भाजपा के बुलडोजर राज के खिलाफ जन सम्मेलन की तैयारियां तेज

/bhajpa-ke-buldozer-raaj-ke-against-jan-sammelan-ki-taiyariyaan-tej

रामनगर/ वन ग्राम पूछडी में बुल्डोजर कार्रवाही के बाद भड़के ग्रामीणों के आक्रोश ने अब आंदोलन का रूप ले लिया है। संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले 21 दिसंबर को पूछडी में हुई ग्रामीणों की सभा में 4 जनवरी को भाजपा के बुल्डोजर राज के विरुद्ध जन सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा की गई। तदुपरांत 25 दिसम्बर को ग्राम कालूसिद्ध व 26 दिसम्बर को ग्राम सुंदरखाल में सभायें आयोजित की गयीं जिनमें बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भागीदारी की। 
    
सभाओं में जो व्यक्ति जहां निवास, खेती व कारोबार कर रहा है उसे वहीं मालिकाना हक दिये जाने; सभी वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित करने; वन ग्राम पूछडी में उजाड़े गये लोगों का पुनर्वास करने एवं हाईकोर्ट के स्टे आर्डर का उल्लंघन करने वाले डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य के विरुद्ध कार्रवाही किये जाने की मांग की गई। 
    
वक्ताओं ने कहा कि 2017 से 2023 तक भाजपा सरकार 17 लाख लोगों को उनके घर और कारोबार से बेदखल कर चुकी है। 
    
वक्ताओं ने कहा कि वन ग्रामों में लोग पीढ़ियों से रह रहे हैं और वन अधिकार कानून 2006 के तहत वनों पर उनके परंपरागत अधिकार हैं लेकिन धामी सरकार कानूनों को धता बताते हुये उन्हें उजाड़ने पर तुली है। 
    
वक्ताओं ने कहा कि अतीत में 1992-93 में काशीपुर न्यायालय में पूछडी के करीब 200 परिवारों से वन विभाग मुकदमा हार चुका है। इस समय बहुत से लोगों की हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है और अनेकों परिवारों को स्टे भी मिला हुआ है। इसके अलावा पूछडी में वन ग्राम समिति भी मौजूद है। लेकिन इस सबके बावजूद बीती 7 दिसम्बर को वहां बुल्डोजर चलाकर करीब 90 परिवारों को उजाड़़ दिया गया। इस ठिठुरती ठंड में लोग अपने बच्चों के साथ खुले आकाश के नीचे आ गये हैं। वक्ताओं ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह गरीबों की जमीन छीनकर उसे पूंजीपतियों, बड़े होटल-रिजार्ट मालिकों के हवाले कर देना चाहती है। 
    
वक्ताओं ने कहा कि सांसद अनिल बलूनी ने लोकसभा चुनाव से पहले वन ग्रामों के लोगों से वायदा किया था कि वे सभी वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलवायेंगे, लेकिन उनका वायदा जनता से किया गया छल साबित हुआ। अब वे वन ग्रामों को बिजली, पानी व मूलभूत अधिकार देने का वायदा कर एक बार पुनः मेहनतकश जनता के साथ छल कर रहे हैं। यदि वे वास्तव में वन ग्रामों के साथ हैं तो वे पहले पूछड़ी से विस्थापित 90 परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था करें।
    
वक्ताओं ने उत्तराखंड में वन भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर हाल ही में आये सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी कठघरे में खड़ा करते हुये कहा कि यह आदेश वन ग्रामों के निवासियों के कानून सम्मत अधिकारों पर चोट करता है। इससे लाखों लोगों के सामने बेदखली का संकट पैदा हो गया है।
    
वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की 53 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि में 71 प्रतिशत वन भूमि है और इसमें से मात्र 104 किलोमीटर वन भूमि पर ही लोग बसे हुए हैं, जो कि कुल वन भूमि का एक प्रतिशत से भी कम मात्र 0.28 प्रतिशत है। आज भाजपा सरकार इन वनवासियों को बेदखल करने की साजिश कर रही है, लेकिन वन ग्रामों के लोग इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे और सभी एकजुट होकर अपनी जमीन और घरों की रक्षा करेंगे। 
    
संयुक्त संघर्ष समिति ने घोषणा की कि 4 जनवरी के जन सम्मेलन को उत्तराखंड के विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि सम्बोधित करेंगे और वन ग्रामों के आंदोलन को राज्यव्यापी बनाया जायेगा।     -रामनगर संवाददाता
 

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि