जबरिया श्रम टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 60 से अधिक देशों पर नये तटकर लगाने की घोषणा की है। इस टैरिफ उपाय के तहत जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर यह नया तटकर घोषित किया ग
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 60 से अधिक देशों पर नये तटकर लगाने की घोषणा की है। इस टैरिफ उपाय के तहत जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर यह नया तटकर घोषित किया ग
कश्मीर के लोगों को लम्बे वक्त से फौजी बूटों के साये में जीना पड़ रहा है। बात चाहे भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर की हो या पाक नियंत्रित कश्मीर की, हालात दोनों जगह एक से हैं।
जिन लोगों ने ‘आई रोबोट’ या ‘एक्स मशीना’ फिल्म देखी होगी उन्हें कुछ भान होगा कि कृत्रिम बुद्धि कैसे-कैसे गुल खिला सकती है। जहां ‘आई रोबोट’ का रोबोट कोई नुकसान नहीं करता वह
22 जून 2026 को पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत की एक आतंकवाद विरोधी अदालत ने बलूच कार्यकर्ता डा.
इस वर्ष के लिए ब्रिक्स की कमान भारत के हाथों में है। और इसी वर्ष भारत सरकार अमेरिकापरस्ती के नये-नये रिकार्ड कायम कर रही है। ब्रिक्स रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व
1960 में तेल उत्पादक देशों ने ओपेक का गठन किया था। ईरान, इराक, कुवैत, साऊदी अरब और वेनेजुएला इसके संस्थापक देश थे। अबुधाबी 1967 में इसका सदस्य बना। 1971 में यूएई के रूप म
एक बात निश्चित है कि इस युद्ध के दौरान ईरान पश्चिम एशिया में एक मजबूत बड़ी शक्ति के बतौर उभरा है। इसके हाथ में होरमुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण आना एक बड़ा हथियार है। उसने इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया है। इसने अमरीकी साम्राज्यवादियों की दादागिरी को चुनौती दी है। और इस चुनौती में होरमुज के हथियारीकरण की अहम भूमिका है। यह आणविक बम से भी अधिक कारगर भूमिका निभा रहा है।
नेपाल में बहुप्रतीक्षित चुनाव सम्पन्न हो गये। चुनाव में 4 वर्ष पूर्व बनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को भारी बहुमत से जीत हासिल हुई। 165 सीटों पर हुए प्रत्यक्ष चुनाव
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।