दी। उसके बाद वहां से हमें जेल के प्रशासनिक कार्य करने वाले अधिकारियों के पास भेज दिया गया। जहां एक कमरे में बेंच पर लगभग 20 लोग बैठे हुये थे। वहां पर हर एक व्यक्ति की पूरी जानकारी भरी जा रही थी। इस प्रक्रिया में लगभग 2 घंटे लग गये। हमें पता लगा कि प्रशासनिक कार्य करने वालों में ज्यादातर कैदी हैं जिनको सिस्टम पर कार्य करना आता है। जब हमारी सारी जानकारी भर गई तो एक व्यक्ति हमें लेने आया। हम उस दिन कुल 26 लोग जेल में आये थे। लगभग रात 8 बजे हमारी लाइन बना कर जेल में डाल दिया गया। हमें 22 नम्बर ब्लाॅक में भेजा गया। जहां हमें 2 दिन रखा गया उसे मुलाहजा बोला जाता है। मुलाहजे में हमें जेल के नियम बताये गये। जो मुलाहजे में अंडर ट्रायल वालों की देखरेख करता है वह सजायाफ्ता कैदी होता है जिसे नम्बरदार कहते हैं। उसने सभी की तलाशी ली और जेल के नियम समझाये। इन सभी 26 लोगों में 3-4 को छोड़कर बाकी सभी नौजवान थे। उसके बाद हमें खाना खाने के लिये बोला गया। एक प्लेट में दो लोगों को खाने के लिये बोला गया। सभी को हिदायत दी गई कि खाना खाने के बाद सभी अपनी प्लेट खुद धुलेंगे। कोई किसी से अपनी प्लेट नहीं धुलवायेगा। उसके बाद हम सभी को नीचे बिछाने के लिये कम्बल और ओढ़ने के लिये कम्बल दिये गये। सुबह 7 बजे बैरक खुली और एक हवलदार गिनती के लिये आया। गिनती के बाद सभी को पार्क की साफ-सफाई के लिये ले जाया गया। एक घंटे तक साफ-सफाई की गई। इसके बाद सभी के लिये चाय व डबल रोटी आ गई। चाय में दूध की मात्रा बहुत कम थी और अदरक ज्यादा थी। उसके एक घंटे बाद खाना आ गया। खाना खाने के बाद बैरक की सफाई करवाई गई। 6-7 नौजवान लोगों को छांटा गया और उनसे सफाई करवाई गई। एक दिन मुझसे भी बैरक में पोंछा लगवाया गया। हम तीन लोगों ने मिलकर पोंछा लगाया। रात के खाने के बाद हम 6 साथियों ने बैठकर एक जगह आंदोलन पर डिस्कशन किया। अगली सुबह फिर 7 बजे बैरक खोल दी गई व गिनती की गई। उसके बाद नम्बरदार ने बताया कि सभी के बाल छोटे किये जायेंगे जिसकी दाढ़ी बड़ी है उसकी दाढ़ी भी छोटी की जायेगी। बाल काटने के बाद हम नहाये नहीं क्योंकि न हमारे पास कपड़े थे, न हमारे पास तौलिया था। इसलिये बस मुंह धुल लिया गया। 15 अप्रैल को सभी को जेल के हास्पीटल में ले जाया गया। वहां पर पेशाब का सैम्पल लिया गया और खून के सैम्पल लिये गये। उसके बाद हमारे साथी हमसे मुलाकात के लिये आये। हमारी सबकी मुलाकात हो गई थी बस राजू की मुलाकात नहीं हुई। हमारे साथी हमारे लिये कपड़े लेकर आये। शाम तक हमारे कपड़े हमारे पास पहंुच गये। दिनांक 15 अप्रैल को 5 बजे के आस-पास हमारे को बैरकों में भेज दिया गया। हम 6 साथियों को जेल के फेस-1 में भेज दिया गया जहां पर सिर्फ 302 और 307 मुकदमे वालों को रखा जाता है। हरीश, अजीत और आकाश को एक बैरक में भेजा गया और राजू, पिंटू व श्यामवीर की अलग-अलग बैरक थी। हम लगभग 5ः30 बजे बैरक में पहुंचे जहां पर बीड़ी व सिगरेट के धुंए के गुबार हवा में तैर रहे थे और बैरक के लगभग सारे लोग हमारे चारों तरफ आकर खड़े हो गये। सभी ने हमसे पूछा कि किस केस में अंदर आये हो। हमने उनको बताया कि हम मजदूरों के संघर्ष के मामले में अदंर आये हैं। हमसे पूछा गया कि आप कहां से हो तो हम तीनों ने अपना पूरा परिचय दिया।
दो दिन बाद हमें बैरक का पूरा मामला समझ में आया। बैरक में 70 अंडर ट्रायल के लोग थे। जिनमें ज्यादातर 302 मुकदमे वाले थे। बैरक चार हिस्सों में बंटी हुई थी यानी बैरक में 4 भाग थे। बैरक में 5 टाॅयलेट थे। एक बड़ी होदी थी जो नहाने के लिये इस्तेमाल होती थी। होदी में पानी चलता रहता था और पीने का पानी भी इसी से भरा जाता था।
सुबह 7 बजे बैरक खुलती थी और गिनती होती थी। उसके बाद चाय के लिये दूध आता था। हर एक के लिये 250 एम.एल. दूध आता था। बैरक में गु्रप बने होते हैं। किसी गु्रप में 10 लोग हैं तो किसी में 12 लोग। हमारी बैरक में लगभग 7 गु्रप थे। सभी गु्रप के लिये लोगों के अनुसार चाय का दूध व खाना दिया जाता था। अजीत और हरीश एक ग्रुप में थे और आकाश अलग ग्रुप में। हमारे ग्रुप में 10 लोग थे। चाय बनाने के लिये व दाल में तड़का लगाने के लिये छोटी-छोटी भट्ठियां बनाई गई थीं जो कोयले से चलती थीं। उन भट्ठियों पर खाना पकाने वाले वो लोग थे जो मजदूर पृष्ठभूमि से थे। जेल में जिनके पास पैसे नहीं होते उनको उन ग्रुप के सभी लोगों की चाय बनानी, दाल-सब्जी में तड़का लगाना व रोटियां पकानी पड़ती थीं। उसके बाद ग्रुप के सभी लोगों के खाने के बर्तन साफ करने होते थे। चाय बनाने के लिये चाय-पत्ती, चीनी व तड़के के लिये प्याज, टमाटर, अदरक, लहसुन सब कैंटीन से मिलता था। कैंटीन में खाने के लिये फ्रूट से लेकर ड्राई फ्रूट, दही, लस्सी, बिस्किट, नमकीन, बीड़ी, सिगरेट सब मिल जाती थी। बस आपके पास पैसे होने चाहिये।
हमारी बैरक में मजदूर पृष्ठभूमि के काफी लोग थे जो पैसा न होने के कारण भट्ठियों में खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई का काम करते थे। बैरक में भी मजदूर-मालिक का रिश्ता बना हुआ था। जिनके पास पैसे नहीं थे उनको जेल में काम करना पड़ता था। यू.पी., बिहार के लोग काफी संख्या में हमारी बैरक में थे।
मैंने जेल में देखा कि इतनी बड़ी नौजवान आबादी को जेलों में बंद कर दिया गया है जो उत्पादन से कटी हुई है। इतनी बड़ी आबादी को जेल में रखना, उनकी तारीखों पर कोर्ट में ले जाने के लिये लिये बड़े पैमाने पर संसाधन खर्च होते हैं और इसके लिये जो पैसा खर्च किया जाता है वह उन्हीं मजदूर मेहनतकशों की जेब से आता है जिसको पूंजीपति लूटता है। शासन सत्ता अपराध के कारणों पर कोई बात नहीं करेगी। मजदूर मेहनतकश आबादी की मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं को जेल में डाल कर उनके साथ अपराधियों की तरह व्यवहार किया जाता है।
जेल में राजनीतिक कैदियों को पढ़ने-लिखने के लिए किताबें, कागज, पैन नहीं मिलता। जेल में बस नाम का पुस्तकालय था जिसमें जाने के लिये आपको हर रोज जेल प्रशासन के चक्कर काटने पड़ते थे। हम बड़ी मुश्किल से एक बार पुस्तकालय में जा पाये। जब पुस्तकालय को देखा तो उसमें धार्मिक किताबें ज्यादा थीं। बड़ी मुश्किल से हमें वहां मुंशी प्रेमचन्द और मैक्सिम गोर्की जैसे लेखकों की गिनी-चुनी किताबें मिलीं। अखबारों का भी यही हाल था। बस कुछ लोकल अखबार आपको जेल में पढ़ने के लिये मिलेंगे।
जेल के अनुभव से पता लगा कि हम बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट गये हैं। बाहर क्या हो रहा है, मई दिवस कैसा मना होगा, अन्य संगठन इस दमन पर कैसे आंदोलन कर रहे होंगे, यह सब सवाल उठ रहे थे। जब साथी मुलाकात करने आते तो हमें इंतजार रहता था कि मिलकर पता लगेगा कि आंदोलन कैसा चल रहा है। हमें साथियों की मुलाकात का इंतजार रहता था कि अब हमें पता लगेगा एक हफ्ते में क्या-क्या हुआ।
मजदूर आंदोलन में जो मजदूरों को संगठित करने वाली ताकतें हैं उनके साथ सत्ता का टकराव हमेशा से चलता आ रहा है। सत्ता हमेशा आंदोलनों को रोकने के लिये दमन का सहारा लेती रही है और नेतृत्वकारी मजदूरों को जेल में डालती रही है। यहां भी यही होना था और यही हुआ। यह अनुभव आगे के संघर्षों में काम आयेगा और हमें और ज्यादा तैयार करेगा कि हम सत्ता के दमन के आगे हार न मानने वाले साहस का परिचय दें।
-जेल से लौटे इमके के एक कार्यकर्ता