शंघाई सहयोग संगठन की बैठक
शंघाई सहयोग संगठन (एस सी ओ) की बैठक 26 जून को चीन के किंगदाओ शहर में संपन्न हुई। इस बार रक्षा मंत्रियों के सम्मेलन के रूप में हुई इस बैठक में भारत की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भागीदारी की।
इस बैठक में जो साझा बयान तैयार किया गया उसमें आतंकवाद के मुद्दे पर पहलगाम की आतंकी घटना को दर्ज कराने में भारत असफल रहा। जबकि पाकिस्तान बलूचिस्तान के मुद्दे, जिसमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बी एल ए) द्वारा जाफर एक्सप्रेस को हाईजैक कर लिया गया था और जिसमें बी एल ए के 33 सदस्यों समेत कुल 64 लोग मारे गये थे, को मानवीय त्रासदी की घटना के रूप में दर्ज कराने में सफल हो गया। गौरतलब है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान की घटना के पीछे भारत का हाथ बताता है। इस तरह शंघाई सहयोग संगठन की इस बैठक में पाकिस्तान परोक्ष रूप से भारत पर हमला करने में सफल रहा। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विरोध स्वरूप इस साझा बयान पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया और इस कारण शंघाई सहयोग संगठन की यह बैठक कोई संयुक्त वक्तव्य जारी करने में असफल रही।
शंघाई सहयोग संगठन में रूस, कजाकिस्तान, किर्गीजस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान, बेलारूस, भारत, पाकिस्तान, ईरान और चीन, कुल मिलाकर 10 सदस्य हैं। इसके अलावा अफगानिस्तान और मंगोलिया इसके पर्यवेक्षक सदस्य एवं नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश इत्यादि कई देश बातचीत हेतु भागीदार के रूप में बैठक में शामिल थे। लेकिन किसी ने भी भारत के साथ अपनी पक्षधरता नहीं प्रदर्शित की, और भारत बैठक में अलग-थलग पड़ गया।
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुई आतंकी घटना में 26 पर्यटकों की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद बने तनावपूर्ण हालातों ने भारत और पाकिस्तान के मध्य जंग का रूप अख्तियार कर लिया था और दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमले शुरू कर दिये थे, जिसकी पहल आपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने की थी। हालांकि, इस सीमित युद्ध के चार दिन बाद युद्ध विराम हो गया था। लेकिन, इस युद्ध विराम की घोषणा अमेरिका से ट्रंप द्वारा किये जाने ने देश-दुनिया में मोदी सरकार की बहुत छिछालेदारी की थी। इस युद्ध के दौरान भी भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था और सिर्फ दो देश, अफगानिस्तान और इजराइल ही भारत के साथ खड़े नजर आये थे। दरअसल मोदी सरकार पहलगाम की आतंकी घटना के पीछे पाकिस्तान के हाथ के आरोप को सुबूतों के साथ साबित कर ही नहीं पाई थी और उसके केवल आरोपों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता नहीं मिली।
मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत के दक्षिण एशिया के देशों से भी संबंध लगातार खराब होते चले गये हैं और इस क्षेत्र में चीनी साम्राज्यवादी अपने पैर पसार चुके हैं। ऐसे में दक्षिण एशिया में भी भारत अलग-थलग पड़ता जा रहा है।
अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक ‘अखंड भारत’ कायम करने का साम्राज्यवादी मंसूबा पाले हिंदू फ़ासीवादियों की विदेश नीति तमाम मौकों पर दिवालिया साबित हो रही है। शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भी यही नजर आया।