ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भांति-भांति के कयास लगाए जा रहे हैं कि आखिर अमेरिका ने यह हमला क्यों किया? यह कयास इसलिए भी हैं कि वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया भर में युद्ध रुकवाने के वादे के साथ ही सत्ता में आए थे। उनके समर्थकों और मतदाताओं में एक बड़ी तादात उन लोगों की है जो अन्य देशों में अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप के खिलाफ हैं।
इन कयासों में सबसे पहला और सबसे आसान यह है कि अमेरिका ने ईरान पर यह हमला इजरायल की सहायता में किया। जब इजराइल ने बिना किसी उकसावे के ईरान पर हमला किया तो उसने उम्मीद की थी कि ईरान इतना कमजोर हो जाएगा कि पलट कर जवाब नहीं दे पाएगा। लेकिन ईरान ने पलट कर जवाब दिया और करारा जवाब दिया। ऐसे में इजरायल ने अमेरिका से बचाव की गुहार लगाई और अमेरिका इजरायल को बचाने के लिए मैदान में आ गया। आखिर अमेरिका मध्य एशिया में अपने सहयोगी इजराइल को छोड़ तो नहीं सकता था।
दूसरा कयास यह है कि अमेरिका के भीतर की इजराइली या यहूदी लाबी ने अमेरिका को इधर की ओर धकेला। इसके अनुसार यह लाबी इतनी ताकतवर है कि अमेरिका में कोई पार्टी या नेता इसके खिलाफ नहीं जा सकता। यह लाबी मध्य एशिया में अमेरिका की सारी रणनीति को इजराइल के हिसाब से तय करवाती है। इजरायल चाहता है कि ईरान इतना कमजोर हो जाए कि इजरायल के लिए कोई खतरा पेश न कर सके। इसीलिए इजराइल ने ईरान पर हमला किया और फिर अमेरिका की इजरायली लाबी ने अमेरिका को भी इस जंग में घसीट लिया। ट्रंप न चाहते हुए भी इस जंग में शामिल हो गए।
तीसरा कयास तथाकथित ‘डीप स्टेट’ यानी छिपी हुई सत्ता से संबंधित है। इसके अनुसार खुफिया एजेंसियां, सेना और सैन्य-उद्योग प्रतिष्ठान चाहता है कि अमेरिका लगातार युद्ध में उलझा रहे। इससे इनका अपना धंधा चलता रहता है। असल में ये ही अमेरिका की विदेश नीति तय करते हैं। यह नहीं चाहते कि दुनिया में शांति हो। चुनाव के जरिए सत्ता में कोई भी आए, असल में युद्ध व शांति का फैसला ये ही करते हैं। इन्होंने ओबामा और ट्रंप दोनों को ही उनके न चाहते हुए भी जंग की ओर धकेला। इन्होंने ही ट्रंप को ईरान पर हमला करने के लिए मजबूर किया।
एक अन्य कयास निहायत व्यक्तिगत है। वह यह है कि इजरायली खुफिया एजेंसी के पास ट्रंप के व्यभिचार के कुछ ठोस सबूत मौजूद हैं और वह ट्रंप को ब्लैकमेल कर रही है। मजबूरन ट्रंप को ईरान पर हमला करना पड़ा।
जहां तक स्वयं ट्रंप के अपने पक्ष का सवाल है, उसका कहना है कि उसने ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए हमला किया। इजराइल ने भी ईरान पर हमला करते हुए यही दावा किया था। इन दोनों ही दावों में दुनिया के दादा और उसके गुर्गे का स्वर स्वतः स्पष्ट है।
उपरोक्त कयासों और दावों में कोई दम नहीं है। या थोड़ी छूट देकर कहा जाए तो उनमें सच्चाई के कुछ कण हैं। असल बात कुछ और है।
आज सारी दुनिया एकीकृत है और इसीलिए इसमें हो रही किसी जंग को दुनिया भर के व्यापक समीकरणों के तहत ही समझा जा सकता है। और जो जंग एक बड़े क्षेत्र को प्रभावित करते हुए सारी दुनिया पर असर डालती हो, उसके बारे में यह और जरूरी हो जाता है।
यूक्रेन की जंग की तरह मध्य एशिया की जंग के भी व्यापक निहितार्थ हैं और दोनों ही जगह पर्दे के आगे-पीछे वे ही वैश्विक शक्तियां मुख्य खिलाड़ी हैं।
पहले यूक्रेन को लें। ऊपरी तौर पर यह यूक्रेन और रूस के बीच जंग है। फरवरी, 2022 में रूस ने बिना किसी उकसावे के यूक्रेन पर यह हमला किया और तब से युद्ध चल रहा है। रूसी हमले के खिलाफ नाटो के देश यानी पश्चिमी यूरोप और अमेरिका यूक्रेन के साथ आ गए और इसीलिए युद्ध चलता ही जा रहा है। कम से कम पश्चिमी साम्राज्यवादी, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादी यूक्रेन युद्ध को इसी तरह पेश करते हैं।
असल बात इससे जुदा है। यह सही है कि रूस ने यूक्रेन पर हमला किया। पर उसने बिना किसी उकसावे के यह हमला नहीं किया। यह उकसावा 2015 से ही चल रहा था। उकसावे की यह कार्यवाही पश्चिमी साम्राज्यवादियों की ओर से थी- अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में। वे पुतिन के नेतृत्व में उभर कर सामने आये रूसी साम्राज्यवादियों को घेर कर सीमित करना चाहते थे। इसके लिए वे नाटो के झंडे तले अपनी सेनाओं को रूसी सीमा पर तैनात करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने यूक्रेन को नाटो में शामिल करने की योजना बनाई। इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने 2014 में एक तरह से तख्ता पलट करवाया और रूस समर्थक राष्ट्रपति को हटाकर अपनी कठपुतली को सत्ता में बैठाया। तत्कालीन जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने खुलेआम स्वीकार किया कि 2016 का रूस और यूरोपीय समुदाय के बीच समझौता रूस को झांसा देने के लिए था ताकि रूस से जंग की तैयारी की जा सके।
इसीलिए रूस ने यूक्रेन पर भले हमला किया हो, पर हमले की जिम्मेदारी जितनी रूसी साम्राज्यवादियों पर है उतनी ही पश्चिमी साम्राज्यवादियों पर भी, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों पर। असल में इस जंग की सारी परियोजना अमेरिकी साम्राज्यवादियों की है। यूरोपीय साम्राज्यवादी आज इतने कमजोर हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादी आसानी से उन्हें अपने लिए इस्तेमाल कर ले रहे हैं।
इस तरह यूक्रेन की जंग असल में पश्चिमी साम्राज्यवादियों और रूसी साम्राज्यवादियों की जंग है। चीनी साम्राज्यवादी इसमें परोक्ष रूप से शामिल हैं, रूसियों के साथ। यूक्रेनी सैनिक एक तरह से भाड़े के सैनिक हैं जो पश्चिमी साम्राज्यवादियों के लिए लड़ रहे हैं हालांकि मनोगत तौर पर वह अपने देश के लिए लड़ रहे हैं।
इसी रोशनी में ही हाल में यूक्रेन द्वारा ड्रोन के जरिए रूसी लड़ाकू विमान नष्ट करने की कार्रवाई को समझा जा सकता है। असल में यह कार्यवाही अमेरिकी खुफिया एजेंसी और सेना की थी। यूक्रेन का तो बस नाम भर था।
पश्चिम एशिया में इस समय जो कुछ हो रहा है, उसे भी इसी तरह समझा जा सकता है। यहां भी असल में पश्चिमी साम्राज्यवादी और रूसी-चीनी साम्राज्यवादी आपस में संघर्षरत हैं। असल खेल इन्हीं का है।
बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि इजरायल द्वारा गाजा में जो नरसंहार किया जा रहा है उसके लिए हथियार केवल अमेरिकी साम्राज्यवादी नहीं दे रहे हैं। फ्रांसीसी, जर्मन और ब्रिटिश साम्राज्यवादी भी यह हथियार दे रहे हैं। फर्क बस इतना है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी नंगे रूप में गाजा में नरसंहार का समर्थन करते हैं जबकि यूरोपीय साम्राज्यवादी इस पर लीपा पोती करते हैं। यह भी याद रखना होगा कि ईरान पर इजरायली हमले को जर्मन चांसलर ने यह कह कर जायज ठहराया कि इजराइल दुनिया के हित में ‘गंदा काम’ कर रहा है।
यानी गाजा और ईरान पर इजरायली-अमेरिकी हमले में यूरोपीय साम्राज्यवादी इजरायल-अमेरिका के साथ हैं। लेकिन बात केवल इतनी नहीं है। इजरायल ईरान की तरह कोई स्वतंत्र ताकत नहीं है। वह पश्चिमी साम्राज्यवादियों की पैदाइश है और उसका अस्तित्व उन्हीं पर टिका है। असल में वह पश्चिम एशिया में उनका लठैत है। पश्चिमी साम्राज्यवादियों के हाथ खींचते ही उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
इजरायल द्वारा गाजा में नरसंहार और फिर ईरान पर हमला असल में पश्चिमी साम्राज्यवादियों, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का ‘गंदा काम’ है। वे अभी अपनी हथियारों की आपूर्ति रोक दें तो वह ‘गंदा काम’ बंद हो जाएगा।
पश्चिमी साम्राज्यवादी इस ‘गंदे काम’ के जरिए क्या चाहते हैं? वे दो चीज चाहते हैं। एक तो उनके लठैत इजरायल के लिए पूरा पश्चिम एशिया सुरक्षित हो जाए और वह पूरे फिलिस्तीन पर कब्जा कर ले। दूसरा, इस क्षेत्र से रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों का पूरा प्रभाव खत्म हो जाए। वे तेल और गैस से भरपूर तथा रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस क्षेत्र से इन दोनों साम्राज्यवादी शक्तियों को खदेड़ना चाहते हैं। दोनों उद्देश्य आपस में मिले हुए भी हैं क्योंकि इजराइल पश्चिम एशिया में रूस-चीन का लठैत नहीं है।
वर्तमान गाजा नरसंहार और ईरान पर हमले के बीज चार साल पहले ही पड़ गए थे जब चीन की मध्यस्थता में ईरान व सऊदी अरब के बीच समझौता हुआ था। तब इसे चीन की कूटनीतिक सफलता और पश्चिम एशिया में उसकी घुसपैठ के रूप में रेखांकित किया गया था।
जहां तक रूस की बात है, वह सीरिया और ईरान के साथ अपने संबंधों के जरिए पहले से ही इस क्षेत्र में जमा हुआ था। जब पश्चिमी साम्राज्यवादियों और उनके पश्चिम एशिया के सहयोगी देशों (तुर्की, सऊदी अरब, कतर, इत्यादि) ने सीरिया में असद सरकार को उखाड़ने की कोशिश की तो रूस ने खुलकर वहां सैनिक हस्तक्षेप किया। उसी वजह से असद अगले 13 साल तक सत्ता में बने रहे। अब सीरिया पर कब्जे के बाद पश्चिमी साम्राज्यवादी ईरान की ओर रुख कर चुके हैं।
इस तरह पश्चिम एशिया के स्थानीय मुद्दों (इजराइल-फिलिस्तीन, इजरायल-ईरान, ईरान-सऊदी अरब, ईरान-तुर्की, इत्यादि) के साथ और उनके ऊपर ज्यादा बड़ा मुद्दा उस क्षेत्र में साम्राज्यवादियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई है। एक ओर हैं पश्चिमी साम्राज्यवादी और दूसरी ओर हैं रूसी-चीनी साम्राज्यवादी। पहले इजराइल को हमले के लिए उकसाकर और फिर स्वयं युद्ध में उतरकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने वर्चस्व की इस लड़ाई को नए स्तर पर पहुंचा दिया। सीरिया में सफलता से उनके मुंह में जो खून लगा था उसने उनकी खून की प्यास बढ़ा दी है।
ज्यादा व्यापक स्तर पर देखें तो यह वैश्विक स्तर पर एक ओर पश्चिमी साम्राज्यवादियों (जिसमें पूरब में जापानी साम्राज्यवादी भी शामिल हैं) तथा दूसरी ओर रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के बीच वर्चस्व की जंग का बस एक मैदान भर है। इस वर्चस्व की जंग में प्रमुख खिलाड़ी अमेरिकी साम्राज्यवादी और चीनी साम्राज्यवादी हैं। और यही मामले को ज्यादा खतरनाक बना देता है क्योंकि शताब्दी भर के अपने वर्चस्व के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों को एक नई उभरती हुई बड़ी ताकत चुनौती देती हुई दिख रही है। इस नई ताकत से निपटने में अमेरिकी साम्राज्यवादी बदहवास हो रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के पागलपन को अमेरिकी साम्राज्यवादियों की बदहवासी का मूर्त रूप भी समझा जा सकता है।
फिलहाल चीनी साम्राज्यवादियों ने ‘शांतिपूर्ण उभार’ का फैसला कर रखा है। यानी दुनिया भर में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए वे फिलहाल आर्थिक तरीके ही अपनाना चाहते हैं। वे जंग में नहीं उतरना चाहते। लेकिन जब साम्राज्यवादी, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादी सैनिक तौर-तरीके आजमा रहे हों तो चीनी साम्राज्यवादी इससे कब तक बच सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है कि वह सीधे जंग में न उतरें और हथियारों की आपूर्ति तक खुद को सीमित रखें। हालिया भारत-पाक झड़प में उन्होंने यही किया था। लेकिन इस जमाने में जब जंग में सैनिक और असैनिक हथियारों की सीमा रेखा धुंधली हो गई हो, तो यह कब तक चल सकता है? जिसे ‘साइबर युद्ध’ कहा जा रहा है, क्या चीन उससे बच सकता है? और नहीं बचेगा तो क्या करेगा?
इन्हीं व्यापक वैश्विक समीकरणों के तहत ही क्षेत्रीय तनावों और संघर्षों को समझा जा सकता है और फिर उनके भीतर व्यक्तियों की भूमिका, लाबी, ‘डीप स्टेट’ इत्यादि को भी। हो सकता है कि बेंजामिन नेतन्याहू जैसा भ्रष्ट नेता जेल जाने से बचने के लिए गाजा और ईरान पर हमला कर रहा हो। पर हमले को इसी तक सीमित कर नहीं समझा जा सकता। तब नहीं समझा जा सकता कि क्यों जर्मन साम्राज्यवादी इस हमले को जायज ठहरा रहे हैं और उसके लिए हथियार दे रहे हैं। वहां तो ‘यहूदी लाबी’ भी नहीं है। तभी ट्रंप के पागलपन को भी समझा जा सकता है जो एक दिन कुछ कहता है और दूसरे दिन कुछ और करता है। उसके व्यभिचार के किस्सों से यह नहीं समझा जा सकता कि क्यों ज्यादातर अमेरिकी नेता और व्यवसाई ईरान पर हमले के पक्षधर हैं, भले ही अधिकांश अमेरिकी जनता उसके खिलाफ हो। ‘डीप स्टेट’ भी कुछ स्पष्ट नहीं करता है बशर्ते उसे अमेरिकी साम्राज्यवादियों की सघन अभिव्यक्ति न समझा जाए? ‘सैन्य-उद्योग प्रतिष्ठान’ से बाहर कितने बड़े अमेरिकी पूंजीपति बचेंगे?
इन्हीं सब वजहों से ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का हमला व्यापक निहितार्थ ग्रहण कर लेता है। इस व्यापक निहितार्थ को संज्ञान में लेकर ही इस तरह के हमले का सही विरोध किया जा सकता है। केवल शांति की अपील या अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन, इत्यादि का कोई मतलब नहीं है। संघर्ष की धार साम्राज्यवादियों के घृणित कारनामों के खिलाफ होनी चाहिए।