भांति-भांति के मैकालेपुत्र

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मैकालेपुत्र शब्द हिन्दू फासीवादियों का प्रिय शब्द है। वे अक्सर ही इसका इस्तेमाल करते रहते हैं, खासकर अपने विरोधी उदारवादियों के लिए। अभी हाल ही में संघी प्रधानमंत्री ने एक बार फिर मैकाले का जिक्र करते हुए लोगों का आह्वान किया कि वे औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त हों। 
    
विडंबना यह है कि हिन्दू फासीवादी स्वयं सबसे खराब किस्म के मैकालेपुत्र हैं। कहा जा सकता  है कि वे मैकाले के जारज पुत्र अथवा अवैध संतान हैं। 
    
उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव रखते हुए मैकाले ने अपना लक्ष्य यह रखा था कि भारत में अंग्रेजी शिक्षाप्राप्त लोगों की एक ऐसी कतार तैयार हो जो रंग से भूरी हो पर मानसिकता में गोरी हो। ऐसी कतार भारत में अंग्रेजी राज को चलाने में भारतीय जनता और ब्रिटिश शासकों के बीच एक मध्य स्तर का काम करेगी। ये ही सरकारी मशीनरी के ज्यादातर कारकून होंगे तथा इन्हीं में से भारत में ब्रिटिश राज को जायज ठहराने वाले बुद्धिजीवी भी आयेंगे। ये लोग भारत के अतीत और वर्तमान के प्रति हिकारत का भाव रखेंगे तथा अंग्र्रेजों और ब्रिटेन के प्रति आदर्श और श्रद्धा का भाव। इसे ही औपनिवेशिक मानसिकता भी कहा गया- बाद में। 
    
कहना होगा कि मैकाले अपने मिशन में सफल रहा, पर केवल उसी रूप में नहीं जैसा उसने चाहा था। समय के साथ भांति-भांति के मैकालेपुत्र पैदा हो गये। यानी भारत में अंग्रेजी औपनिवेशिक शिक्षा ने भांति-भांति की प्रवृत्ति वाले लोगों को जन्म दिया। इन्हें तीन किस्म की व्यापक श्रेणियों में रखा जा सकता है। 
    
पहली श्रेणी बिल्कुल उसी किस्म के लोगों की थी जैसा कि मैकाले ने चाहा था। अंग्रेजी राज के दौरान सिविल सेवा के अफसर तथा सरकारी मशीनरी के बाबू ज्यादातर इसी किस्म के लोग थे। इसमें सेना और पुलिस के अफसरों-जवानों को भी रखा जाना चाहिए। आजादी के बाद भी इन जगहों पर इसी किस्म के लोगों की भरमार बनी रही। नौकरशाही तथा सेना में भारतीय राजसत्ता द्वारा इसे जान-बूझकर रखा गया। 
    
दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जिन्होंने अंग्रेजी शिक्षा पाने के बाद भारत के अतीत-वर्तमान तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक, सत्ता को एक नयी नजर से देखने का प्रयास किया। इसमें ब्रिटेन के ज्ञान-विज्ञान के प्रति श्रद्धा व प्रशंसा का भाव तो था पर उस पर सवाल भी थे। इसी तरह भारत के अतीत व वर्तमान पर सवाल तो थे पर इनके प्रति एक लगाव भी था। इस श्रेणी का स्वयं एक व्यापक वर्णक्रम था- एक ओर थे राजा राम मोहन राय तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर (ब्रह्म समाज) तो दूसरी ओर थे महात्मा गांधी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा जवाहर लाल नेहरू जैसे लोग कहीं बीच में आते थे। इन्हीं किस्म के लोगों से भारत की आजादी की लड़ाई का प्रमुख स्वर बना। 
    
आगे बढ़ने से पहले एक छोटी सी अन्य धारा का जिक्र करना जरूरी है। यह धारा पैदा तो दूसरी श्रेणी में ही हुई पर इसने जल्दी ही इसकी सीमाओं का अतिक्रमण कर दिया। यह धारा थी- मार्क्सवादियों और कम्युनिस्टों की। इसने भारत के अतीत-वर्तमान तथा उपनिवेशवाद- साम्राज्यवाद को देखने का एकदम अलग ही नजरिया अपनाया। आजादी के आंदोलन पर इसकी गहरी छाप पड़ी, बावजूद इसके कि वह उसकी नेतृत्वकारी शक्ति नहीं बन पाई। 
    
तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जिनमें आज हिन्दू फासीवादी प्रमुख हैं पर जिसमें आर्य समाजी तथा हिन्दू महासभा वाले भी आते हैं। यह श्रेणी उन लोगों की है जिन्हें मैकाले की अवैध संतान कहा जा सकता है। अवैध संतान इसलिए कि इनकी चिंतन की धारा मैकाले की ही है। बस इसमें भारत का अतीत सर्वश्रेष्ठ है और वर्तमान पश्चिम एकदम पतित। और भारत के अतीत की सर्वश्रेष्ठता का दावा ठीक उन्हीं खोजों के आधार पर किया जाता है जिन्हें पश्चिमी विद्वानों ने अंजाम दिया। 
    
हिन्दू फासीवादी स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हामी बताते हैं तथा भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना उनका लक्ष्य है। उनका अखण्ड भारत अफगानिस्तान से लेकर इंडोनेशिया तक फैला होगा। इनकी इस सोच तथा लक्ष्य का प्रत्येक तत्व पश्चिमी सोच से आता है जिसका भारत के वास्तविक अतीत से कोई लेना-देना नहीं है। 
    
प्राचीन भारत के संपूर्ण साहित्य में- चाहे वह धार्मिक हो, पौराणिक हो अथवा अन्य किस्म का- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसा शब्द नहीं मिलेगा। न ही कभी इस बात का जिक्र मिलेगा कि ‘भारतीय राष्ट्र’ कभी अफगानिस्तान से लेकर इंडोनेशिया तक फैला था। भारत के किसी भी राजा ने इतने बड़े भू-भाग पर कभी शासन नहीं किया। हां, अलग-अलग राजा अलग-अलग समयों पर इसके इस या उस हिस्से पर शासन करते रहे। जैसे आजादी पूर्व भारत के पश्चिमी हिस्से (आज का पाकिस्तान) को इस आधार पर यूनान, ईरान या सऊदी अरब का हिस्सा नहीं माना जा सकता कि इतिहास में कभी इस हिस्से पर यहां के शासकों का शासन रहा, उसी तरह अफगानिस्तान, बर्मा, थाईलैण्ड, कम्पूचिया या इंडोनेशिया को भारत का हिस्सा नहीं माना जा सकता। 
    
राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद दोनों शब्दों की उत्पत्ति उसी पश्चिम में हुई जिससे हिन्दू फासीवादी इतनी नफरत करते हैं। इन्होंने भी ये शब्द और उनकी धारणा उन्हीं से उधार ली। स्वयं पश्चिम में राष्ट्रवाद का जन्म फ्रांसीसी क्रांति के दौरान हुआ- क्रांति विरोधी बाहरी शक्तियों से लड़ते हुए। स्वयं राष्ट्र का जन्म पश्चिम में पूंजीवाद के पैदा होने के साथ हुआ और कालांतर में इसकी वैचारिक अभिव्यक्ति राष्ट्रवाद भी पैदा हुआ। उन्नीसवीं सदी में राष्ट्रवाद ने जोर पकड़ा। जहां तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संबंध है, एक नारे के तौर पर इसने आस्ट्रो-हंगेरियाई साम्राज्य के तहत अपनी जगह पाई- एक बहुराष्ट्रीय साम्राज्य को बचाने के प्रयास में। जो लोग इस साम्राज्य की उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं को सांस्कृतिक स्वायत्तता देकर साम्राज्य को बचाना चाहते थे, उन्होंने इस नारे को उछाला था। 
    
हिन्दू फासीवादियों ने अपने सपनों का एक नया साम्राज्य बनाने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लपक लिया। उन्होंने दावा किया कि अफगानिस्तान से लेकर इंडोनेशिया तक और नेपाल से लेकर श्रीलंका तक सांस्कृतिक एकता है तथा पूजा पद्धति को निजी मामला बनाकर इस पूरे क्षेत्र को एक राष्ट्र के तहत  ले आना चाहिए। यह उसी तरह की एक साम्राज्यवादी परियोजना थी जैसा कि विभिन्न रंग-रूप के साथ हिटलर या मुसोलिनी अपने-अपने देशों के लिए प्रस्तावित कर रहे थे। यानी अपनी साम्राज्यवादी परियोजना में भी हिन्दू फासीवादी मौलिक नहीं थे। प्रसिद्ध है कि हिटलर किस तरह ब्रिटिश साम्राज्य को हसरत भरी नजरों से देखता था। इस तरह हिन्दू फासीवादियों का ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ के नाम पर अपना साम्राज्य असल में ब्रिटिश साम्राज्य की ही एक नकल था। भौंडे हिन्दू फासीवादी आज भी कहते नहीं थकते कि कभी दुनिया पर भारत का उसी तरह का राज था। 
    
असल में हिन्दू फासीवादियों का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उत्तर भारतीय मध्यकालीन सवर्ण मानसिकता की उपज था जो उपनिवेशवाद के संसर्ग से पैदा हुआ था। इसीलिए यह मैकाले की अवैध संतान था। न तो पिता और न पुत्र अपने वास्तविक संबंध को खुलेआम स्वीकार कर सकते थे, हालांकि दोनों ने आपस में खूब ताल-मेल बनाए रखा। अंग्रेजी राज ने अपनी इस जारज संतान को पाला-पोषा जिससे आजादी की लड़ाई में बाधा डाली जा सके। हिन्दू फासीवादियों ने भी अंग्रेजी राज को कभी अपना निशाना नहीं बनाया। कोई अचरज नहीं कि हिन्दू फासीवादी अपने इस अतीत पर चुप्पी साधे रहते हैं।
    
बात केवल यही नहीं है कि हिन्दू फासीवादी मैकाले के अवैध मानस पुत्र थे। वे मुसोलिनी और हिटलर के भी मानस पुत्र थे। उन्होंने इनसे सोच ही नहीं पोशाक भी ग्रहण की। देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों से कैसे निपटना है, इसकी प्रेरणा भी इन्होंने हिटलर से ली। 
    
हिन्दू फासीवादी चाहे लाख छिपायें, चाहे जितनी लीपापोती करें, उनका ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ का नारा इनकी पोल खोल देता है। जैसे ही ये अपने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की व्याख्या करने चलते हैं, तुरंत ही पता चल जाता है कि यह सवर्ण हिन्दुओं की, और वह भी उत्तर भारतीय सवर्ण मध्यमवर्गीय हिन्दुओं की अपनी सोच को बाकियों पर थोपने का मामला है। उनकी ‘संस्कृति’ में मध्यकालीन हिन्दू धर्म पोर-पोर में घुसा हुआ है। इस संस्कृति का प्रदर्शन आजकल कांवड यात्रा से लेकर हनुमान जयंती तक हर अवसर पर किया जा रहा है। 
    
मैकाले की इन अवैध संतानों का पश्चिम के प्रति वास्तविक प्रेम देखते ही बनता है। ये हमेशा से ही अमरीकी साम्राज्यवादियों के मुरीद रहे हैं और उनसे सटने की वकालत करते रहे हैं। केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से उनके सामने बिछते गये हैं। ट्रंप से पिछले दिनों लगातार थप्पड़ खाने के बाद भी वे उसी मुद्रा में हैं। भारतीय अतीत के गौरव का राग अलापने वाला हर हिन्दू फासीवादी मौका मिलते ही पश्चिम, खास तौर पर अमेरिका भाग जायेगा। आज भी ज्यादातर नेताओं के बच्चे वहीं पढ़ रहे हैं। वर्तमान संघी प्रधानमंत्री भी न जाने कब से अमेरिका आता-जाता रहा है, जैसे वह उसका मक्का-मदीना हो। 
    
अपनी जहनियत में हर हिन्दू फासीवादी पूर्णतया मैकाले का मानस पुत्र है। बस उसने ऊपर से भारतीयता का चोंगा डाल रखा है। जैसे आज ढोंगी बाबा-साधु खूब ऐश करते हुए अपने भक्तों को भौतिक सुखों से दूर रहने का पाठ पढ़ाते रहते हैं, वैसे ही ये भी करते हैं। पश्चिम इनकी पोर-पोर में घुसा हुआ है। यदि उनमें कुछ ‘भारतीयता’ है तो बस मध्यकालीन हिन्दू धर्म का कूड़ा-करकट। आजकल इसी कूड़े-करकट को भारतीयता के नाम पर विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है।
    
प्रसंगवश, पश्चिम की भौतिकता के बरक्स भारत की आध्यात्मिकता की बात भी पश्चिमी विद्वानों की ही सोच है जिसे हिन्दू फासीवादियों ने अपना लिया है। सच्चाई यह है कि प्राचीन भारत का तमाम दार्शनिक और धार्मिक-पौराणिक साहित्य ‘भौतिकता’ से भरा पड़ा है। ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या’ की बात करने वाले याज्ञवल्क्य को दो पत्नियां रखने तथा दान में लाखों-करोड़ों की सम्पत्ति बटोरने में कोई गुरेज नहीं था। भारत का ज्ञात इतिहास राजाओं की आपसी लड़ाई तथा साम्राज्य के बनने-बिगड़ने का इतिहास रहा है। यह सब किसी आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए नहीं होता था। और तो और रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के मूल में भी राज्य की लड़ाई ही है- राजा कौन बने? और भी पीछे इंद्रदेव न तो ऋगवेद में आध्यात्मिक थे जब वे सबसे सम्मानित देवता थे और न ही पुराणों में जब वे लंपट देवता बन गये। आध्यात्म के नाम पर भौतिक सुखों के पीछे भागना सारी दुनिया में रहा है- जितना पश्चिम में, उतना ही भारत में। हिन्दू फासीवादी इसी परंपरा को जारी रखे हुए हैं। संघी प्रधानमंत्री इसका प्रतीक पुरुष है जो उपभोक्तावाद के चरम पर जीता हुआ स्वयं को फकीर बताता है। 
    
स्पष्ट है कि मैकालेपुत्रों को कोसने वाले हिन्दू फासीवादी स्वयं सबसे बड़े मैकालेपुत्र हैं। मैकालेपुत्र को कोसने का काम वे कुछ तो स्वयं के वास्तविक चरित्र को छिपाने के लिए और कुछ अपने विरोधी उदारवादियों को बदनाम करने के लिए करते हैं। अपने दोनों ही लक्ष्यों में वे सफल-असफल होते रहते हैं। 
    
इसका मतलब यह नहीं है कि औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति कोई वास्तविक कार्यभार नहीं है। पर इसे मैकाले की जायज या नाजायज औलादें नहीं अंजाम दे सकतीं। इस कार्यभार को एक साम्राज्यवाद विरोधी क्रांति से ही अंजाम दिया जा सकता है। पर यह क्रांति देशी पूंजीपति वर्ग तथा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ क्रांति के बिना संपन्न नहीं हो सकती। आज साम्राज्यवाद देशी पूंजीवाद पर टिका हुआ है जिसके मुरीद जितने उदारवादी हैं, उतने ही हिन्दू फासीवादी भी। आज तो हिन्दू फासीवादी ही इस व्यवस्था को चला रहे हैं। ऐसे में औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की लड़ाई इनके खिलाफ भी लड़ाई बन जाती है।  

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