छात्र संघ चुनाव बंद करने की ओर बढ़ती उत्तराखंड सरकार

/chaatra-sangh-chunaav-band-karane-ki-or-badhate-uttaraakhand-sarkaar

उत्तराखंड के राजकीय विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में सत्र 2024-25 में छात्र संघ चुनाव नहीं कराए जाएंगे। उत्तराखंड उच्च न्यायालय नैनीताल ने दायर एक जनहित याचिका पर यह जनवाद विरोधी फैसला दिया है। जिसका आधार उत्तराखंड सरकार के एक पुराने शासनादेश को बनाया गया। जिसमें लिंगदोह कमेटी के अनुसार 30 सितम्बर तक चुनाव कराने की बात की गई थी। उत्तराखंड सरकार ने पहले समय से छात्र संघ चुनाव नहीं कराये फिर सरकार न्यायालय के हवाले से छात्र संघ चुनाव नहीं हो सकते हैं, की बात कर छात्र विरोधी कदम आगे बढ़ा रही है। 
    
राज्य में इस फैसले का लम्बे समय से छात्र संघ चुनाव की तैयारी कर रहे छात्र, छात्र संगठन व अन्य जनवादी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता विरोध कर रहे हैं।
    
छात्र संघ छात्रों की मांगों को सरकार, समाज तक ले जाने के लिए छात्रों का निर्वाचित मंच होता है। अतीत में छात्र मुद्दों को उठाने वाले छात्र संघ ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, महिला हिंसा के विरोध में आदि कई शानदार संघर्ष लड़े हैं जिनमें छात्र-नौजवानों सहित समाज की बड़ी भूमिका रही है। एक लोकतांत्रिक देश में चुनाव होना स्वस्थ परम्परा है।
    
लिंगदोह कमेटी के हवाले से सितंबर तक चुनाव करने की बात करने वाली सरकार ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों में की गई खर्च की सीमा और निजी कालेजों-विश्वविद्यालयों में चुनाव कराने के फैसलों को कभी लागू नहीं किया। इस मामले में सभी सरकारें एक रही हैं। सरकारें छात्र संघ चुनाव में धनबल, बाहुबल, गुंडागर्दी, क्षेत्रवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्ट संसदीय राजनीति, पूंजीवादी सडांध जैसे मुद्दों को छात्र संघ चुनाव तक फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं। इसकी जगह छात्रों के वास्तविक मुद्दों शिक्षा, रोजगार व अन्य सामाजिक मुद्दों, आदि से छात्र संघों को दूर करती रही हैं। इन्हीं कामों को लागू करने के लिए लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू की गयीं। पहले भी यह समस्याएं छात्र संघ में मौजूद थीं। लेकिन तमाम तरह की पाबंदियां लगाकर लिंगदोह कमेटी छात्र संघ को तेजी से छात्रों, समाज की समस्याओं से दूर करती गयी है।
    
पिछले वर्षों में शिक्षा पर सरकार के हमले तेजी से बढ़ते गये हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के जरिए शिक्षा को और ज्यादा बाजार के हवाले करने व संघ-भाजपा की विभाजनकारी हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति से शिक्षा के भगवाकरण को आगे बढ़ाने की मुहिम जोरों से चल रही है। भयंकर बेरोजगारी छात्रों के सपनों को चूर-चूर कर रही है। सामाजिक समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। जनवादी स्पेस कम किया जा रहा है। इन मुद्दों को उठाने व इनके लिए संघर्ष करने वाला छात्र संघ आज विश्वविद्यालयों में मौजूद नहीं हैं। वह इससे आगे बढ़कर छात्रों को गुलाम बना देना चाहती है। जहां कुछ जगह छात्र व छात्र संघ इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं तो सरकारें तमाम तरह की पाबंदियां लगाकर उनको रोक देना चाहती हैं। ताकि निर्वाचित संस्थाओं से विरोध की संभावनाओं को बन्द कर दिया जाए। संघ-भाजपा सरकार तो देश के चुनाव बन्द कर देश को एकाधिकारी पूंजीपतियों के पक्ष में फासीवादी तानाशाही की तरफ ले जाना चाहती है।
    
सरकार के इस तानाशाहीपूर्ण रवैये का विरोध करने की जरूरत है। छात्र संघ चुनाव को बहाल करने व छात्र संघ छात्रों का वास्तविक मंच बन सके, वहां से पूंजीवादी सडांध को समाप्त कर वह छात्र व सामाजिक समस्याओं से लड़ने की ओर बढ़ सके, ऐसा छात्र संघ बने। तभी वह छात्र व समाजहित का छात्र संघ बनेगा। ऐसा छात्र संघ बनाने की ओर बढ़ने की जरूरत है।     -विशेष संवाददाता

 

इसे भी पढ़ें :-

पेपर लीक व नीट धांधली के विरोध में प्रदर्शन

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि