मारुति व बेलसोनिका मामले में लेबर कोर्ट का निर्णय
गुरूग्राम लेबर कोर्ट द्वारा पिछले दिनों मजदूर विरोधी दो फैसले दिये गये। पहला फैसला मारुति के 546 बर्खास्त स्थायी मजदूरों की बर्खास्तगी को जायज ठहराता है। जबकि दूसरा फैसला बेलसोनिका यूनियन के पंजीकरण को रजिस्ट्रार द्वारा रद्द करने को सही ठहराता है। इन दोनों ही मामलों में अदालत ने मौजूदा कानूनों की अनदेखी कर पूंजीपतियों के हित को ही न्याय की कसौटी मान लिया। इन निर्णयों से अदालत ने दिखा दिया कि छुट्टे पूंजीवाद के आज के दौर में जब सरकारें खुद मजदूर विरोधी कानून बना रही हों तब अदालतें भी पूंजीपतियों के हित में कानूनों की मनमानी व्याख्या करने से पीछे नहीं रहेंगी।
यहां यह गौरतलब है कि ये दोनों फैसले हाल में लागू मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिताओं को भी दरकिनार कर दिये गये हैं। इन फैसलों के सहारे मालिक अनुशासनहीनता का हवाला दे बगैर जांच के स्थायी मजदूर को काम से निकालने लगेंगे। यानी व्यवहार में स्थायी व अस्थायी मजदूर का फर्क ही खत्म कर देंगे। वहीं दूसरी ओर अस्थायी मजदूरों का स्थायी मजदूरों के साथ एक यूनियन में संगठित होना असम्भव बना दिया जायेगा।
मारुति मामले में अदालती टिप्पणी बताती है कि अदालत की भाषा और पूंजीपतियों की भाषा में कोई फर्क नहीं रह गया है। अदालत राष्ट्र निर्माण के लिए मजदूरों पर सख्त अनुशासन थोपने की बात करती है और मनमाने तरीके से बगैर जांच श्रमिकों को अनुशासनहीनता का दोषी करार देकर निकालने को सही ठहरा देती है।
बेलसोनिका प्रकरण में तो अदालत ने मनमाने तरीके से घोषित कर दिया कि स्थायी व ठेका मजदूर के नियोक्ता अलग-अलग हैं इसलिए उनके हित भी अलग-अलग हैं इसलिए वे एक यूनियन में एकजुट नहीं हो सकते। इस मामले में पुराना ट्रेड यूनियन एक्ट-1926 या नई औद्योगिक संहिता कहीं भी स्थायी व ठेका मजदूर को एक साथ यूनियन बनाने से नहीं रोकती है। पर अदालत मनमाने तरीके से यहां भी अपनी पूंजीपरस्ती को ही न्याय का नाम दे देती है। कहां तो इस मामले में ठेका प्रथा उन्मूलन कानून-1970 के तहत वर्षों से स्थायी मजदूरों की तरह मशीनों पर काम करने वाले ठेका मजदूरों को स्थायी न करने के लिए कम्पनी को लताड़ लगायी जानी चाहिए थी पर अदालत आंखों पर पट्टी बांध पूंजी के हित से ही न्याय करने पर उतारू हो तो उसे भला मजदूरों के साथ अन्याय कैसे नजर आयेगा।
कानूनों को धता बता सुनाये जाते निर्णयों से मजदूर वर्ग पहली बार नहीं जूझ रहा है। इसी मारुति मामले में अदालत ने एक मैनेजर की हत्या के आरोप में सैकड़ों मजदूरों को वर्षों तक जमानत नहीं दी थी। वर्ग सचेत मजदूर जानते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था में अदालतें-प्रशासन-सरकार सभी पूंजीपति वर्ग की चाकर होती हैं और पूंजी के हित में काम करती हैं। जब मजदूर वर्ग संघर्ष तेज कर अपने शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसके संघर्ष को व्यवस्था के दायरे में बांधने या यूं कहें संघर्षरत मजदूर वर्ग से व्यवस्था को बचाने की खातिर कुछ श्रम कानूनों-अधिकारों का चारा फेंक शासक वर्ग संघर्ष को थामने का प्रयास करता है। पर जब मजदूरों के संघर्ष कमजोर पड़ जाते हैं तो पूंजी के मुनाफे की खातिर सरकार-न्यायपालिका इन्हीं श्रम कानूनों को मानने से इंकार कर देती है। और इन्हें बदलने पर उतारू हो जाती है। आज भारत में यही हो रहा है।
इसीलिए कानूनी अधिकारों को भी मजदूर वर्ग इस पूंजीवादी व्यवस्था में संघर्ष के दम पर ही व्यवहार में उतार पाता है। पिछली सदी में संघर्षों से मिले कानूनी हकों को नयी श्रम संहिताओं के जरिये सरकार काफी कुछ छीन चुकी है। ऐसे में सरकार-अदालतों के इस हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाना जरूरी है।
मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक मिशन है पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा कर समाजवादी समाज से होते हुए वर्गविहीन समाज साम्यवाद की स्थापना। इस मिशन पर आगे बढ़कर ही मजदूर वर्ग पूंजीपति वर्ग को निर्णायक चुनौती दे सकता है। क्रांतिकारी संघर्ष तेज कर ही वो शासक वर्ग द्वारा छीने जाते कानूनी अधिकारों की रक्षा भी कर सकता है व इन अधिकारों का इस्तेमाल कर पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे का संघर्ष तेज कर सकता है।
मारुति की 18 जुलाई 2012 की घटना के बाद तत्कालीन चेयरमैन आर सी भार्गव ने इसे पूंजी और श्रम के बीच वर्ग युद्ध की संज्ञा दी थी। आज जब पूंजीपति वर्ग-अदालत-सरकार-प्रशासन सब एक पाले में खड़े हो देश के सबसे बड़े वर्ग मजदूर वर्ग पर हमला बोल रहे हैं तो मजदूर वर्ग को भी इन लुटेरों को अपनी ताकत दिखाने का वक्त आ गया है। करोड़ों-करोड़ मजदूर जिस दिन एक होकर सड़कों पर उतर पड़ेंगे उस दिन शासकों के सारे हथकण्डे धरे रह जायेंगे। शासकों के निरन्तर हमले मजदूर वर्ग को उस स्थिति में पहुंचा चुके हैं जहां से उसे और पीछे नहीं ढकेला जा सकता। यहां से मजदूर वर्ग केवल और केवल पलटवार ही कर सकता है। अब यह देखने की बात है कि भारत का मजदूर वर्ग अपनी ताकत पहचान कब यह पलटवार करता है। ‘मजदूर वर्ग के पास खोने को अपनी बेड़ियों के सिवाय कुछ नहीं और जीतने को सारी दुनिया है’ इस सच्चाई को जितना जल्द मजदूर वर्ग समझेगा, उतनी जल्दी ही वह संघर्ष के मैदान में होगा।