हिन्दू फासीवादियों के बारे में दो तथ्य ऐसे हैं जिनमें से एक जगजाहिर है और दूसरा छिपा। पहले को हिन्दू फासीवादी खुद ही ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करते हैं जबकि दूसरे को वे छिपाने का प्रयास करते हैं। पहला जवाहर लाल नेहरू से संबंधित है और दूसरा महात्मा गांधी से।
हिन्दू फासीवादी नेहरू को रोज कोसते हैं। वे आज के भारत की सारी समस्याओं के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके लिए नेहरू ने हर संभव व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक अपराध किये हैं। वे नेहरू के बारे में तमाम झूठी-सच्ची कहानियां प्रचारित करते हैं। अपनी फितरत के अनुरूप उन्हें इस मामले में झूठ गढ़ने और बोलने में कोई दिक्कत नहीं होती।
दूसरी ओर महात्मा गांधी के मामले में वे ज्यादातर चुप्पी साध लेते हैं। वे इस बात को छिपाते हैं कि वे गांधी से उतनी ही नफरत करते हैं जितनी नेहरू से। वे इस बात को छिपाते हैं कि गोडसे उन्हीं का आदमी था और उसने जो किया वह उनका लक्ष्य था। वे इस बात को छिपाते हैं कि गांधी को गाली देने वाले ‘हाशिये के तत्व’ असल में उन्हीं की भावना को व्यक्त कर रहे होते हैं।
गांधी के बारे में हिन्दू फासीवादियों का लुका-छिपी का खेल और कुछ नहीं बस रणकौशल है। जब उन्हें स्पष्ट हो जायेगा कि महात्मा गांधी को खुल कर गालियां दी जा सकती हैं तो वे यह करना शुरू कर देंगे। तब तक वे एक रणकौशल के तहत चुप्पी साधे हुए हैं और नेहरू को निशाना बना रहे हैं।
नेहरू-गांधी को लेकर हिन्दू फासीवादियों की नफरत के वाजिब कारण हैं। हिन्दू फासीवादी जो हिन्दू राष्ट्र कायम करना चाहते हैं, नेहरू-गांधी की सोच और व्यवहार के खिलाफ थे। इसी कारण हिन्दू फासीवादी एक लम्बे समय तक भारत की राजनीति में हाशिये पर पड़े रहे। अब जब वे भारतीय राजनीति में हावी हुए हैं तो वे चाहते हैं कि उनके रास्ते की नेहरू-गांधी नामक बाधा दूर हो जाये।
अपने आम विश्व दृष्टिकोण में गांधी और नेहरू काफी भिन्न थे और एक हद तक एक-दूसरे के खिलाफ थे। गांधी एक पुरातनपंथी-पोंगापंथी धार्मिक सोच के व्यक्ति थे। वे छूआछूत के खिलाफ थे पर वर्ण व्यवस्था को अच्छी व्यवस्था मानते थे। वे आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता-संस्कृति के खिलाफ थे और मध्यकालीन ग्रामीण व्यवस्था उनके लिए भारत के लिए आदर्श व्यवस्था थी। उनके ग्राम समाज का यही मतलब था। अपनी सोच को उन्होंने 1909 में लिखी अपनी पुस्तिका ‘हिन्दू स्वराज’ में सबसे अच्छी तरीके से व्यक्त किया था।
उनके मुकाबले नेहरू एक आधुनिक पूंजीवादी व्यक्ति थे। उनका पूंजीवादी ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और सभ्यता-संस्कृति में विश्वास था। वे लगभग नास्तिक व्यक्ति थे। पश्चिमी सभ्यता का रास्ता ही उनके लिए भारत का रास्ता था। उनकी सोच को उनके द्वारा लिखित ‘विश्व इतिहास की झलक’ तथा ‘भारत की खोज’ में देखा जा सकता है।
ऊपरी तौर पर महात्मा गांधी की सोच नेहरू के खिलाफ तथा हिन्दू फासीवादियों के आस-पास दिखाई पड़ती है। पर गांधी हिन्दू फासीवादियों के खिलाफ थे और उन्होंने नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उन्हीं की कृपा से नेहरू पटेल के बदले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। ऐसा क्यों और कैसे हुआ?
ऐसा दो वजहों से हुआ। पहला यह कि अपनी सारी पोंगापंथी और धार्मिकता के बावजूद महात्मा गांधी साम्प्रदायिक व्यक्ति नहीं थे। वे दिल से धार्मिक भेदभाव के खिलाफ थे। इस मामले में वे कांग्रेस पार्टी के तमाम अन्य धार्मिक पोंगापंथी नेताओं से भिन्न थे जो इस या उस हद तक साम्प्रदायिक थे। इस श्रेणी में पटेल, राजेन्द्र प्रसाद इत्यादि भी आते हैं। जिन्ना को धर्म के आधार पर एक अलग राष्ट्र की मांग की ओर ढकेलने में इन नेताओं का बड़ा हाथ था।
यह चीज उन्हें नेहरू की ओर ले जाती थी और 1940 के दशक में जैसे-जैसे देश का वातावरण और ज्यादा साम्प्रदायिक होता गया वैसे-वैसे गांधी के लिए नेहरू और ज्यादा जरूरी बनते गये। 1946 तक गांधी के लिए स्पष्ट हो गया था कि साम्प्रदायिक ज्वार के उस समय में पटेल जैसा साम्प्रदायिक नहीं बल्कि नेहरू जैसा गैर-धार्मिक और धर्म-निरपेक्ष व्यक्ति ही देश की नैया पार लगा सकता था। इसीलिए गांधी ने कांग्रेस पार्टी संगठन की राय के विपरीत जाकर नेहरू को तरजीह दी और नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाया।
लेकिन यहां मामला केवल महात्मा गांधी की व्यक्तिगत सोच का नहीं था। यहां मामला भारत के पूंजीपति वर्ग के हितों का भी था। गांधी के बारे में यह ठीक ही कहा गया था कि उन्होंने एक साथ भारतीय जनता के लिए संत की तथा भारतीय पूंजीपति वर्ग के लिए गाडफादर की भूमिका निभाई थी। इसी में उनकी सफलता का राज था। लेकिन आजादी के समय भारत के पूंजीपति वर्ग की सबसे बड़ी जरूरत यह थी कि देश साम्प्रदायिक उन्माद से बाहर आये। यह काम स्वयं साम्प्रदायिक सोच के शिकार नेता नहीं कर सकते थे। यह काम कोई गैर साम्प्रदायिक नेता ही कर सकता था। भारत के पूंजीपति वर्ग के सौभाग्य से कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पर एक ऐसा नेता मौजूद था जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी एक पहचान हासिल थी और जो एक साथ पूंजीवादी दुनिया और समाजवादी दुनिया से तालमेल बैठा सकता था। दूरदृष्टि रखने वाले पूंजीपति वर्ग के गाडफादर यह देख सकते थे। इसीलिए उन्होंने अपने व्यक्तिगत विश्वासों से परे जाकर उस वर्ग के हितों को प्रमुखता दी जिसका वे नेतृत्व कर रहे थे। इस मायने में गांधी अपने वर्ग के आदर्श नेता थे जो अपने व्यक्तिगत विश्वासों को किनारे रखकर अपने वर्ग के हितों को प्रमुखता देता है।
लेकिन बात केवल गांधी के धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं थी। बात गांधी के सामाजिक विकास संबंधी विश्वासों की भी थी जिसे गांधी ने पूंजीपति वर्ग के हितों की खातिर कुर्बान किया। जैसा कि पहले कहा गया है, गांधी का अपना आदर्श ‘ग्राम स्वराज’ का था जो मध्यकालीन भारत के गांवों का आदर्शीकरण था। पर बीसवीं सदी के मध्य के भारतीय पूंजीपति वर्ग की जरूरतें कुछ और थीं। यह पूंजीपति वर्ग ब्रिटिश साम्राज्यवाद की छत्र-छाया में तथा आधुनिक विज्ञान और तकनीक पर आधारित पूंजीवाद के जरिये अस्तित्व में आया था। यह वर्ग आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक को छोड़कर मध्यकालीन गांवों की अवस्था में नहीं जा सकता था। उससे ऐसी मांग करने का मतलब उससे आत्महत्या की मांग करना था।
स्वयं भारत के पूंजीपति वर्ग ने अपनी सोच को ‘बांबे प्लान’ अथवा टाटा-बिड़ला योजना में व्यक्त किया था। इसकी मूल बात सरकार की मदद से भारी उद्योगों का विकास तथा इसके जरिये निजी क्षेत्र के विकास का मार्ग खोलना था। यह वही रास्ता था जो आजादी के बाद भारत सरकार ने पकड़ा।
वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे।
यह जानी-पहचानी बात है कि पटेल न केवल धार्मिक-पोंगापंथी और किसी हद तक साम्प्रदायिक थे बल्कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति नरम रुख भी रखते थे। इसी वजह से उन्होंने नेहरू की अनुपस्थिति में कांग्रेस पार्टी की कार्य समिति से यह प्रस्ताव पास करवा लिया था कि संघ कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर राष्ट्र निर्माण में योगदान करवा सकता था। नेहरू के विदेश से लौटने के बाद यह प्रस्ताव रद्द करवा दिया गया। यह सारा प्रकरण महात्मा गांधी की हत्या के बाद घटा था। इससे संघ को स्वभावतः लगता है कि यदि नेहरू के बदले पटेल प्रधानमंत्री बने होते तो उसकी राह आसान रही होती। यह होता या नहीं, यह दीगर बात है। पर संघ को इस बात का अफसोस होना स्वाभाविक है। इसीलिए वे गांधी को माफ नहीं कर पाते और उनसे नफरत करते हैं क्योंकि गांधी की वजह से ही पटेल की जगह नेहरू प्रधानमंत्री बने थे। अब, महात्मा गांधी को सरेआम बुरा-भला कहना आज भी भारत में आसान नहीं है। इसीलिए वे नेहरू को निशाना बनाते रहते हैं।
पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में संघ की नेहरू-गांधी से यह लड़़ाई एक विचारधारात्मक लड़ाई है। यह इस बात की लड़ाई है कि क्या भारत एक पूंजीवादी जनतंत्र रहेगा अथवा एक हिन्दू फासीवादी देश बन जायेगा? आजादी के समय गांधी-नेहरू ने यह लड़ाई आसानी से जीत ली थी पर उसके बाद नेहरू के नेतृत्व में देश जिस रास्ते पर चला उससे देश आज अंततः वहां पहुंच गया है जहां संघी यह लड़ाई लगभग जीत गये हैं। भारत में आज फासीवादी निजाम कायम होने के लिए किसी बड़े उथल-पुथल और पूंजीपति वर्ग की अनुमति की जरूरत है।
नेहरू उन सब के लिए जिम्मेदार नहीं हैं जिसके लिए संघी या हिन्दू फासीवादी उन्हें जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। पर उस सबके लिए जिम्मेदार जरूर हैं जिसकी वजह से देश वहां पहुंच गया है जहां भारत की राजनीति पर हिन्दू फासीवादी हावी हैं।
दुनिया भर पर नजर रखने वाले नेहरू के लिए हिन्दू फासीवादियों के वास्तविक चरित्र को पहचानना कठिन नहीं था। इटली का फासीवादी और जर्मनी का नाजीवादी निजाम जब कायम हुए तब नेहरू एक परिपक्व नेता थे। वे कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी बन चुके थे। नेहरू कांग्रेस पार्टी के उन लोगों में थे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र शक्तियों का पक्ष लेने की हिमायत की थी। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अपने नजदीकी अफसरों की एक बैठक में कहा भी था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ देश के लिए कम्युनिस्टों से ज्यादा बड़ा खतरा है हालांकि उस समय संघ की ताकत बहुत कम थी जबकि कम्युनिस्ट पार्टी संसद में दूसरी बड़ी पार्टी थी। उनकी नजर में ऐसा इसलिए था कि कम्युनिस्ट उसी दिशा में और आगे जाना चाहते थे जिस दिशा में कांग्रेस पार्टी जा रही थी जबकि संघ बिल्कुल उलटी दिशा में जाना चाहता था।
इसके बावजूद नेहरू ने संघ के साथ उतनी कठोरता से व्यवहार नहीं किया जितनी जरूरत थी। आजादी के समय दंगों में संघ की भागेदारी और महात्मा गांधी की हत्या के बावजूद उसे खुला छोड़ दिया गया- समाज में जहर फैलाने के लिए। 1948 का प्रतिबंध जल्दी ही हटा लिया गया। यह सब नेहरू के जनवादी होने का परिणाम नहीं था। उनके जनवाद की सीमा उत्तर-पूर्व, कश्मीर तथा केरल में प्रकट हो चुकी थी। शायद उन्हें लगता था कि वे संघ को समाहित कर लेंगे। या फिर वे कांग्रेस पार्टी के भीतर के हिन्दू साम्प्रदायिक नेताओं के सामने बेबस थे। जैसा कि 1949 में बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्ति रखने के मामले में दिखा था। जो भी हो, नेहरू सरकार संघ से सख्ती से नहीं निपट पाई और उसे फलने-फूलने का खूब मौका मिला। हद तो तब हो गयी जब उसे 1964 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का मौका दे दिया गया।
संघ पर सांगठनिक प्रतिबंध से भी ज्यादा गंभीर मसला था नेहरू सरकार द्वारा धर्म निरपेक्षता की एक ऐसी नीति पर चलना जो सार्वजनिक जीवन में धर्म की भूमिका को मान्यता दे देती थी। इससे स्वाभाविक तौर पर सारी धार्मिक साम्प्रदायिक ताकतों को राजनीति समेत सारे सार्वजनिक जीवन में धर्म का खेल खेलने का मौका मिल जाता था। इसका यह भी मतलब निकलता था कि बहुमत के धर्म यानी हिन्दू धर्म को स्वभावतः वरीयता मिल जाती थी। अक्सर इसे संस्कृति का जामा भी पहना दिया जाता था। सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना से लेकर सरकारी कार्यक्रमों में दीप प्रज्वलन तथा नींव रखने के समय पूजा-पाठ, इत्यादि इसी की अभिव्यक्ति थे। संघ ने इसका बखूबी इस्तेमाल किया और अपने साम्प्रदायिक जहर को ‘हिन्दू संस्कृति’ के रूप में पेश किया।
नेहरू ने जो आदिम पाप किया था, उनके वारिसों ने उसे आगे बढ़ाया। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने बाकायदा साम्प्रदायिक ताकतों को शह दी। खासकर राजीव गांधी ने संघ की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए क्रमशः आगे की ओर कदम बढ़ाये। आज उनके पुत्र राहुल गांधी संघ से वैचारिक लड़ाई लड़ने की बात करते हैं। हो सकता है, वे दिल से यह चाहते हों। पर नेहरू के आदिम पाप और इंदिरा गांधी-राजीव गांधी के पापों पर चुप्पी साध कर इस लड़ाई को नहीं लड़ा जा सकता।
और न ही धर्म निरपेक्षता की उस नीति पर चलकर उसे लड़ा जा सकता है जिस पर कांग्रेस पार्टी आजादी के समय से चलती रही है। सार्वजनिक जीवन से धर्म को बाहर किये बिना धर्म के नाम पर राजनीति को नहीं निरस्त किया जा सकता। सर्व-धर्म समभाव की नीति अपना दीवालियापन साबित कर चुकी है। उस पर चल कर हिन्दू फासीवादियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता।
हिन्दू फासीवाद से वैचारिक लड़ाई भी एक नये धरातल की मांग करती है जो न तो राहुल गांधी के पास है और न हो सकती है। यह उनके मुरीद उदारवादियों और वाम-उदारवादियों के पास भी नहीं है। इसीलिए नेहरू-गांधी के बारे में केवल ऐतिहासिक तथ्यों का खुलासा कर संघ का बाल-बांका नहीं किया जा सकता, हालांकि यह भी जरूरी काम है।