सवालों से भागता चुनाव आयोग

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भारत का चुनाव आयोग आजकल काफी चर्चा में है। एक तरफ बिहार में मतदाता सूची पुनर्रीक्षण पर पहले से ही हल्ला मचा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जारी बिहार की तदर्थ मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों के साथ 65 लाख मतदाताओं के नाम कट गये हैं। वहीं अब राहुल गांधी द्वारा कर्नाटक की एक विधानसभा में एक लाख से अधिक फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में जोड़े जाने के दावे ने चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इससे पहले भी चुनाव आयोग पर भाजपा के पक्ष में चुनाव कार्यक्रम बनाने, चुनावों में सीसीटीवी फुटेज को शिकायतकर्ताओं को न सौंपने, फुटेज 45 दिन में नष्ट करने आदि तरह-तरह के आरोप लगते रहे हैं। 
    
इन सब मामलों पर चुनाव आयोग का अड़ियल अहंकारी रुख दरअसल उसकी विश्वसनीयता को काफी कमजोर कर चुका है। आरोपों की जांच करने, उस पर स्पष्टीकरण देने के बजाय वह आरोपों को खारिज कर आरोप लगाने वालों पर झूठ बोलने-माफी मांगने, शपथ पत्र देने आदि के पैंतरे चल रहा है। यह सब करते हुए चुनाव आयोग प्रकारान्तर से साबित कर रहा है कि मोदी काल में वह एक स्वतंत्र संस्था न रहकर अधीनस्थ संस्था बन चुका है। कि अब देश के चुनावों में संघ-भाजपा की हर तीन-तिकड़मों में वह बराबर का भागीदार है। कि उसका लक्ष्य तथाकथित ‘स्वतंत्र-निष्पक्ष’ चुनाव कराना नहीं भाजपा को येन केन प्रकारेण जिताना बन गया है। 
    
वैसे भारत के चुनाव कभी भी पूर्णतया स्वतंत्र-निष्पक्ष कभी नहीं रहे। पूंजीवादी व्यवस्था में ये हो भी नहीं सकते। चुनावों में पूंजी का बड़े पैमाने पर खेल, बाहुबल, सरकारी मशीनरी का रुख इसे हमेशा ही शासक वर्गों की पार्टियों के बीच का चुनावी खेल बनाकर रखते हैं। आम गरीब मजदूर-मेहनतकश न तो इन चुनावों को लड़ने का खर्च वहन कर सकता है और न ही भारी भरकम चुनाव प्रचार का खर्च ही वहन कर सकता है। ऐसे में चुनाव शासक वर्ग के प्रतिनिधियों के बीच चुनाव ही रह जाता है। आम जन की उसमें भागीदारी महज मतदान करके इस भ्रम में जीते रहने भर की है कि सरकार को जनता चुनती है। 
    
पर फिर भी शासक वर्ग के प्रतिनिधियों के बीच यह चुनाव आम तौर पर स्वतंत्र व निष्पक्ष होता आ रहा था। बूथ कैप्चरिंग व धांधली समय के साथ कम होती गयी थीं। शासक वर्गीय पाटियां चुनावों में जीत के लिए हर 5 वर्ष में जनता के बीच जाने, झूठे वायदे करने को मजबूर थीं। पर 2014 में मोदी के सत्तासीन होने के बाद इस सबमें बदलाव आने लगा। अब ईवीएम, फर्जी मतदाता आदि के जरिये चुनाव आयोग की मदद से चुनाव को प्रभावित किये जाने की बातें आम होने लगीं। चुनाव आयोग के भाजपा के इशारों पर चलने के आरोप बढ़ने लगे। पहले जनता को लुटेरों में से एक को चुनने की सहूलियत थी अब वह भी उससे छीनी जाने लगी। 
    
ऐसे में फासीवादी हिन्दू राष्ट्र की परियोजना को हाथ में लिए संघ-भाजपा का व्यवहार दिखाता है कि वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे चुनावों को फर्जी बना खुद के हर बार जीतने का इंतजाम भी कर सकते हैं तो चुनाव कराना बंद करने की ओर भी बढ़ सकते हैं। वे विपक्षी दलों को खत्म करने, उनके नेताओं को जेल में ठूंसने की ओर भी बढ़ सकते हैं। एक हद तक वो ऐसा कर भी रहे हैं। 
    
कहने की बात नहीं है कि भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के सहयोग-समर्थन से वे भारतीय लोकतंत्र को लात लगा रहे हैं। पूंजीपतियों का मीडिया संघ-भाजपा के सुर में सुर मिला रहा है। 
    
ऐसे में वोट चोरी-चुनाव चोरी का राहुल गांधी का आरोप कुछ-कुछ सच नजर आता है। पर ध्यान में रखना होगा कि यह चोरी विपक्षी पूंजीवादी दलों से हो रही है। जहां तक आम मजदूर-मेहनतकश जनता का सवाल है तो वो तो आजादी के बाद हर चुनाव में ही ठगी जाती गयी है। पूंजीवादी व्यवस्था में स्वस्थ से स्वस्थ और निष्पक्ष से निष्पक्ष चुनाव भी मजदूर-मेहनतकशों को शासकों द्वारा ठगने का ही काम करते आये हैं। 
    
ऐसे में जरूरत है कि पूंजीवादी लोकतंत्र के दायरे में अपने मताधिकार के जनवादी अधिकार पर हमले की रक्षा में खड़े होने के साथ-साथ ऐसी व्यवस्था के लिए भी संघर्ष किया जाये जहां मजदूर-मेहनतकश जनता ही वास्तविक शासक हो। जहां उसका मत पूंजीपतियों के नुमाइन्दों में से एक को चुनने को मजबूर न हो। ऐसी व्यवस्था इंकलाब के जरिये ही कायम हो सकती है। 

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।