9 जुलाई : आम हड़ताल को सफल बनाओ

/9-july-aam-strike-ko-safal-banaao

मजदूर वर्ग आबादी में भारत का सबसे बड़ा वर्ग है। पर भारत की राजनीति में इसके मुद्दे इसकी मांगें इसकी भारी आबादी के सापेक्ष कहीं नजर नहीं आते। धर्म-जाति-क्षेत्र के मुद्दे कहीं अधिक छाये हुए नजर आते हैं। केवल जब किसी देशव्यापी आम हड़ताल का आह्वान होता है तब ही देश के हर कोने में सड़कों पर मजदूरों का हुजूम-मजदूरों के नारे यह अहसास कराते हैं कि मजदूर वर्ग ही देश का सबसे बड़ा वर्ग है। मजदूर वर्ग जब जाति-धर्म-क्षेत्र के विभाजनों को भूल कर एक वर्ग के बतौर सड़कों पर उतरता है तो वह अपने संख्या बल से अपनी एकता से इस सच्चाई को कुछ-कुछ महसूस करने लगता है, कि वही इतिहास का सबसे क्रांतिकारी वर्ग है कि वह अपनी पर आ जाये तो सारी दुनिया को उलट कर रख सकता है। 
    
9 जुलाई को मजदूरों की देश व्यापी आम हड़ताल का आह्वान किया गया है। हड़ताल का आह्वान केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों ने किया है। पहले इन्होंने 20 मई को इस हड़ताल की घोषणा की थी। पर पहलगाम की घटना के बाद सरकार ने अंधराष्ट्रवाद का जो गर्दो गुबार खड़ा किया, उससे ये फेडरेशनें भयभीत हो गयीं। इन्हें अपने आह्वान पर, मजदूर वर्ग पर भरोसा ही न रहा। इससे कहीं अधिक इन फेडरेशनों को युद्धोन्मादी माहौल में मजदूरों की मांगें छोड़ शासकों के सुर में सुर मिलाना अधिक जरूरी लगा। अपने व्यवहार से इन्होंने जाहिर कर दिया कि ये व्यवस्थापरस्त हैं और मजदूर वर्ग की मांगें तो वे महज मजदूर वर्ग को व्यवस्था की चौहद्दी में बांधे रखने, मजदूरों के आक्रोश पर छींटें डालने के लिए उठाती हैं। अन्यथा अगर ये मजदूर वर्ग की वास्तविक प्रतिनिधि होतीं तो 20 मई की हड़ताल को जोर-शोर से करने के साथ सरकार के द्वारा कायम युद्धोन्मादी माहौल, अंधराष्ट्रवाद को भी आड़े हाथों लेती। शासकों को बता देतीं कि भारत-पाक के मजदूर-मेहनतकश एक-दूसरे के दुश्मन नहीं मित्र हैं और शासकों द्वारा बोयी आतंकवाद की फसल को मेहनतकशों की हत्या करने वाले युद्ध की ओर मजदूर वर्ग नहीं बढ़ने देगा। पर ऐसा आह्वान मजदूर वर्ग का क्रांतिकारी नेतृत्व ही कर सकता था मौजूदा पूंजीवादी-अवसरवादी-सुधारवादी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनें नहीं। 
    
अब फिर 9 जुलाई को लेकर मजदूर वर्ग में सरगर्मी बढ़ गयी है। देश में क्या तो सरकारी सेक्टर, प्राइवेट सेक्टर से लेकर गिग मजदूर तक सभी मौजूदा शासन-सत्ता द्वारा शोषण-लूट के बढ़ते शिकंजे से हैरान-परेशान हैं। संगठित-असंगठित सभी तरह के मजदूरों का जीवन स्तर गिर रहा है और पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ रहा है। ये सभी मजदूर अपने हालातों को बदलने के लिए लड़ना चाहते हैं। 
    
पर संघ-भाजपा की फासीवादी सत्ता और उसके लम्पट संगठन, पूंजीवादी दल मजदूर वर्ग को अपने हालात बदलने की लड़ाई से रोकना चाहते हैं। इसीलिए वे मजदूरों को धर्म-जाति के नाम पर गोलबंद कर आपस में लड़ाने की साजिश करते हैं। उन्हें साम्प्रदायिक मुद्दों-कूपमण्डूकता में उलझाये रखना चाहते हैं। इस काम में बी एम एस सरीखे संघी मजदूर संगठन ही नहीं बाकी ट्रेड यूनियन फेडरेशनें भी लिप्त रहती हैं। 
    
परिणाम यह होता है कि जाति-धर्म में बंटे, आपस में एक-दूसरे से उलझते मजदूर वर्ग के सदस्य अपनी ताकत अपने क्रांतिकारी लक्ष्य से एकदम दूर होते जाते हैं। वे अपने जीवन की दुर्दशा को भाग्य का खेल या अपनी नियति मान बैठते हैं। स्थानीय फैक्टरी स्तर के संघर्ष उनमें कुछ उत्साह तो भरते हैं पर इन संघर्षों में भी कुछ खास सफलता न मिलती देख वे संघर्षों से भी उदासीन होने लगते हैं। वे यह नहीं देख पाते कि दरअसल पूंजीपति वर्ग- शासक वर्ग यही चाहता है कि मजदूर लड़ने का इरादा-माद्दा खो दें। वे आपस में लड़ें पर एकजुट होकर शासकों से न लड़ें। 
    
पर मुनाफे की हवस से वशीभूत होकर पूंजीपति वर्ग-शासक वर्ग इतने भर से शांत नहीं रहता। वह मजदूरों का गला और रेतने के षड्यंत्र करता है और इसके ये षड्यंत्र मजदूरों को फिर से एकजुट होने और लड़ने को मजबूर करते हैं। आज भारत में मजदूर वर्ग शासकों के इसी हमले के प्रतिकार में लड़ रहा है। 
    
ऐेसे में 9 जुलाई की आम हड़ताल को रस्मी सालाना आयोजन बनाने में जुटी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों की चाहत से मजदूर वर्ग को सचेत रहना होगा। उनकी ऐसे आयोजनों से मजदूरों के गुस्से को व्यवस्था की चौहद्दी में समेटने की मंशा से भी सचेत रहने की जरूरत है। जरूरत है कि 9 जुलाई की हड़ताल में मजदूरों की व्यापक भागीदारी से इसे रस्मी आयोजन से वास्तविक वर्ग संघर्ष में बदल दिया जाये। 
    
9 जुलाई की हड़ताल की धमक ऐसी होनी चाहिए कि न केवल शासक वर्ग इससे सहम जाये बल्कि मजदूर वर्ग भी अपनी संगठित ताकत की क्षमता के प्रति सचेत हो जाये। वह देश के सबसे बड़े-सबसे क्रांतिकारी वर्ग होने के बोध की ओर बढ़ चले। जितनी जल्दी वह इस अहसास पर पहुंचेगा उतनी ही जल्दी वह लूट के साम्राज्य को ध्वस्त करने, अपना राज कायम करने की ओर बढ़ेगा। मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी संगठनों का फर्ज है कि वे इस हड़ताल के मौके पर अपने वर्ग को उसकी क्रांतिकारी संभावनाओं-ऐतिहासिक मिशन से परिचित करायें। इस हड़ताल को सफल बनाने में जी-जान लगा दें। 
    
पूंजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करने वाली समाजवादी क्रांति करना और फिर वर्ग विहीन समाज की ओर बढ़ना मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक मिशन है। इस मिशन को वर्गीय एकता के दम पर और बाकी मेहनतकश वर्गों को साथ लेकर ही मजदूर वर्ग अंजाम देगा। मजदूर वर्ग इस दिशा में बढ़ सके इसके लिए जरूरी है कि वो अपनी ताकत, क्रांतिकारी संभावनाओं से परिचित हो। 9 जुलाई की हड़ताल को सफल बनाकर मजदूर वर्ग अपनी ताकत का अहसास कर सकते हैं। आगे और व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ सकते हैं।   

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि