अंकिता भण्डारी केस की सी बी आई जांच की मांग तेज
अंकिता भण्डारी केस में एक बार फिर से उबाल आ चुका है। भाजपा से निष्कासित पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर द्वारा केस में वी आई पी के बतौर भाजपा के राष्ट्रीय
अंकिता भण्डारी केस में एक बार फिर से उबाल आ चुका है। भाजपा से निष्कासित पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर द्वारा केस में वी आई पी के बतौर भाजपा के राष्ट्रीय
रामनगर/ वन ग्राम पूछडी में बुल्डोजर कार्रवाही के बाद भड़के ग्रामीणों के आक्रोश ने अब आंदोलन का रूप ले लिया है। संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले 21 दिसंबर
यह हमेशा से होता रहा है कि जब भी शोषित-उत्पीड़ित जनता अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए उठ खड़ी होती है और अपना संगठित आक्रोश व्यक्त करती है तो व्यवस्थापोषक लोग शांति और संयम की अपील करके उनको ठंडा करने की कोशिश करते हैं, ताकि उनका लूट का तंत्र चलता रहे। उनके लिए शांति और व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। न्याय की मांग को वे व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं।
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में हुये नये खुलासे में वीआईपी के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ ‘गट्टू’ क
वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे।
ब्राजील में 15 दिसंबर को सरकारी तेल कम्पनी पेट्रोब्रास के मजदूरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी और उसके बाद सरकारी डाक विभाग करिओस के कर्मचारियों ने भी हड़ताल कर द
गिग एंड प्लेटफार्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (जीआईपीएसडब्ल्यूयू) के आह्वान पर, भोजन और अन्य ऐप-आधारित ‘‘डिलीवरी पार्टनर’’ ने ‘‘सुरक्षा, संरक्षा और सम्मान’’ के अधिकार की मांग
हाल ही में मोदी सरकार ने मनरेगा ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को खत्म कर विकसित भारत जी राम जी बिल संसद के दोनों सदनों से पास कराकर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करा लिए हैं और अ
पूरी दुनिया के पैमाने पर नये साल का जश्न बहुत पुरानी बात न होकर महज बीसवीं सदी की बात है। शहरों के मुख्य चौराहों-बाजारों या ऐसे ही सार्वजनिक स्थलों पर उन्मादी भीड़ का जश्न तो बहुत ही हालिया घटना है। ‘पापुलर मास कल्चर’ (लोकप्रिय जन संस्कृति) बनवाने में पूंजीपतियों खासकर होटल-पर्यटन-मनोरंजन आदि से जुड़े कारोबारियों की अपनी खास भूमिका है। और इस जश्न में जिनकी पौ-बारह होती है वे पूंजीपति ही हैं। मध्यम वर्ग जश्न के उन्माद के बीतने के बाद हिसाब-किताब लगाता है। मजदूर वर्ग अपने थके हुए जिस्म व सतायी हुयी आत्मा को जश्न के उन्माद से राहत पहुंचाने की कोशिश करता है।
हिटलर की आत्मा के भारत के भीतर यात्रा के 100 साल हो चुके हैं। एक ओर यह सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है तो दूसरी तरफ अब हर शहर की गलियों में ये मौजूद है। इनके प्रभाव में नफर
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।