आलेख

नेहरू, गांधी और हिन्दू फासीवादी

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वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे। 

एक बार फिर लोकतंत्र और भीड़तंत्र

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फासीवादी हमेशा से ही ‘महामानव’ और ‘लघु मानव’ में विश्वास करते रहे हैं। उनका नेता महामानव होता है और लघु मानवों की भीड़ को उसके पीछे चलना होता है। यदि नरेन्द्र मोदी खुद को अजैविक मानते हैं तथा उनके भक्त उन्हें अवतारी पुरुष मानते हैं तो यह अनायास नहीं है। यह फासीवादियों की आम दृष्टि के अनुरूप है। 

जी-20 शिखर सम्मेलन के राजनीतिक निहितार्थ

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ऐसी स्थिति में जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों का अपने सहयोगी यूरोपीय साम्राज्यवादियों के साथ मतभेद व टकराव बढ़ रहे हों, अमरीका और रूस के बीच, अमरीका और चीन के बीच तथा चीन और भारत के बीच तरह-तरह के विवाद और टकराव बढ़ते जा रहे हों, वहां जी-20 की एक सकारात्मक मंच के बतौर न तो अब साम्राज्यवादियों के लिए कोई खास उपयोगिता रह गयी है और न ही दूसरे साम्राज्यवादी देशों- चीन और रूस- के लिए इसकी प्रभावशाली भूमिका बनने की संभावना है। 

‘वन्दे मातरम्’ और भाजपा का साम्प्रदायिक एजेण्डा

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केन्द्र की संघी भाजपा सरकार ने 7 नवम्बर, 2025 से अगले एक साल तक बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित गीत ‘वन्दे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम क

नयी शिक्षा नीति के भूत-प्रेत

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संघी ठीक इसी वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या उसका मन माफिक इस्तेमाल करते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि आज की वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा वेदों में आधुनिक विज्ञान को नहीं ढूंढा जा सकता। इसी तरह आज की वैज्ञानिक पद्धति से प्राचीन भारत में परमाणु बम, मिसाइल या हवाई जहाज के अस्तित्व को नहीं प्रमाणित किया जा सकता। इसीलिए वे अपनी सुविधानुसार इस वैज्ञानिक पद्धति को नकारते हैं या तोड़ते-मरोड़ते हैं। और कोई चारा न होने पर ये सापेक्षिकतावादी या संदेहवादी रुख अख्तियार कर लेते हैं। आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति को संदेह के दायरे में लाकर ये अपनी बेसिर-पैर की बातों को जायज ठहराने का प्रयास करते हैं।

ट्रंप टैरिफ के आगे मोदी सरकार के समर्पण की शुरूआत

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मोदी सरकार के सामने संकट यही है कि वह रूस से मिल रहे सस्ते तेल को चुने या फिर अमेरिका के साथ प्रति वर्ष होने वाले कुल व्यापार लाभ को। अपनी फितरत के अनुसार तो भारत सरकार और भारतीय पूंजीपति यही चाहते हैं कि उनको दोनों जगह से होने वाला लाभ बदस्तूर जारी रहे। किन्तु डोनाल्ड ट्रंप इस सारे खेल में भाजपाईयों और उनके यारों का गुरू है। उसने वर्तमान और भविष्य के द्विपक्षीय व्यापार में भारत को हो रहे लाभ को अपना हथियार बनाया और अपनी वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति के मोहरे सैट करके मोदी सरकार को ‘पटरी’ पर ला डाला।

चतुर मशीनें और बुद्धू इंसान

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उपभोक्तावाद के इस दौर में तब भी इंसान ही उपभोक्ता सामानों का मालिक होता था और उनकी हैसियत से अपनी हैसियत हासिल करता था। एक सीमित अर्थ में ही ये सामान इंसानों के मालिक होते थे। जब किसी की हैसियत किसी दूसरे से तय होने लगे तो दूसरा स्वभावतः ही एक अर्थ में पहले वाले का मालिक होने लगता है। दूसरा पहले को चलाने लगता है। उपभोक्तावादी सामान इंसानों के जीवन की गति को तय करने लगते हैं। 

एकीकृत वैश्विक पूंजीवाद में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता

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चरखे और हथकरघे ने देश के सूती कपड़ा उद्योग तथा उसके उपभोग पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डाला। इसका जो भी प्रभाव पड़ा वह राजनीतिक था। इसने आजादी की लड़ाई के प्रतीक का स्थान ग्रहण कर लिया। इसने जन-जन तक यह संदेश पहुंचाया कि यदि देश के लोगों के आर्थिक हालात खराब हैं तो उसका कारण विदेशी शासन है। हर जगह खादी में नजर आने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता इस भावना को मूर्त रूप में संचारित करते थे। 

यह हमारे यहां नहीं हो सकता!

नेपाल की हालिया घटनाओं के बाद उदारवादी और वाम-उदारवादी एक स्वर से कह रहे हैं कि हमारे यहां ऐसा नहीं हो सकता। इसके लिए भांति-भांति के तर्क दिये जा रहे हैं। 

नेपाल में जन विद्रोह - रास्ता किधर है?

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पूंजीवादी लोकतंत्र का लुटेरा चेहरा अधिकाधिक उजागर होता जा रहा है। ऐसे में कल यही जनता जब सुस्पष्ट क्रांतिकारी विचारधारा से लैस होकर सड़कों पर उतरेगी तो उसके निशाने पर पूंजीवादी व्यवस्था होगी। तब इस लुटेरी व्यवस्था के साथ पीछे से सक्रिय लुटेरी ताकतों का षड्यंत्र भी ध्वस्त हो जायेगा। और समाजवाद के नये सवेरे का उदय होगा। भारत के सभी पड़ोसी मुल्कों के युवा-आम मेहनतकश अपनी पहलकदमी दिखा चुके हैं। अगला नम्बर निश्चय ही भारत का होगा।

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।