बाल शिक्षा और बाल मजदूर

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बरेली शहर में बाल शिक्षा पर विशेष ध्यान देने के लिए बरेली बी.एस.ए. ने सभी स्कूलों में नये सत्र में 5-5 नये बच्चों के नामांकन कराने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी है। स्कूलों का हाल यह है कि प्राथमिक विद्यालयों में दाखिला लिए बच्चे तय समय पर विद्यालय पहुंच रहे हैं लेकिन शिक्षकों के देरी से आने पर बच्चे खुद ही प्रार्थना शुरू कर देते हैं। यह हाल रोजाना का है कि शिक्षक, बच्चों व सफाईकर्मी आदि लोगों से सुबह 7ः30 बजे आने को कहते हैं पर खुद 9 बजे आते हैं। जिसके कारण बच्चे व सफाईकर्मी दोनों परेशान हैं। ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय के शौचालय के ताले तक नहीं खुलते। 
    
शिक्षक संघ के पदाधिकारी का कहना है कि नामांकन के लिए शिक्षक घर-घर जाकर परिजनों को जागरूक कर रहे हैं। शिक्षकों को पढ़ाई के साथ-साथ कई अन्य कार्य भी करने पड़ते हैं। शिक्षकों की ओर से लगातार नामांकन बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। 
    
दरअसल नये बच्चों के नामांकन न कराने व अध्यापकों का उनके प्रति गम्भीर न होने के पीछे कई अन्य कारण भी हैं। कि विद्यालयों में बच्चों को भेजना बच्चों के मां-बाप भी चाहते हैं लेकिन जिस तरह का माहौल आज समाज और सरकारी विद्यालयों का है उसको देखकर अभिभावक बच्चों को पढ़ाने के बजाय उनसे अन्य घरेलू काम कराना या उनसे बाल मजदूरी कराने को मजबूर हैं। विद्यालयों में न तो बच्चों की पढ़ाई के प्रति शिक्षा विभाग इतना गंभीर है और न ही सरकार। अगर होते तो विद्यालयों में बच्चों के बैठने, साफ-सफाई और शिक्षा की गुणवत्ता और उचित स्कूल-स्टाफ उपलब्ध होता, बच्चों की शिक्षा के प्रति शिक्षकों व सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित होती। सरकार की इन बच्चां के भविष्य के प्रति उदासीनता दिखाती है कि सरकार इनको पढ़ाना ही नहीं चाहती। 
    
सरकार जानती है कि जिस तरह के नौजवान उसे इस पूंजीवादी व्यवस्था के अनुसार चाहिए वह उसे मिल जा रहे हैं। थोड़े पढ़े हुए, थोड़े अनुभवी तथा थोड़े व्यावसायिक कोर्स करे हुए मजदूर। जो अपने अधिकारों की मांग न कर सकें, वह अपने अधिकार न जान जायें, अधिकार जान जायेंगे तो उनकी मांग करेंगे। 
    
ऐसे में बाल मजदूरों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है क्योंकि जिस तरह सरकार की नीतियां निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की हैं उसमें पढ़ने के बाद स्थायी नौकरी तो मिलना संभव है नहीं और बढ़ती महंगाई से परिवार का खर्च उठाना परिवार के एक या दो लोगों के काम करने से संभव है नहीं। ऐसे में बाल मजदूरों का नौकरी की तरफ जाना और मालिकों का सस्ते श्रम के रूप में इसका फायदा उठाना चलता रहता है। बाल मजदूरों से 2-3 हजार रुपये में 10-12 घंटे काम कराना आज की पूंजीवादी व्यवस्था का घृणित अपराध है।                 -उमेश, बरेली 

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।