छात्रवृत्तियों के लिए बजट नहीं, परीक्षा पर चर्चा के लिए लिमिट नहीं

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2018 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘परीक्षा पर चर्चा’ करना शुरू किया। एक दिन के इस कार्यक्रम में (2018 में) 3.67 करोड़ रुपए खर्च हुए। 2025 तक यह खर्च 5 गुना से ज्यादा बढ़कर 18.82 करोड़ रुपए हो गया। इसका मकसद छात्रों का तनाव कम करना, मनोबल बढ़ाना और प्रधानमंत्री के नजरिये को छात्रों के सामने रखना बताया गया। पर इस कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री के सेल्फी प्वाइंट, डिजिटल प्रचार, बैनर, आदि में खर्च किया जाता रहा। 7 साल के दौरान कई छात्रवृत्ति योजनाओं में बजट कम कर दिया गया या योजना ही बंद कर दी गई।
    
2018-19 में ‘विद्यालय शिक्षा और साक्षरता विभाग’ द्वारा संचालित ‘नेशनल मीन्स कम मेरिट स्कालरशिप स्कीम’ और ‘प्रधानमंत्री इनोवेटिव लर्निंग प्रोग्राम’ पर 559.55 करोड़ रूपये का अनुमानित बजट था। 2025-26 में यह बजट 23.02 प्रतिशत घटकर 429 करोड़ रुपए रह गया। 1963 से जारी ‘नेशनल टैलेंट सर्च एग्जामिनेशन’ समीक्षा के नाम पर 2021 से बंद है। समीक्षा के ही नाम पर पीएचडी कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों की ‘मौलाना आजाद नेशनल फेलोशिप’ छात्रवृत्ति 2024 से रोक दी गई। फंड की कमी के नाम पर वंचित तबके के लगभग 60 प्रतिशत छात्रों की विदेश में पढ़ाई पर छात्रवृत्ति रोक दी गयी है।
    
सूचना का अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस दौरान इवेंट मैनेजमेंट, मीडिया प्रोडक्शन, ग्राउंड एक्टिवेशन, लाइव स्ट्रीमिंग, भोजन आदि पर 14,21,99,125 रुपये खर्च हुए। विज्ञापन, ई-टेंडरिंग, टैक्सी सेवा, छात्रों के लिए आवास, बसें, किताबों की खरीद और प्रबंधन पर 97,65,370 रुपये खर्च हुए।
    
छात्रों पर परीक्षा के तनाव में कमी या उनके मनोबल बढ़ाने जैसे इस कार्यक्रम/इवेंट के घोषित लक्ष्य की कोई मानिटरिंग व्यवस्था नहीं है, जिससे पता चल सके कि असल में इससे कितना असर पड़ा है। इससे साफ समझ में आता है कि ‘परीक्षा पर चर्चा’ नरेंद्र मोदी की छवि चमकाने का इवेंट भर है। उनकी शिक्षा, परीक्षा, डिग्री को लेकर उठते तमाम सवाल संभवतः इसकी प्रेरणा देते हों। पर पहले से चली आ रही छात्रवृत्ति योजनाओं का बजट कम करना या योजना ही बंद कर देना शिक्षा के प्रति समग्र व्यवस्था के रुख को दिखाता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत सरकारी खर्च की हिस्सेदारी को तरह-तरह से कम या खत्म करने के प्रावधान किए गए हैं। अभी कई राज्यों में स्कूल बंद करने की स्कूल मर्जर या क्लस्टर स्कूल योजना राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का ही हिस्सा है। जिसका सभी जगह छात्र-शिक्षक-अभिभावक विरोध कर रहे हैं।
    
साधारण से साधारण बुद्धि का भी कोई व्यक्ति साफ समझ जाएगा कि मोदी सरकार की योजना जर्जर शिक्षा की खूबसूरत तस्वीर पेश करना है। इससे शिक्षा की दुर्गति ही होनी है। सवाल सिर्फ यही है कि शिक्षा की दुर्गति कब मेहनतकश जनता की बर्दाश्त के बाहर जाती है?
 

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