भ्रष्टाचार का मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। मगर लगता है मोदी युग में संसद इसके दायरे से मुक्त है। अब निशाने पर न्यायपालिका है। 2012 में भ्रष्टाचार को देशव्यापी मुद्दा बनाया गया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने वाले अन्ना हजारे अब गायब हैं। इस अनशन के इर्द-गिर्द झंडा लहराने वाले अधिकांश संसद और विधान सभाओं में पहुंच चुके हैं। इस प्रायोजित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के जरिए हिंदू फासीवादी ताकतों को सत्ता पर पहुंचाने के लिए पूरा माहौल बनाया गया था।
हिंदू फासीवादियों के सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार ने संगठित भ्रष्टाचार का रूप ले लिया। इस संगठित भ्रष्टाचार ने अभूतपूर्व कीर्तिमान बनाए। एकाधिकारी पूंजी और हिंदू फासीवादी ताकतों के गठजोड़ ने इस संगठित भ्रष्टाचार के कारनामों को ‘महान काम’ बताया। नोटबंदी, पी एम केयर फंड इसके अनुपम उदाहरण हैं।
अब भ्रष्टाचार ने ‘राष्ट्र निर्माण’ का रूप धर लिया इसलिए भ्रष्टाचार के रूप में यह गायब हो गया। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ का नारा अब 10 लाख के लखटकिया कोट में प्रकट हुआ। इसलिए भ्रष्टाचार को अब गायब हो जाना था। मोदी-शाह की जोड़ी ने नई संसद के निर्माण के लिए 20 हजार करोड़ रु. का ठेका टाटा को देकर संसद को ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ कर दिया था। अब निशाने पर न्यायपालिका थी। न्यायपालिका पर पूर्ण नियंत्रण से ही यहां से भी ‘भ्रष्टाचार’ का सफाया हो सकता था।
इसीलिए कक्षा 8 की एन सी ई आर टी किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाला अध्याय डलवाया गया, इसमें कोर्ट में लंबित मामलों का भी जिक्र था। मोदी-शाह की महान जोड़ी चाहती थी कि न्यायपालिका किस हद तक ‘भ्रष्टाचार’ में लिप्त है, यह स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पता लगे। यह भी पता लगे कि ‘कोर्ट के भ्रष्टाचार और असंवेदनशील होने के चलते’ लाखों मामले लंबित हैं ताकि जब वे बच्चे वयस्क नागरिक बन जायें तब न्यायपालिका से ‘भ्रष्टाचार’ खत्म करवाने के लिए इसे प्रधान सेवक को सौंप देने का बजरंग दल जैसा आंदोलन चलाएं जिससे ‘नोटबंदी’ की तरह यहां से भी भ्रष्टाचार का सफाया हो सके।
मगर सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत भी मोदी-शाह से कम ईमानदार नहीं हैं। लगता है वो भी खुद को मोदी नहीं तो मोदी के समकक्ष ही समझते हैं। उन्हें भी इसमें मोदी-शाह और अन्य संघियों की तरह कोई साजिश नजर आई। आखिर जब मोदी-शाह की जोड़ी तथा भाजपाइयों और संघियों को पत्रकारों, बुद्धिजीवियों या विपक्ष के सवाल और आलोचना में देश विरोधी या मोदी विरोधी साजिश नजर आने लगती है, जनता के सड़कों पर प्रदर्शन ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की साजिश नजर आती है तब जस्टिस सूर्यकांत को भला ऐसा क्यों ना लगे।
आलोचक कहते हैं कि अध्याय में दिए गए आंकड़े तथ्यात्मक रूप से सही थे- सुप्रीम कोर्ट में 81,000, हाईकोर्ट में 62 लाख और जिला अदालतों में 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। कुछ दावा कर रहे हैं ‘‘पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक गुण हैं’’ फिर इसे हटाना क्यों जरूरी था?
आखिर जब पी एम केयर, नोटबंदी, ट्रेड डील से लेकर हर मामले में गोपनीयता और गैर जवाबदेही है। तो यहां भी मुख्य न्यायाधीश यही तर्क क्यों न पेश करें। उन्होंने इस न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले अध्याय को सुनियोजित साजिश बताया। इसे न्यायपालिका को बदनाम करने और संस्थान की गरिमा को कमतर करने का एक सोच-समझकर उठाया गया कदम बताया।
मोदी के ‘देश नहीं बिकने दूंगा’ की तर्ज पर सीजेआई ने कहा कि ‘‘मैं दुनिया में किसी को भी इस संस्था की गरिमा को कलंकित करने या बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा’’। सी जे आई ने इस अध्याय को तत्काल हटाने का निर्देश दिया। एनसीईआरटी ने तुरंत माफी मांगी। किताबों के वितरण पर रोक लगा दी। जहां तक कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या है इसके लिए वास्तविक तौर पर दोषी कौन है, इस पर सी जे आई पिछले दौर में रहे मुख्य न्यायाधीशों की अवस्थिति से भी काफी पीछे हट गए। तब के कुछ मुख्य न्यायाधीशों ने न्यायालयों में लंबित मामलों के संबंध में सीधे मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जिसने न्यायाधीशों की भर्ती के मामलों को रोक कर रखा था।
आखिरकार जस्टिस सूर्यकांत एक रूप में वही कर रहे हैं जो मोदी-शाह की जोड़ी बड़े पैमाने पर कर रही है। सी जे आई पर भ्रष्टाचार के कुछ आरोप हैं तो मोदी-शाह पर भी कम आरोप नहीं हैं। अडाणी-अंबानी मामले में मोदी जो काम राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कर रहे हैं वही तो सी जे आई भी राष्ट्रीय स्तर पर कर रहे हैं बस न्यायपालिका के स्तर पर। यही बात मजदूर वर्ग और अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों में भी है।
संसद में मजदूर वर्ग विरोधी चार कोड बन जाते हैं वहीं न्यायपालिका को ट्रेड यूनियनें देश के औद्योगिक विकास के लिए खतरा नजर आती हैं। जस्टिस सूर्यकांत की नजर में ट्रेड यूनियनवाद औद्योगिक विकास को रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार रहा है। यह बात सी जे आई ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कही थी।
इसी तरह एक सुनवाई के दौरान जब एक वकील ने कहा कि ‘‘अडाणी और अंबानी के लिए संविधान पीठें बनाई जा रही हैं’’ जबकि आम आदमी की सुनवाई तक नहीं हो रही तब सीजेआई ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी। उनकी अदालत में सौ बार सोच कर बोलने के लिए कहा। इसी तरह पर्यावरणीय मामलों में अडाणी समूह के ताप विद्युत संयंत्र पर रोक लगाने से इनकार करते हुए सीजेआई ने विकास और पर्यावरण में संतुलन की लफ्फाजी की।
न्यायपालिका में असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ नफरत भरे भाषणों पर भी याचिका लगी थी। असम के मुख्यमंत्री हेमंता ने खुलकर संविधान विरोधी भड़काऊ बयान दिये व काम किए। इसने गरीब मुस्लिमों को परेशान करने का खुलेआम आह्वान किया साथ ही एक वीडियो बनवाकर जिसमें दो मुस्लिमों पर मुख्यमंत्री खुद गोली चला रहा है, अपलोड किया गया। जिसकी तीखी आलोचना होने पर मुख्यमंत्री हेमंता ने वीडियो हटा दिया। मगर न्यायपालिका में इस मुख्यमंत्री के खिलाफ जब याचिका लगी तब सूर्यकांत ने याचिका खारिज कर दी। सी जे आई ने तर्क दिया कि यह चयनित यानी एक पक्षीय याचिका थी। उन्होंने कहा कि राजनीति में हुड़दंग को स्वीकार नहीं करेंगे। यानी अल्पसंख्यकों के खिलाफ जो कुछ भी हिंदू फासीवादी करेंगे, उन्हें करने देगी और न्यायपालिका उस पर आंखें मूंद लेगी।
इस तरह साफ है कि वर्तमान सी जे आई के काल में न्यायपालिका का और ज्यादा क्षरण हुआ है। यह और ज्यादा हिंदू फासीवादी ताकतों के अधीन हो गई है। इसके फैसले मजदूर विरोधी हैं और जनवाद विरोधी हैं। इसके बावजूद हिंदू फासीवादी इसे अपने पूर्णतः नियंत्रण में लेने के हर संभव प्रयत्न में लगे हुए है। एन सी ई आर टी की इतिहास की किताब में भ्रष्टाचार पर अध्याय भी इसी प्रयास को दिखाता है। जहां तक अदालत में भ्रष्टाचार का प्रश्न है वह इतना संस्थागत व आम है कि अदालत की चपेट में आने वाला हर व्यक्ति इसे अच्छे से जानता है।