देश में चुनाव के दौरान अक्सर ही गुस्से में आकर कई लोग कहते सुने जाते हैं कि अब उक्त पार्टी को हम वोट नहीं करेंगे। लंबे समय से यही देखा गया है कि किसी एक पार्टी की सरकार के खिलाफ जन असंतोष के चलते तीखा रुझान होता था तो जनता उक्त पार्टी के खिलाफ वोट डालकर उससे छुटकारा पा लेती थी। हालांकि लूट-खसोट, अन्याय-उत्पीड़न से मुक्ति तब भी नहीं मिलती थी। किसी खास पार्टी या पार्टियों के गठबंधन की सरकार के खिलाफ माहौल होने पर अक्सर ही यही होता था कि चुनाव के बाद दूसरी पार्टी या पार्टियों के गठबंधन की सरकार आ जाती थी।
इतिहास के हिसाब से भी यह समय बेहद छोटा होता मगर व्यक्तियों या इंसानों के जीवन काल के हिसाब से यह समय काफी लम्बा हो जाता है। आजादी के बाद से विशेषकर 70 के दशक के बाद लम्बे समय तक यह माहौल बना रहा। अगर एक बेहद सीमित समय यानी आपातकाल को छोड़ दें। हालांकि तब भी जब चुनाव हुए तब जनता ने इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी को अपने वोट से परास्त कर दिया और जनता पार्टी को सत्ता पर पहुंचा दिया। मगर तीन साल गुजरते-गुजरते फिर माहौल जनता पार्टी की स्थिति को देखकर इसके खिलाफ बना और फिर इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी चुनाव में जीत हासिल करके सत्ता पर पहुंच गई।
प्रांतों में तो यह चुनावी उठापटक और भी ज्यादा दिखती थी। जिन राज्यों में कांग्रेस और भाजपा थी। वहां इनके बारी-बारी से सत्ता में पांच-पांच साल तक बने रहने की परंपरा सी आम तौर पर बन गई। केरल में यह माकपा के गठबंधन (एल डी एफ) और कांग्रेस की अगुवाई वाले (यू डी एफ) के रूप में दिखा।
यहीं से, इस तरह की चुनावी उठापटक और इसमें जनता के लिए चुनाव और चुनाव में वोट की ताकत को शाश्वत मानने की रीत सी चल पड़ी। आम तौर पर जनता के लिए यह गुंजाइश थी कि जिस सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ उसका गुस्सा है उसे सत्ताच्युत करके अपने वोट की ताकत दिखाए। कुछ हद तक पार्टियों को भी विशेषकर छोटी पार्टियों को भी यही लगता था।
मगर अब हिंदू फासीवादियों ने इस उठापटक को या कहें कि सत्ता से बेदखल होने के खतरे को रोकने का तरीका ईजाद कर लिया है या करने में जुटी है। अपने हिसाब से लम्बे समय तक सत्ता पर बने रहने का इंतजाम कर लिया गया है। पहले चोरी छुपे और फर्जीवाड़े से संघी सरकार ने यह काम किया तो अब एस आई आर के जरिए खुलेआम यह किया जा रहा है। अब हिंदू फासीवादी न केवल मनपसंद और मनमाफिक मतदाताओं का चुनाव कर रहे हैं बल्कि नागरिकों का भी चुनाव कर रहे हैं। शायद इसीलिए अमित शाह ने पहले ही घोषित कर दिया था कि भाजपा-संघ पचास साल तक सत्ता पर रहेंगे। खैर शेखचिल्लियों के योजना बनाने या ऐसा सोचने में क्या जाता है। जनता इससे काफी पहले ही इन्हें शायद इतिहास के पन्नों में समेट दे।
अब जहां तक बात है सत्ता से किसी शासक वर्गीय पार्टी को हटाकर जनता द्वारा किसी दूसरी पार्टी को चुनाव के जरिए सत्ता में बैठाकर सबक सिखाने की। असल में सतह पर दिखने वाली इसी घटना को पूंजीवादी लोकतंत्र की हकीकत मान लिया जाता है। जबकि हकीकत इसके उलट है। मालिकों के लिए, उनकी पार्टियों के लिए आम तौर पर पूंजीवाद के शांतिपूर्ण विकास के काल में ही यह संभव था व छोटी पूंजी के एक हद तक शासक यानी बड़ी पूंजी के मालिकों के सामने सौदेबाजी की कुछ गुंजाइश मौजूद थी। इसीलिए जनता के लिए भी एक दल को हरा दूसरे को जिताने की गुंजायश थी यानी यह केवल पूंजीवाद के एक विशिष्ट, अपेक्षाकृत स्थिर और विस्तार के चरण में ही संभव था। आजादी के बाद भारत में लंबे समय तक यह स्थिति अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव और बीच-बीच में संकट के बावजूद जारी रही।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था जब संकट के दौर में प्रवेश करती है- आर्थिक मंदी गहराती है, संसाधन सिकुड़ते हैं, लाभ की दरें गिरती हैं, बेरोजगारी बढ़ती है, और समाज में असमानता चरम पर पहुंचती है- तो शासक वर्ग की वह ‘‘गुंजाइश’’ समाप्त होने लगती है। रियायतें देना मुश्किल हो जाता है। शासक वर्ग अपना बोझ तीखे ढंग से जनता पर डालता है। साथ ही बड़ी पूंजी अब छोटी पूंजी का मुनाफा भी हड़प जाना चाहती है। एक दौर में इस तरह की स्थिति में संवैधानिक तानाशाही थोपने वाला शासक वर्ग अब हिंदू फासीवादियों के जरिए फासीवादी राज्य कायम करने की ओर बढ़ जाता है।
हिंदू फासीवादियों के जरिए शासक वर्ग यही कर रहा है और हिंदू फासीवादी एस आई आर के जरिए पूंजीवाद के चुनावी प्रतिनिधित्व की लोकतांत्रिक प्रणाली को सजावटी और बिलकुल खोखला बनाने का काम कर रहे हैं। इसके लिए एस आई आर में फार्म 7 का इस्तेमाल खूब हो रहा है। इसका इस्तेमाल किसी मतदाता का नाम सूची से हटवाने के लिए हो रहा है। इसके जरिए मृत, स्थानांतरित या अनुपस्थित होने की बात दर्ज करके मतदाता का नाम हटा दिया जा रहा है। फार्म 6 नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए है। आरोप लग रहे हैं कि इसके जरिए संघी अपने मतदाताओं को मतदाता सूची में जोड़ रहे हैं।
एस आई आर में बी एल ओ किसी को अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत बताकर मतदाता सूची से हटा सकता है। यदि मतदाता अशिक्षित, कम पढ़ा-लिखा, गरीब मेहनतकश हो तो यह काम बेहद आसान हो जाता है। ई आर ओ अपने विवेकाधीन अधिकार के चलते किसी को मतदाता सूची में डाल सकता है या इससे बाहर कर सकता है। इस तरह इन्हें यह विशेष अधिकार है। साथ ही किसी का मतदाता सूची में नाम होने के बावजूद 2003 की सूची से मिलान (मैपिंग) न होने का तर्क देकर या संदिग्ध बताकर संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी कर सकता है। मतदाता सूची में नाम होगा या नहीं नतीजतन संदिग्ध नागरिक का ठप्पा लगेगा या नहीं इसका तात्कालिक तौर पर फैसला करने का जिम्मा ई आर ओ के हवाले कर दिया गया है।
हिंदू राष्ट्रवादी इस तरह आम नागरिकों को पहले मतदाता और फिर नागरिकता से ही बाहर कर देने की फासीवादी योजना पर खुलकर आगे बढ़ रहे हैं। चुनिन्दा दस्तावेजों को ही मानने और दस्तावेजों में तमाम गलतियां होने की संभावना के चलते गरीब मेहनतकश आबादी के ज्यादा प्रभावित होने की संभावना थी और उसमें भी महिलाएं। यही अब तक देखने को मिला है।
एस आई आर के दौरान बिहार में लगभग 47 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। लगभग 3.70 लाख मतदाता अयोग्य घोषित कर दिए गए। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली महिलाएं हैं। बिहार में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं मतदाता सूची से बाहर हुईं। लगभग 22.74 लाख महिलाएं तो 15 लाख पुरुष मतदाता सूची से बाहर हुए।
अब उत्तर प्रदेश में भी यही हाल हैं। यहां कुल 2.89 करोड़ मतदाता मृत, स्थानांतरित आदि बताकर पहली ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए। यहां भी सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित हैं। 1.54 करोड़ महिलाओं का ड्राफ्ट मतदाता सूची से नाम हटा दिया गया है।
महिलाओं का मतदाता सूची से नाम हटाये जाने या हट जाने का अनुमान पहले से ही था। इसका कारण संपत्ति में महिलाओं का नाम आम तौर पर नहीं होना, दस्तावेजी साक्ष्यों की कमी, शादी के बाद नाम में बदलाव आदि है। इसी तरह मेहनतकश मुसलमान और दलित, आदिवासी और मेहनतकश महिलाओं का नाम मतदाता सूची से बाहर होने की संभावना ज्यादा थी। यही व्यवहार में दिख रहा है।
इस तरह जैसे-जैसे जनता हिंदू फासीवादी सरकार पर अपना विश्वास खो रही है वैसे-वैसे सरकार सत्ता पर बने रहने के लिए जनता का चुनाव कर रही है। जाहिर है जो विरोधी हैं या जो विपक्ष के मतदाता हैं वे बाहर होंगे, बहुत ज्यादा नहीं तो इतना कि चुनाव भी होता रहे और सरकार भी हिंदू फासीवादियों की बनती रहे। और फिर वक्त आने पर इसे मनपंसद नागरिकों के चयन में बदल देने की कोशिश होगी। हिन्दू फासीवादी इन हथकण्डों से अगले 50 वर्ष सत्ता में बने रहने का सपना पाले हैं पर लगता है कि वे पड़ोसी मुल्कों नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश का हश्र भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि जब परेशान तंगहाल जनता सड़कों पर उतरती है तो वो सरकार बदलने के लिए चुनाव का इंतजार नहीं करती। हिन्दू फासीवादी भी अपनी तिकड़मों से अपने ऐसे ही हस्र को करीब ला रहे हैं।