पिछले दिनों असम के कार्बी आदिवासी बहुल दो पहाड़ी जिलों में हिंसा भड़क उठी। इस हिंसा में 2 व्यक्ति मारे गये व दर्जनों घायल हो गये। ढेरों पुलिसकर्मी भी घायल हुए। पश्चिमी कार्बी आंगलांग व कार्बी आंगलांग जिले में आदिवासी लोगों की बाहरी लोगों को क्षेत्र से निकालने की मांग को लेकर यह हिंसा भड़की। इन जिलों में बिहार-बंगाल के हजारों लोग बसे हुए हैं और स्थानीय आदिवासी इन्हें हटाने की मांग करते रहे हैं।
दोनों जिलों के व्यावसायिक चरागाह क्षेत्र व ग्रामीण चरागाह क्षेत्र में बसे बाहरी राज्यों के लोगों को हटाने की मांग को लेकर 9 आदिवासी आमरण अनशन पर बैठे थे। जब पुलिस इन्हें अस्पताल में भर्ती कराने को पहुंची तो आदिवासी लोग हिंसक हो उठे और उन्होंने बाजार में आगजनी कर दी। इस दौरान दो लोगों की मौत हिंसा व आगजनी के चलते हो गयी। भीड़ ने कार्बी आंगलांग स्वायत्त परिषद के मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष व भाजपा नेता तुलीराम रोंगहांग के पुश्तैनी घर में आग लगा दी।
कार्बी आदिवासी बहुल ये दोनों जिले संविधान की छठी अनुसूची के तहत स्वायत्तता प्राप्त हैं और इनका प्रशासन आंगलांग स्वायत्त परिषद के तहत किया जाता है। इसके 26 सदस्य हैं। वर्तमान में सभी 26 सीटों पर भाजपा काबिज है।
आजादी के बाद कार्बी आदिवासियों को स्वायत्तता का अधिकार तो दिया गया पर व्यवहार में भारतीय शासकों ने भोले आदिवासी जनों का व उनके पहाड़ी संसाधनों का निर्मम दोहन जारी रखा। इसी का नतीजा है कि गरीबी के मामले में ये सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है। पहले कांग्रेस सरकारों ने इनके विकास पर ध्यान नहीं दिया तो बाद में भाजपा ने यहां साम्प्रदायिक विभाजन पैदा कर समस्या को और विकराल बना दिया। कार्बी समुदाय के लोगों की बुरी आर्थिक दशा का लाभ उ.प्र.-बिहार-बंगाल के व्यापारियों ने भी उठाया। बाजार पर उन्होंने नियंत्रण कायम कर लिया। हालांकि इन इलाकों में एक बड़ी संख्या मजदूर-मेहनतकशों की भी आ कर बस गयी।
अपनी उपेक्षा के चलते स्वायत्तता व अलग प्रांत की मांग को लेकर कई हथियार बंद संघर्ष करने वाले संगठन भी कार्बी समुदाय के बीच पैदा हुए। भाजपा सरकार ने 2021 में ऐसे 6 समूहों से जब शांति समझौता किया तो उनसे अधिक स्वायत्तता व विकास का वायदा किया था। पर शीघ्र ही यह वायदा भुला दिया गया।
भाजपा ने हिन्दू धर्म के प्रचार के जरिये कार्बी समुदाय में घुसपैठ की। आज एक तिहाई कार्बी लोग हिंदू धर्म के अनुयायी हो गये हैं। खासकर वैष्णव परम्परा ने यहां जड़ें जमायीं। भाजपा बीते 15 वर्षों में यहां लगातार चुनाव जीतती रही। इस दौरान उसने एक ओर कार्बी लोगों को साम्प्रदायिक वैमनस्य में धकेला वहीं पहाड़ी सम्पदा को पूंजीपतियों को लुटाना जारी रखा।
कार्बी लोग भी पूंजीपतियों-बड़े व्यापारियों को अपना दुश्मन न मानकर बिहारी-बंगाली लोगों को निशाने पर लेने लगे व उनके निष्कासन की गलत मांग करने लगे। स्वायत्त परिषद ने बीते वर्ष इस निष्कासन का निर्णय ले लिया था पर अदालत ने इस पर रोक लगा दी। हालांकि भाजपा मनमाने ढंग से मुस्लिम व बंगाली लोगों को विस्थापित कर अपनी साम्प्रदायिक राजनीति खेलने की फिराक में है।
इस तरह संघ-भाजपा ने पहले से उपेक्षा के शिकार कार्बी समुदाय के लोगों को बिहारी-बंगाली आमजनों से टकराव में ला खड़ा किया। और असम को हिंसा की चपेट में ढकेल दिया। मेहनतकशों को आपस में लड़ा पूंजीपतियों की सेवा करने में सरकार फिर सफल होती दिख रही है हालांकि यह उसे मणिपुर के हालातों तक भी ले जा सकती है जहां मामला सरकारी नियंत्रण से भी बाहर जा सकता है। कार्बी लोगों के जीवन में बेहतरी प्रवासी मजदूरों-मेहनतकशों को खदेड़ने की मांग से नहीं बल्कि भाजपा सरकार व पूंजीवादी व्यवस्था को निशाने पर लेकर ही आ सकती है।