अगर यह प्रश्न पूछा जाए कि केन्द्र व विभिन्न राज्यों में सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भारत के मजदूरों व मेहनतकश किसानों, शोषित-उत्पीड़ित जनों के हितों के अनुसार देश को चलाती है तो शायद ही कोई मजदूर-किसान या शोषित उत्पीड़ित इसके जवाब में हां कह सके। अधिक से अधिक लोग यह कहेंगे कि भाजपा हिन्दुओं का ख्याल रखती है और मुसलमानों को ‘‘औकात’’ में रखती है। मोदी, अमित शाह, योगी आदि इस पार्टी के नेताओं की शायद ऐसे लोग तारीफ करें कि उन्होंने कैसे ‘‘हिन्दुओं’’ का सीना चौड़ा कर दिया है। लेकिन ये लोग भी (इनमें से अधिकांश) यही कहेंगे कि ‘साहब! मजदूरों, मेहनती किसानों की बात भला कौन सुनता है।’’
और यही प्रश्न उलट कर विपक्षी पार्टियों खासकर कांग्रेस के सिलसिले में पूछा जाये तो शायद ही कोई मजदूर या मेहनतकश किसान यह कहेगा ‘हां! कांग्रेस मजदूरों-किसानों की पार्टी है’। और क्या यही बात विपक्ष की अन्य छोटी-बड़ी पार्टियों के बारे में कोई मजदूर-किसान कह सकेगा कि ‘नहीं! नहीं! यह पार्टी तो हमारी ही पार्टी है यहां तक कि शायद ही कोई कह सकेगा कि भाकपा-माकपा ऐसी पार्टी हैं जो सौलह आने मजदूरों व किसानों के हितों को आगे बढ़ाने की हरचन्द कोशिश करती है।
अक्सर ही आम लोग किसी पार्टी को अच्छा या बुरा बताते हैं पर कभी यह नहीं कहते हैं कि यह पार्टी ही वह पार्टी है जो मजदूरों या मेहनतकश किसानों या शोषित-उत्पीड़ितों की असल आवाज है। मेहनतकशों की पार्टी है।
भारत में पार्टियों के प्रति क्या रुख है? यह आम चुनाव से लेकर विधानसभाओं के चुनाव में भी देखा जा सकता है। मसलन पिछले आम चुनाव में भारत की करीब 140 करोड़ की आबादी में 96.8 करोड़ लोग मत देने के अधिकारी थे। जिनमें से 64.2 करोड़ लोगों ने ही अपने मत का प्रयोग किया। यानी करीब 32.6 करोड़ लोगों ने अपने मत का प्रयोग ही नहीं किया। आप को यह जानकर कुछ आश्चर्य हो सकता है कि यह आबादी दुनिया के तीसरे बड़ी आबादी वाले देश स.रा.अमेरिका की आबादी (34 करोड़) के करीब-करीब बराबर है। यानी करोड़ों ऐसे लोग हैं जो भारत में अपने मत का प्रयोग ही नहीं करते हैं। इनकी बेरुखी भारत की सभी पार्टियों से लेकर वर्तमान चुनावी व्यवस्था के प्रति सीधे-सीधे दिखायी देती है। कोई इन्हें (मत न डालने वालों को) इनके पिछड़ेपन, कोई इनकी निष्क्रियता तो हो सकता है कोई इनके आलस्य के लिए इन्हें दोष देने लगे।
पिछले आम चुनाव में भाजपा को थोड़ा उदार होकर कहें तो करीब 24 करोड़ (36.56 प्रतिशत) मत मिले। और उनके गठबंधन को 293 सीटों के साथ 42.5 प्रतिशत मत कुल डाले गये मतों में से मिले। यानी भाजपा को करीब-करीब 63 करोड़ मतदाताओं ने इस या उस तरीके से नकार दिया। कांग्रेस को करीब 14 करोड़ (21.9 प्रतिशत) मत मिले। और उनके गठबंधन को 40.6 फीसदी मत और 234 सीटें मिलीं। वैसे कुल मतों और कुल डाले गये मतों में कांग्रेस और इनके गठबंधन का मामला पिछले आम चुनाव में बहुत बुरा नहीं रहा।
केन्द्र की भाजपा सरकार इस समय अपने सहयोगियों को करीब-करीब हाशिये में डालकर एकछत्र ढंग से शासन कर रही है। सरकार के सभी प्रमुख पद उसके पास हैं। लोकसभा-राज्य सभा में उसके अपने ही आदमी सदन के अध्यक्ष हैं। यह शासन मतों की दृष्टि से कैसा शासन है?
सरसरी निगाह में यह अल्पमत (करीब 24 करोड़) का बहुमत (करीब 63 करोड़) पर शासन है। एक अल्पमत सरकार पूरे भारत के भाग्य का फैसला अपनी मनमर्जी से करती है। जितने मत भाजपा को मिले उससे कहीं-कहीं अधिक लोगों ने तो अपने मत का प्रयोग तक नहीं किया। और गहराई में जाकर सोचें तो भाजपा को मिले करीब 24 करोड़ मतों का भी भाजपा पर कोई नियंत्रण नहीं है। यहां तक स्वयं पार्टी सदस्यों का भी पार्टी पर कोई नियंत्रण नहीं है। पार्टी पर किसका नियंत्रण है? पार्टी पर सीधे प्रधानमंत्री मोदी और शाह का नियंत्रण है। वही सरकार चलाते हैं और वही पार्टी चलाते हैं। और एक गैर राज्येतर संस्था ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ अपने ढंग से पार्टी की नीतियों, दिशा व भविष्य को तय करती है। वह अपने प्रशिक्षित, निष्ठावान, सतर्क लोगों को न केवल पार्टी के महत्वपूर्ण बल्कि सरकार के भी महत्वपूर्ण पदों में बिठाती है। और इस तरह यह संस्था बिना चुनाव प्रक्रिया में सीधे तौर पर भाग लिये ही भारत की ‘भाग्य विधाता’ बनने लगती है।
और गहराई में उतरने पर आप पाते हैं कि संघ के अलावा और उनसे भी कहीं ज्यादा पूरे देश के भाग्य विधाता कोई और हैं और यहां तक कि संघ और भाजपा को प्राणवायु देने वाले कोई और ही हैं। वे न तो पार्टी में, न संघ में और न सरकार में हैं। परन्तु भाजपा-संघ और इनके द्वारा संचालित सरकार की नीतियों के केन्द्र में वही होते हैं। और इन नीतियों का सुखद परिणाम इन्हें हासिल होता है। सरकार का हो या बैंक के खजाने इनके लिए हमेशा खुले रहते हैं। देश की प्राकृतिक सम्पदा हो या इन कमबख्तों की भाषा में कहें तो ‘मानवीय सम्पदा’ (देश की श्रम शक्ति) इन्हीं की सेवा के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से लगे हैं। ये थोड़े से लोग कौन हैं?
ये भारत के पूंजीपति हैं। और इनके भी शीर्ष में एकाधिकारी घराने हैं। अम्बानी, अडाणी, टाटा, बिडला, मित्तल आदि ही हैं जो भारत के असली मालिक हैं। ये ही नियंता हैं। ये ही भाग्य विधाता हैं। और क्योंकि इनके हित इसमें हैं कि विदेशी पूंजी भी भारत में आये तो ये भारत की लूट में इनको भी हिस्सा देते हैं। कुल मिलाकर देशी-विदेशी पूंजी भारत को दोनों हाथों से लूट रही है।
अब ऐसे में, कांग्रेस पार्टी या उसका गठबंधन चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाये तो क्या फर्क पड़ेगा। गौर से देखें तो वह सत्ता में आ ही तब पायेगा जब उसे भारत के एकाधिकारी घरानों का अच्छा-खासा समर्थन हो। और इस समर्थन को हासिल करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने जो अतीत में किया वही उसे और भी ज्यादा जोरदार ढंग से करने की गारण्टी खुले-छिपे तौर पर देशी-विदेशी पूंजी को देनी होगी। कांग्रेस पार्टी आजादी की लड़ाई के दिनों से भारत के पूंजीपतियों की पहली पसंदीदा पार्टी रही है। और भाजपा के पराभव के समय पूंजीपति उसे फिर से सत्ता में बिठाने का रास्ता निकाल लेंगे।
भाजपा-संघ और कांग्रेस में बुनियादी फर्क यह है कि जहां भाजपा-संघ भारत को एक हिन्दू फासीवादी राष्ट्र में बदलना चाहते हैं, वहां कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियां यथास्थितिवादी हैं। और वर्तमान संविधान उनके हिसाब से उपयुक्त है। संविधान के हवाले देने का मतलब ही यह है कि वर्तमान पूंजीवादी राजनैतिक ढांचे को बनाकर रखा जाए। जबकि भाजपा-संघ की मंशा व उद्देश्य एक हिन्दू फासीवादी राज्य कायम करने की है।
यहां पर भारत के एकाधिकारी घरानों, वित्तीय पूंजी की भूमिका अपने हितों के कारण महत्वपूर्ण हो जाती है। 2014 से वे संघी फासीवादियों के साथ में गठजोड़ में हैं परन्तु अभी फासीवादी राज्य कायम नहीं हुआ है। जिस दिन उनके हित खतरे में पड़ेंगे उस दिन वे फासीवादी राज्य कायम करने में गुरेज नहीं करेंगे। और इस काम को भाजपा एण्ड कम्पनी एक ढंग से तो कांग्रेस (आपातकाल के अनुभवों से लबरेज) दूसरे ढंग से कर सकती है। और फासीवादी राज्य हिन्दू या तथाकथित धर्मनिरपेक्ष भी हो सकता है। कांग्रेस एण्ड कम्पनी गैर हिन्दू या कथित धर्मनिरपेक्ष फासीवादी राज्य कायम कर एकाधिकारी घरानों के हितों की सुरक्षा कर सकती है। आप या अन्य पार्टियां भी इनके जैसे ही हैं।
वर्तमान पूंजीवादी राज्य और व्यवस्था में मजदूरों, मेहनतकश किसानों सहित शोषित-उत्पीड़ितों के हित न तो भाजपा एण्ड कम्पनी और न कांग्रेस एण्ड कम्पनी साधती है। ये मेहनतकशों के लिए महज खोटे सिक्के के दो पहलू भर हैं। खोटा सिक्का इधर से भी खोटा, उधर से भी खोटा।
भारत के मजदूर, मेहनतकशों सहित शोषित-उत्पीड़ितों का वर्तमान व भविष्य इनके पिच्छलग्गू बनने या इनके प्रति बेरुखी रखने से हमेशा ही खतरे में रहेगा। उनका शोषण-उत्पीड़न-दमन होता ही रहेगा। पूंजी के निर्मम शासन में कभी कारखाने में तो कभी खेत में उनका कत्ल होता ही रहेगा। रोज ही सैकड़ों लोग इस पूंजी के शासन में बेमौत मारे जा रहे हैं।
गुलामी और मौत के शिकंजे, शोषण-उत्पीड़न-दमन के वर्तमान तंत्र से बाहर निकलने के लिए शहीदों की महान विरासत को याद करना होगा।
किसी को शहीदे आजम भगतसिंह की तरह इंकलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज करनी होगी तो किसी को शहीद ऊधमसिंह की तरह अपने लक्ष्य के प्रति सतत कार्य करते हुए इस एकनिष्ठता का परिचय देना होगा। रास्ता इंकलाब से ही निकलेगा।