भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एक समय सुरक्षित व स्थायी रोजगार मिलता था। अधिकारियों से लेकर सफाईकर्मियों तक सभी की बैंक के विकास में भूमिका मानी जाती थी। लेकिन पिछले दो दशकों में चुपचाप एक क्रांतिकारी बदलाव आया है- सफाईकर्मी, चपरासी, सशस्त्र गार्ड और अन्य चतुर्थ श्रेणी के पदों पर सीधी भर्ती लगभग पूरी तरह से बंद कर दी गई है, और इन पदों पर ठेके के माध्यम से कर्मचारी लगाए जा रहे हैं।
यह बदलाव महज ‘‘प्रशासनिक सुविधा’’ नहीं है- बल्कि यह एक प्रकार की संरचनात्मक छंटनी है, जो उन कर्मचारियों को तो रखती है जिनसे लाभ अधिक हो, और उन लोगों को बाहर करती है जो लंबे समय से सामाजिक-आर्थिक वंचना से जूझते रहे हैं।
चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों का ठेकाकरण और सीधी भर्ती न करना, उसी शोषणवादी मानसिकता का हिस्सा है जो हमें निजी कंपनियों में दिखती है।
बैंकों में चतुर्थ श्रेणी के पदों- सफाईकर्मी, चपरासी, गार्ड, माली, वाटरबाय आदि- की भर्ती वर्षों से बंद है। पहले जहां ये पद स्थायी और आरक्षण के अंतर्गत आते थे, अब उन्हें ठेकेदारों के माध्यम से भरा जा रहा है। ये ठेका कर्मचारी बिना स्थायित्व, सामाजिक सुरक्षा या यूनियन के संरक्षण के काम कर रहे हैं। बैंक यह तर्क देते हैं कि स्थायी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और चिकित्सा सुविधाओं का खर्च बहुत अधिक है। अतः ठेका कर्मचारी भर्ती कर बैंक इस खर्च से बच जाते हैं। ठेका कर्मचारियों को बिना जवाबदेही के हटाया जा सकता है। साथ ही इलेक्ट्रानिक सुरक्षा, सफाई मशीनें और आटोमेशन का हवाला दिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि काम आज भी वही है- बस कर्मचारी बदले गए हैं। अब काम करने वाला व्यक्ति बिना अधिकार, बिना सुरक्षा और बिना आवाज के है।
यह बदलाव उसी मानसिकता का हिस्सा है जो हमें निजी कंपनियों में दिखता हैः जैसे कई कम्पनियों में मध्य स्तर के साफ्टवेयर इंजीनियरों को हटाया जा रहा है ताकि उच्च अधिकारियों को अधिक वेतन मिल सके, वैसे ही बैंकों में निम्न स्तर के पदों की भर्ती रोकी जा रही है, जिससे वेतन बजट को शीर्ष पर केंद्रित किया जा सके। यह ऊर्ध्वाधर पुनर्रचना (जवच.ीमंअल तमेजतनबजनतपदह) है- नीचे के पदों को ‘‘अनावश्यक’’ बता कर हटाया जा रहा है, जबकि ऊपर के पदों पर वेतन और विशेषाधिकार बढ़ रहे हैं।
बैंकों में नकद, लॉकर और एटीएम की सुरक्षा के लिए पहले पूर्व सैनिकों या प्रशिक्षित सशस्त्र गार्डों को स्थायी कर्मचारी बनाया जाता था। अब ज्यादातर बैंकों ने सुरक्षा एजेंसियों को ठेका दे दिया है। ये एजेंसियां 10,000 रु.-12,000 रु. प्रतिमाह में बिना प्रशिक्षण या हथियार के गार्ड तैनात करती हैं। इन गार्डों को न पेंशन, न बीमा, न स्वास्थ्य सुविधा और न ही काम के अधिकार मिलते हैं। यह केवल अन्याय नहीं, बल्कि जोखिम भी है- बैंक की सुरक्षा अब असुरक्षित हाथों में है। सबसे ज्यादा नुकसान सफाईकर्मियों को हुआ है जो सामान्यतः अनुसूचित जातियों से आते थे और आरक्षण के माध्यम से सरकारी नौकरी प्राप्त करते थे। चपरासियों और संदेशवाहकों को, जो शाखा कार्यालयों की मूलभूत कार्यप्रणाली का हिस्सा थे। अब ठेके पर रखी गई महिलाएं या युवा, न्यूनतम वेतन पर दिनभर काम करते हैं। इन कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश, चिकित्सा सुविधा, सामाजिक सुरक्षा या यूनियन से संरक्षण नहीं मिलता। यह न केवल श्रमिक शोषण है, बल्कि जातिगत और वर्गीय बहिष्करण भी है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी संस्थान नहीं हैं। वे संविधान और श्रम कानूनों के तहत संचालित होते हैं। अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सबको समान अवसर और आरक्षण का अधिकार है। ठेका श्रमिक (नियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970 के तहत स्थायी प्रकृति के कार्यों में ठेका प्रथा पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद स्थायी कार्यों को ठेके पर दिया जा रहा है, और संवैधानिक मूल्यों की अवहेलना हो रही है। न्यायपालिका भी कई बार इसे ‘‘प्रबंधकीय विवेक’’ कहकर खारिज कर देती है।
यह प्रवृत्ति सिर्फ प्रशासनिक नहीं, गंभीर सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों वाली है। यह आर्थिक असमानता को और बढ़ावा देती है। सार्वजनिक बैंकों का चरित्र बदल कर निजी कंपनियों जैसा हो जाता है। श्रम की गरिमा का हास होता है- सफाई और चौकीदारी जैसे कार्य ‘‘निम्न’’ माने जाते हैं। यह ैब्ध्ैज् और व्ठब् वर्गों की सामाजिक गतिशीलता के रास्ते बंद करता है, जिनके लिए यही नौकरियां एक प्रवेश द्वार थीं। यूनियनों की शक्ति भी इससे कमजोर होती है, क्योंकि ठेका कर्मचारी यूनियनों के बाहर रखे जाते हैं। चतुर्थ श्रेणी के पदों की भर्ती न करना और ठेके पर काम करवाना एक रणनीतिक, संरचनात्मक और अमानवीय निर्णय है। यह उस मानसिकता का हिस्सा है जिसमें मुनाफा इंसान से ऊपर हो गया है। ऐसे में ठेकाकर्मियों व स्थायी कर्मियों का एकजुट संघर्ष वक्त की मांग है। मांग करनी होगी कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में तत्काल भर्ती अभियान शुरू किया जाए। ठेका कर्मचारियों का स्थायीकरण किया जाए- खासकर उन कार्यों में जो वर्षों से चल रहे हैं। श्रम कानूनों और आरक्षण नीतियों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। बैंको में इस ठेकाकरण के खिलाफ यूनियनों और आम जनता को संगठित प्रतिरोध खड़ा करना होगा।