इस समय डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका ने सारी दुनिया के साथ ‘तटकर युद्ध’ छेड़ रखा है। निशाने पर आने वाले देश शत्रु और मित्र दोनों हैं। भारत की बात करें तो इसने ‘मेरा मित्र’ कहने वाले संघी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दुर्गति कर दी है। दुनिया में बजने वाला उनका डंका ट्रंप के थपेड़ों से फट गया और मोदी हैं कि ट्रंप का नाम भी नहीं ले पा रहे हैं।
ऊपरी तौर पर अमेरिका का सारी दुनिया के खिलाफ यह ‘तटकर युद्ध’ उसके लंपट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सनकी कार्रवाई लगता है। आखिर तटकर की सीमा को रोज-रोज घटाने-बढ़ाने का क्या मतलब हो सकता है? लेकिन इस सनकी कार्रवाई के पीछे अमेरिकी साम्राज्यवादियों की एक सोची-समझी रणनीति है। ट्रंप की सनकी कार्रवाई को इस रणनीतिक लक्ष्य को हासिल करने का रणकौशल कहा जा सकता है। लोग इसे मोलभाव करने का रणकौशल कह भी रहे हैं।
भारत के मामले में ही प्रतिबंधित रूस से तेल खरीदने का सारा बवाल इसलिए खड़ा किया जा रहा है ताकि खेती, दूध उद्योग तथा दवा उद्योग में अमेरिकी पूंजी और मालों को और ज्यादा छूट मिल सके। ऊपरी बवाल और पर्दे के पीछे की सौदेबाजी की यह कहानी एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। ट्रंप नामक लंपट विदूषक तो बस इसका चेहरा भर है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों को इस हद तक क्यों उतरना पड़ा है? क्यों वे ‘शत्रु-मित्र’ सभी देशों को अपने खिलाफ खड़ा कर रहे हैं? क्यों वे पहले से ही गंभीर रूप से संकटग्रस्त विश्व अर्थव्यवस्था को और ज्यादा अस्थिर कर रहे हैं?
इसका उत्तर स्वयं इस संकट तथा कुछ अन्य दूरगामी प्रवृत्तियों में है।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर साम्राज्यवादियों ने वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था को नियमित करने के लिए तीन संस्थाओं के गठन का फैसला किया था जिन्हें ब्रेटन वुड्स संस्थाएं कहा जाता है क्योंकि उनके गठन की रूपरेखा अमेरिका के इसी स्थान पर हुए सम्मेलन में बनी थी। ये संस्थाएं थींः अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन। इन संस्थाओं के गठन की एक पृष्ठभूमि थी।
दोनों विश्व युद्धों के बीच के काल में, खासकर 1929 से शुरू हुई महामंदी के काल में साम्राज्यवादी देशों के बीच ‘मुद्रा युद्ध’ और ‘तटकर युद्ध’ बहुत तेज हो गया था। निर्यात में बढ़त हासिल करने के लिए देश अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन कर रहे थे और तटकर बढ़ा रहे थे। इसने महामंदी को और घनीभूत किया। इस तरह महामंदी से निकलने के देशों के व्यक्तिगत प्रयास ने वैश्विक तौर पर उसे और घनीभूत किया। अंततः द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से महामंदी से निजात मिली।
विजेता साम्राज्यवादी देशों (सं.रा.अमेरिका, फ्रांस और यूके) के लिए स्पष्ट था कि महामंदी के काल में जो कुछ हुआ था उसे फिर नहीं होने दिया जा सकता था, खासकर तब जब सोवियत संघ के नेतृत्व में समाजवाद का खतरा सामने हो। इसीलिए उन्होंने वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था को नियमित करने के लिए कुछ करने की योजना बनाई।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन अमेरिका के न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स में जुलाई 1944 में आयोजित हुआ था। वैसे तो यह संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में सभी 44 ‘मित्र राष्ट्रों’ का (द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी-इटली-जापान के खिलाफ आंदोलन) सम्मेलन था पर सोवियत संघ की इसके मूल फ्रेमवर्क से असहमति के चलते यह असल में विजेता साम्राज्यवादी देशों के फ्रेमवर्क का सम्मेलन हो गया। तीनों संस्थाओं में से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का काम देशों की मुद्राओं (प्रमुखतः साम्राज्यवादी देशों की मुद्राओं) को एक सीमा के भीतर बांघ कर रखना था और यह किया गया सभी मुद्राओं को अमेरिकी डालर से बांधकर। स्वयं अमेरिकी डालर की कीमत सोने से तय कर दी गयी- एक आउंस (28.5 ग्राम) सोने की कीमत 35 अमेरिकी डालर।
विश्व बैंक या पुनर्निर्माण व विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैंक (इसका औपचारिक नाम) का काम था द्वितीय विश्व की तबाही से उबरने के लिए देशों की मदद करना। यूरोप में ‘मार्शल योजना’ इसी के तहत लागू की गयी जिसका असल मतलब था अमेरिकी पूंजी की मदद से और प्रथमतः उसके फायदे में यूरोप में पुनर्निर्माण।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन को वैश्विक व्यापार को नियमित करना था। 1948 में क्यूबा की राजधानी हवाना में हुए सम्मेलन में इसका एक चार्टर यानी विधान बना भी लिया गया पर अमेरिकी सीनेट ने इसे मंजूरी देने से मना कर दिया। इस तरह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन अस्तित्व में नहीं आ सका। इसके बदले गैट (GATT- व्यापार और तटकर पर आम सहमति) अस्तित्व में आया जिसके तहत देश समय-समय पर व्यापार और तटकर पर आम सहमति कायम करते थे। 1986 तक इसकी सात चक्र की वार्ताएं हुईं और सहमतियां बनीं। हर चक्र में इसका दायरा बढ़ता गया। अंत में 1986 में आठवें चक्र की वार्ता शुरू हुई जो आठ साल तक चलती रही। इसे उरुग्वे चक्र कहा जाता है। लम्बी वार्ताओं के बाद अंत में मोरक्को के माराकेश में संधि हुई और विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया- 1 जनवरी, 1995 को।
1948 में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का मृत जन्म इसलिए हुआ कि तब संयुक्त राज्य अमेरिका पूंजीवादी दुनिया का चुनौतीविहीन चौधरी था और वह स्वयं को किसी नियम-कानून से नहीं बांधना चाहता था। इसीलिए अमरीकी सीनेट ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन के चार्टर को मंजूरी नहीं दी। अमेरिका के बिना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का कोई मतलब नहीं था। वह पैदा होते-होते ही मर गया।
लेकिन 1986 तक दुनिया बदल चुकी थी। अब अन्य साम्राज्यवादियों समेत अमेरिकी साम्राज्यवादियों को भी यही बेहतर लगा कि सारी दुनिया के पैमाने पर पूंजी के मुक्त विचरण की जो व्यवस्था अस्तित्व में आई है उसे नियमित करने के लिए कुछ व्यापक नियम-कानून बनाए जायें। इसकी अनुपस्थिति में आपसी मारकाट महामंदी के समय वाली मारकाट में बदल सकती थी। इसीलिए उन्होंने सारी दुनिया के पैमाने पर व्यापार को सुगम बनाने के नाम पर न केवल मालों बल्कि पूंजी के भी मुक्त प्रवाह की एक व्यवस्था कायम की तथा उसे विश्व व्यापार संगठन का नाम दिया। यह व्यवस्था पूर्णतया साम्राज्यवादियों के हित में थी हालांकि उनकी हैसियत उसमें उनकी वरीयता को तय कर रही थी। जहां तक पिछड़े पूंजीवादी देशों का सवाल है, यह व्यवस्था आम तौर पर उनके खिलाफ थी हालांकि चोट को सहने योग्य बनाने के लिए उसमें कुछ मरहम के प्रावधान किये गये थे।
विश्व व्यापार संगठन के नियम-कानून तथा उसकी संरचना 1986-1994 के वैश्विक शक्ति संतुलन को अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन उसके बाद के तीन दशकों में दुनिया भर के शक्ति संतुलन में काफी परिवर्तन आया है और उसने विश्व व्यापार संगठन के संचालन को काफी प्रभावित किया है।
दुनिया में बदलते शक्ति संतुलन के साथ खींचतान 2001 में ही सामने आ गयी थी जब 2001 में दोहा में विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के तहत ही अपेक्षाकृत बड़े परिवर्तनों के लिए वार्ता शुरू हुई। इसके तहत एक ओर साम्राज्यवादी आपस में संघर्षरत थे तो दूसरी ओर वे बड़े पिछड़े पूंजीवादी देशों के साथ भी संघर्षरत थे। कई चक्रों की वार्ताएं बेनतीजा रहीं और 2015 तक मान लिया गया कि वार्ताओं का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। दोहा चक्र का व्यवहारतः अवसान हो गया।
दोहा चक्र का यह हश्र इस बात का भी संकेत था कि दुनिया भर के समीकरण कुछ ऐसे बन गये हैं कि पूंजी के मुक्त विचरण पर आम सहमति के अलावा अपने-अपने विशिष्ट हितों पर कोई आम सहमति नहीं हो सकती। साम्राज्यवादी देश आपस में सहमत नहीं हो पा रहे थे और इसीलिए वे मिलकर पिछड़े पूंजीवादी देशों को और ज्यादा दबा भी नहीं पा रहे थे। ऐसी अवस्था में विश्व व्यापार संगठन एक तरह से निष्प्रभावी हो गया या ‘डिस्फंकशनल’ हो गया। उसकी विवादों के निपटारे वाली संस्था ने काम करना बंद कर दिया।
पिछले कुछ सालों से यही स्थिति है। वैश्विक व्यापार के मामले में देश अपने-अपने हितों के हिसाब से चल रहे हैं। वे भांति-भांति के व्यापार गुट बना रहे हैं। तटकरों को इसके हिसाब से ऊपर-नीचे कर रहे हैं। स्वभावतः ही साम्राज्यवादी देशों तथा बड़े पिछड़े पूंजीवादी देशों के पास इसकी गुंजाइश ज्यादा है। छोटे पिछड़े देश पहले की ही तरह पिस रहे हैं।
2007-08 से शुरू हुए विश्व आर्थिक संकट ने इस सबमें अपनी तरह से भूमिका निभाई है। ऊपरी तौर पर यह संकट एक-दो साल का ही था पर असल में उसके दीर्घकालिक प्रभाव आज भी गंभीर हैं। आज भी दुनिया उनसे उबर नहीं सकी है। यह बढ़े हुए कर्ज, बेरोजगारी तथा नीची वृद्धि दर सबमें अभिव्यक्त हो रहे हैं।
इस संकट का वैश्विक व्यापार की मारकाट पर प्रभाव पड़ना ही था। इसने इस मारकाट को और तीखा कर दिया। इसी के चलते दोहा चक्र की वार्ताओं में किसी लेन-देन की गुंजाइश और कम हो गयी। इसी ने विश्व व्यापार संगठन के तहत व्यापार संबंधी विवादों को सुलझा पाना और मुश्किल बना दिया। परिणामस्वरूप वह व्यवस्था ही निष्क्रिय हो गई। 2020 से अपील वाले निकाय का कोई सदस्य नहीं है और इसलिए वहां कोई विवाद नहीं सुना जा सकता। ऐसा अमरीकियों के कारण हुआ।
अब अमरीकी साम्राज्यवादी एक कदम आगे बढ़कर पहले की सहमतियों की भी धज्जियां उड़ा रहे हैं। वे एक तरह से पहले के सारे समझौतों को रद्द कर नये सिरे से समझौता कर रहे हैं। वे विश्व व्यापार और पूंजी के प्रवाह को नये सिरे से अपने पक्ष में ढालना चाहते हैं।
यह ध्यान रखना होगा कि विश्व व्यापार संगठन का क्रमशः निष्क्रिय होना ट्रंप की सनकी कार्रवाईयों का नतीजा नहीं है। यह एक-डेढ़ दशक में हुआ है और अमरीकी प्रशासन के डेमोक्रैट-रिपब्लिकन सभी इसमें शामिल रहे हैं। इसमें ओबामा-बाइडेन भी शामिल हैं और डोनाल्ड ट्रंप भी।
लंपट और सनकी डोनाल्ड ट्रंप जो कर रहे हैं वह भदेस रूप में अमरीकी साम्राज्यवादियों की छटपटाहट को दिखाता है। वैश्विक व्यापार की जो व्यवस्था उन्होंने खुद एक समय निर्मित की थी उसका इस तरह से विध्वंस उनकी घोर छटपटाहट के अलावा किसी और चीज को नहीं दिखाता।
अमेरिकी साम्राज्यवादियों का इतने भदेस तरीके से अपनी छटपटाहट को दिखाना चीनी साम्राज्यवादियों के उभार का भी नतीजा है। दुनिया भर में चीनी साम्राज्यवादी जिस तरह अपना ताना-बाना फैला रहे हैं उसे देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों को लगने लगा है कि यदि वे अभी कुछ नहीं करते तो चीनी उन्हें ठिकाने लगा देंगे। मजे की बात यह है कि चीनियों का उभार विश्व व्यापार संगठन के ताने-बाने में ही हुआ और इसीलिए वे आज उसके पैरोकार बने हुए हैं।
आज दुनिया भारी उथल-पुथल से गुजर रही है। एक ओर सारी दुनिया की नजरों के सामने सारी सरकारों की सहमति से इजरायली जियनवादी फिलिस्तीनियों का नरसंहार कर रहे हैं तो दूसरी ओर स्वयं यूरोप युद्ध की चपेट में है जिसमें सारे पश्चिमी साम्राज्यवादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उलझे हुए है। दुनिया भर में पचासों देश गृहयुद्ध या पड़ोसी के साथ युद्ध में उलझे हैं। ऐसी स्थिति में ट्रंप जैसे लंपट-सनकी राष्ट्रपति के नेतृत्व में अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा वैश्विक व्यापार में उथल-पुथल को सामान्य उथल-पुथल के हिस्से के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
यह वैश्विक उथल-पुथल दुनिया भर के साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासकों और उनकी व्यवस्था की शोचनीय स्थिति की भी द्योतक है जो अपनी व्यवस्था को चला पाने में अक्षम साबित हो रहे हैं।