बांग्लादेश : हसीना सरीखे हश्र की ओर बढ़ती यूनुस सरकार

/bangladesh-hasinaa-sareekhe-hashra-ki-aur-badati-yunus-sarkara

शेख हसीना सरकार की रुखसती को अभी वर्ष भर भी पूरा नहीं हुआ है कि बांग्लादेश की सड़कें एक बार फिर से प्रदर्शनों की गवाह बन रही हैं। यूनुस सरकार के प्रति बांग्लादेश की जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। और यूनुस को हसीना के हश्र तक पहुंचाने की चर्चायें आम होती जा रही हैं। 
    
9 माह पूर्व शेख हसीना छात्रों-मजदूरों के प्रदर्शनों व सेना के साथ छोड़ने के चलते देश छोड़कर भागने को मजबूर हुई थी। तब अमेरिकी साम्राज्यवाद परस्त यूनुस और कुछ छात्र नेताओं ने अंतरिम सरकार कायम की थी। इस सरकार ने चुनी हुई सरकार स्थापित करने का वादा किया था। पर 9 माह से यह सरकार किसी न किसी बहाने से चुनाव करवाने से बचती रही है। यहां तक कि सेना के साथ भी यूनुस सरकार का चुनाव के मुद्दे पर टकराव बढ़ रहा है। 
    
इस दौरान जो कदम इस सरकार ने उठाये, उससे जनता का तेजी से नयी सरकार से  मोहभंग होता गया। अमेरिकी साम्राज्यवादियों को देश की लूट की खुली छूट देना, कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा देना और अपनी ही जनता का दमन इस नयी सरकार के प्रमुख कारनामे रहे। 
    
अभी हाल ही में सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए ‘नया सेवा कानून’ लागू कर दिया। इस कानून के तहत सरकार को यह अधिकार दे दिया गया है कि चार प्रकार के अनुशासनात्मक उल्लंघनों के मामले में वह कर्मचारियों को केवल शोकॉज नोटिस देकर ही बगैर किसी विभागीय जांच के भी बर्खास्त कर सकती है। इस तानाशाही पूर्ण सेवा कानून के विरोध में समूचे बांग्लादेश के 18 लाख सरकारी कर्मचारी सड़कों पर उतर आये हैं। 
    
कर्मचारी संगठनों ने इस अध्यादेश को गैरकानूनी काला कानून करार दिया है और इसे रद्द करवाने के लिए कमर कस ली है। वे बीते कुछ दिनों से ‘‘काला कानून खत्म करो’’, ‘‘कोई समझौता नहीं केवल संघर्ष’’, ‘‘18 लाख कर्मचारी एक हो’’ आदि नारों के साथ सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। कर्मचारी संगठन सरकार से आर-पार की लड़ाई लड़ने का मन बना चुके हैं। 
    
कर्मचारियों के इस संघर्ष को कमजोर करने के लिए सरकार के समर्थक छात्र संगठन कर्मचारी आंदोलन के खिलाफ सड़कों पर उतरने लगे हैं। इससे सरकार समर्थक छात्र संगठन और कर्मचारियों में टकराव की संभावना पैदा हो गयी है। कर्मचारियों के आंदोलन को हसीना द्वारा संचालित होने का आरोप लगाकर बदनाम किया जा रहा है। 
    
कर्मचारियों के प्रदर्शन से सरकारी कामकाज एक तरह से ठप हो गया है। ढाका में सचिवालय तक में काम ठप पड़ गया है। एक ओर कर्मचारी नये कानून के खिलाफ संघर्षरत हैं तो दूसरी ओर प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक वेतन वृद्धि के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अनिश्चितकालीन अवकाश पर चले गये हैं। उधर ढाका साउथ सिटी में मेयर के पद पर चुने गये व्यक्ति को बैठाने के लिए कर्मचारियों ने संघर्ष छेड़ दिया है। सरकार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता इशराक हुसैन को मेयर बनाने को तैयार नहीं है और मेयर के पद पर सरकार प्रशासक बैठाने पर उतारू है। सरकार इस हेतु ऊपरी अदालत से आदेश ले आयी है। 
    
खालिदा जिया के बांग्लादेश लौटने, सेना-सरकार में बढ़ते अंतरविरोध, कर्मचारियों का संघर्ष, विदेशी कम्पनियों को लूट की खुली छूट पर स्थानीय कारोबारियों की नाखुशी, मजदूरों-मेहनतकशों की गिरती आर्थिक स्थिति, चुनाव न करवाने पर उतारू सरकार आदि मसले बांग्लादेश को फिर से भारी उथल-पुथल की ओर ले जा रहे हैं। बांग्लादेश की जनता 9 माह पूर्व अपनी ताकत को पहचान चुकी है। इसीलिए वो यूनुस सरकार के खिलाफ भी इसका इस्तेमाल शुरू कर रही है। हालांकि यदि जनसंघर्ष पूंजीवादी दलों के ही चंगुल में आगे बढ़ेगा तो जनता एक बार फिर पायेगी कि उसके मुद्दे अनसुलझे रह गये। जरूरत है मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी की स्थापना की जो बांग्लादेश को पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति की ओर ले जाये।  

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि