चंद्रशेखर आजाद के शहादत दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:01
/chandrashekhar-ajad-ke-sahadat-divas-par-vibhinn-programme-ka-ayojan

अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद हमारे देश के अविस्मरणीय क्रांतिकारी थे। वे उस ‘‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’’ के कमांडर इन चीफ थे जिससे भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू, विजय कुमार, शिव वर्मा और कुंदन लाल जैसे क्रांतिकारी जुड़े हुये थे। क्रांतिकारियों के इस संगठन का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और देशी जमींदारों व पूंजीपतियों के शोषण व जुल्म से देश की मजदूर-किसान जनता को आजाद कराकर देश में समाजवाद कायम करना था। 1925 के काकोरी कांड के बाद भूमिगत हो चुके चंद्रशेखर आजाद को ब्रिटिश सत्ता कभी जीते जी गिरफ्तार नहीं कर पाई थी। 27 फरवरी, 1931 को जब एक मुखबिर की सूचना पर ब्रिटिश पुलिस के 60 सिपाहियों के एक दस्ते ने उन्हें इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में घेर लिया, तब भी उन्होंने अकेले अपनी रिवाल्वर से उनका मुकाबला किया; और बुरी तरह घायल हो जाने पर, बचने का कोई रास्ता न देख, उन्होंने अपनी कनपटी पर गोली मारकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली; और इस तरह देश की जनता के दिलों में वे हमेशा-हमेशा के लिये अमर हो गये। 
    
इस बार 27 फरवरी को इंडियन आयल कार्पोरेशन लिमिटेड की पानीपत स्थित रिफाइनरी पर आंदोलनरत मजदूरों के बीच चंद्रशेखर आजाद का शहादत दिवस मनाया गया। मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) की ओर से किये गये इस कार्यक्रम के तहत संयुक्त मजदूर सभा और मार्च आयोजित किया गया जिसमें सीटू ने भी भागीदारी की। इस दौरान वक्ताओं ने चंद्रशेखर आजाद के क्रांतिकारी जीवन पर प्रकाश डालने के साथ पानीपत रिफाइनरी के आंदोलनरत मजदूरों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की और वेतन बढ़ाने सहित उनकी सभी मांगों का समर्थन किया। 
    
रामनगर के ग्राम पटरानी में इस मौके पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। परिवर्तनकामी छात्र संगठन द्वारा आयोजित इस विचार गोष्ठी में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र और प्रगतिशील भोजनमाता संगठन के कार्यकर्ताओं ने भी भागीदारी की। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद को महज 15 साल की किशोर उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ जुलूस निकालने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। तब, मजिस्ट्रेट द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने अपना नाम ‘‘आजाद’’, पिता का नाम ‘‘स्वतंत्रता’’ और घर का पता ‘‘जेलखाना’’ बताया था। इस पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 बेंत लगाने की सजा दी थी। तभी से उनके नाम के साथ ‘‘आजाद’’ जुड़ गया। 
    
लालकुआं में इस मौके पर इंकलाबी मजदूर केंद्र और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र द्वारा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि एक समाजवादी भारत का निर्माण करने का चंद्रशेखर आजाद का सपना आज भी अधूरा है। भारत में आज पूंजीवादी व्यवस्था कायम है और देश के पूंजीवादी शासक उन्हीं साम्राज्यवादियों से सांठ-गांठ कर रहे हैं जिनके खिलाफ लड़ते हुये वे शहीद हुये थे।
    
हरियाणा के कुरुक्षेत्र और जींद में इस मौके पर जन संघर्ष मंच द्वारा विचार गोष्ठियों का आयोजन कर चंद्रशेखर आजाद को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की और आज देश-दुनिया के हालातों पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद सिर्फ अंग्रेजों से आजादी ही नहीं बल्कि देश में मजदूर-मेहनतकशों की सत्ता चाहते थे।
        -विशेष संवाददाता
 

आलेख

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

/hindu-fascist-chunav-aayog-and-vidhansabha-chunaav

हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

/imperialism-and-abhijat-workers-class

दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।