लालकुंआ/ सेन्चुरी पेपर मिल भारत में एकल स्थान पर पल्प, पेपर, बोर्ड और टिश्यू का उत्पादन करने वाली सबसे बड़ी विनिर्माण सुविधाओं में से एक है। इसकी कुल उत्पादन क्षमता 4.81 लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) है।
सेन्चुरी मिल में वर्ष 2024 की आखिरी तिमाही में काफी उथल-पुथल गहमागहमी या यू कहें कि एक संघर्ष देखने को मिला था। वक्त था LTS [Long Term Settelment], यानी निश्चित अवधि निपटान या त्रिवार्षिक समझौते का जब मिल के श्रमिक सक्रिय थे, सेन्चुरी मिल का श्रमिक वर्ग मूलतः श्रम संगठनों से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा था। जिस सक्रियता का नतीजा यह निकला कि समझौता आखिरकार 30 नवम्बर 24 के सहायक श्रम आयुक्त की उपस्थिति में हस्ताक्षरित हो जाता है।
ITC द्वारा अधिग्रहण - मिल में कार्यरत श्रम संगठनों की शातिराना धोखेबाजी से त्रस्त होकर श्रमिक निराश होकर आगे बढ़ रहे होते हैं तभी 31 मार्च 2025 को अचानक खबर आती है कि सेन्चुरी मिल जो डिवीजन ऑफ सेन्चुरी टेक्सटाइल्स एण्ड इण्डस्ट्रीज लिमिटेड की एक प्रभाग कम्पनी थी, उसका अधिग्रहण ITC [Indian Tobacco] द्वारा 3,498 करोड़ रुपये में होगा। दोनों कम्पनियों के बीच BTA [Business Transfer Agreement] हस्ताक्षरित होता है। सेन्चुरी मिल जिस मूल कम्पनी का प्रभाग थी (CTIL), सेन्चुरी मिल पहले सेंचुरी टेक्सटाइल एण्ड इण्डस्ट्रीज लिमिटेड नामक कम्पनी का एक हिस्सा थी, अब सेंचुरी मिल बेचने के बाद मूल कम्पनी अपना नाम बदलकर आदित्य बिरला रियल स्टेट लिमिटेड (ABREL) कर देती है। ये बदलाव अधिग्रहण की घोषणा से पहले ही हो जाता है।
उपरोक्त बातों से तो यही समझ में आ रहा है कि बिरला समूह की रुचि कागज उद्योग में नहीं रही।
खैर! मिल के अधिग्रहण की घोषणा के बाद सेन्चुरी मैनेजमेण्ट श्रम संगठनों को इसकी सूचना आधिकारिक रूप से देने के लिए अप्रैल माह 2025 को एक मीटिंग बुलाता है जहां मिल का उच्च प्रबंधन इसकी सूचना विस्तार से देता है जहां श्रम संगठन के प्रतिनिधि घड़ियाली आंसू बहाते हैं कि हमारे इस संस्थान को बेचने से पहले हमसे राय शुमारी नहीं की गयी। ढोंग और नाटक करते हैं। जिस संस्थान को 1984 के बाद हम सभी ने संवारा उसके भविष्य का फैसला स्वयं ही कर लिया गया।
श्रम संगठनों के इस बयान से यही याद आता है कि समझौते के दौरान यही नेता श्रमिकों को आश्वासन दे रहे थे कि समझौते पर आप सभी श्रमिकों की सहमति के बाद ही हम हस्ताक्षर करेंगे। लेकिन इन नेताओं ने श्रमिकों की पीठ में खंजर भोंका, इस खंजर के दर्द को मिल के सभी श्रमिक महसूस कर रहे हैं विशेषकर वे जो उस मुहिम में सक्रिय थे।
मिल के अधिग्रहण के बारे में यही बतलाया गया था कि 31 मार्च से अगले 6 महीने में अधिग्रहण की सभी आधिकारिक और दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी कर ली जायेगी। अगस्त 2023 में ITC ने CPP के अधिग्रहण की मंजूरी के लिए CCI [Competition Commission of India] भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग में आवेदन किया।
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग- यह आयोग, भारतीय प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 (Competition Act, 2002) के तहत काम करता है। इसके तहत एक निश्चित सीमा से अधिक मूल्य वाले विलय और अधिग्रहण के लिए CCI से मंजूरी लेना अनिवार्य होता है। CCI यह सुनिश्चित करता है कि यह सौदा बाजार में प्रतिस्पर्धा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न डाले, मतलब यह देखरेख करता है कि किसी मालिकाने का एकाधिकार किसी विशेष उद्योग में न हो।
वर्तमान स्थिति- वर्तमान में मिल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। इस सन्नाटे की मुख्य वजह यही समझ में आ रही है कि मिल को ITC द्वारा अधिग्रहण और समस्त आधिकारिक बदलाव का इंतजार सभी कर रहे हैं।
अगर हम आज से साल भर पूर्व का मूल्यांकन करते हैं तो पाते हैं कि श्रमिकों की मुहिम की मुख्य मांग यही थी कि श्रम संगठनों द्वारा पारदर्शिता और श्रमिकों के प्रति पूर्ण जवाबदेही, लेकिन आज ये दो मुख्य मांगें दूर की कौड़ी साबित हो रही हैं या यूं कहें कि इन दोनों की अनदेखी अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है। समझौता की कुछ मांगें आज की तिथि तक लम्बित है। जैसे-
1. वर्क लोड पॉलिसी- पक्षों में सहमति हुई है कि समझौता लागू होने के तीन माह के भीतर वर्तमान में जारी वर्कलोड एवं पी एल एस (PLS) पावर सेविंग पॉलिसी पर परस्पर विचार-विमर्श कर आवश्यक परिवर्तन किया जायेगा। जो आज 1 वर्ष होने जा रहा है इस पर भी कोई नयी सहमति नहीं बनी है।
2. मेडिक्लेम पॉलिसी (जिसमें कारखाने में स्थायी श्रमिकों के लिए लागू पॉलिसी का कवरेज 1,00,000 रुपये प्रति श्रमिक पत्नी एवं अधिकतम 2 बच्चे निर्धारित आयु वर्ग के लिए बनी है) के इंश्योरेन्स में टॉप-अप की सुविधा बढ़ाने पर सहमति बनी थी।
3. कारखाने में कार्यरत श्रमिक के लिए टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी 6,00,000 रुपये पर सहमति बनी थी। यह तो लागू हुई लेकिन इस इंश्योरेंस पॉलिसी पर टॉप अप की सुविधा अभी तक नहीं बनी है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु है कि कारखाने में उत्पादन के दौरान होने वाली विभागीय समस्याओं के लिए एक उचित मंच था जिसे प्रबंधक ने डिपार्टमेंटल मीटिंग का नाम दिया था, जिसकी आखिरी बैठक 28 सितम्बर 24 को आयोजित की गयी थी। यह बंद पड़ी है जिसकी वजह से विभागीय समस्याओं के हल न होने का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।
प्रबंधक वर्ग के पास एक तर्क बहाने के रूप में है कि अभी प्रशासनिक कार्य बदलाव की प्रक्रिया में है इसलिए समय लग रहा है लेकिन मूल बात श्रम संगठनों में गंभीरता की भयावह कमी है जो उनसे जवाब नहीं मांग पा रहा है।
भविष्य के लिए एक आम धारणा है कि ITC एक बड़ा समूह है। एक अंतर्राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कम्पनी है जिसकी मूल नीतियों का लाभ श्रमिकों को मिलेगा जैसे- पेंशन का बेहतर होना, सेवानिवृत्ति की उम्र 60 वर्ष होना या ITC के सभी क्षेत्रों के उत्पादों एवं होटलों में छूट।
खैर इनकी पुष्टि ITC मैनेजमेंट के आने के बाद ही होगी, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि नये प्रबंधक वर्ग से बात करने वाले वही सभी पुराने श्रम संगठन एवं उनके प्रतिनिधि ही होंगे जिनकी काली करतूतों को आज पूरा सेन्चुरी श्रमिक भुगत रहा है।
आज सेन्चुरी मिल ही नहीं पूरे देश की श्रमिक आबादी पर नया खतरा मंडरा रहा है लेबर कोड का जिसके लागू होने के बाद श्रमिक पूर्णतः निहत्था हो जायेगा।
इन सभी बिन्दुओं को गहराई से समझते एवं महसूस करते हुए मुहिमरत श्रमिकों को आगे आना होगा और अन्य सभी श्रमिकों को साथ लेते हुए मिल में व्याप्त अनियमितता एवं अनिश्चितता को दूर करने के प्रयास हेतु नये श्रम संगठन के निर्माण में आगे बढ़ना होगा।
-लालकुंआ संवाददाता