कुरुक्षेत्र में मासा का फासीवाद विरोधी सम्मेलन

/kurukshetra-mein-masa-ka-fascism-virodhi-sammelan

कुरुक्षेत्र/ कुरुक्षेत्र में 23 जुलाई को राईं धर्मशाला (नजदीक छोटा रेलवे स्टेशन थानेसर) में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा), जो कि देशभर के 14 क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन व मजदूर संगठनों का साझा मंच है, द्वारा एक फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का विषय था- ‘‘बढ़ता फासीवादी खतरा और मजदूर वर्ग : मुकाबला कैसे करें?’’
    
सम्मेलन में मासा के उत्तर भारत के प्रतिनिधि संगठनों, नामतः जन संघर्ष मंच हरियाणा, इंकलाबी मजदूर केंद्र, सेंटर फार स्ट्रगलिंग ट्रेड यूनियंस, आईएफटीयू (सर्वहारा), ग्रामीण मजदूर यूनियन बिहार, और बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन के प्रतिनिधियों सहित 100 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। 
    
वक्ताओं ने कहा कि फासीवाद, जिसकी जड़ असल में पूंजीवादी व्यवस्था है, वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, अंधराष्ट्रवादी और साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकी तानाशाही है। देश में बीते 10 सालों में लगातार फासीवादी हमला बढ़ रहा है जो कि विश्व पूंजीवाद के आर्थिक संकट से लंबे समय से ग्रस्त होने का नतीजा है। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि आज की भाजपा सरकार खुले रूप से देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों के हितों में बेधड़क कदम उठा रही है और इसके लिए मजदूरों-मेहनतकशों के सारे श्रम व जनवादी अधिकारों को ध्वस्त कर रही है, जिसमें सारे श्रम कानूनों को ध्वस्त कर नए लेबर कोड का आगमन, निजीकरण, ठेकाकरण और महंगाई तथा बेरोजगारी दरों में अभूतपूर्व तेजी शामिल है। इसके खिलाफ मजदूरों और जनता के आंदोलनों और एकता को तोड़ने के लिए उन्हें धर्म-जाति-भाषा और नस्ल के नाम पर लड़वाने की लगातार नई मुहिम और साजिशें रची जा रही हैं। इसके साथ जनता के पक्ष की बात करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और युवाओं को देशद्रोही करार दे कर डराया-धमकाया या सीधे जेल में डाला जा रहा है। नई चार श्रम संहिताओं को लाकर सरकार मजदूरों को नागरिक से मध्ययुगीन अधिकारहीन गुलाम बनाने की दिशा में धकेल रही है। वहीं दूसरी तरफ बिहार में एस आई आर को लागू कर के आम जनता से वोट का अधिकार भी छीनने की कवायद शुरू हो गई है, जिसे पूरे देश में लागू करने की बात चुनाव आयोग ने की है। दिल्ली के तमाम इलाकों में भाजपा की राज्य सरकार बनने के चंद महीनों में ही अपने बुलडोजर राज के माडल के तहत गरीबों के आवासों (झुग्गी बस्तियों) को उजाड़ने की प्रक्रिया जारी है। गैरबराबरी आज ब्रिटिश राज से भी ज्यादा हो गई जिसमें 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की 80 प्रतिशत संपत्ति पर कब्जा है।
    
सभी वक्ताओं ने फासीवाद को परास्त करने के लिए मजदूर वर्ग की अगुवाई में मेहनतकश किसानों और सभी शोषित-दमित जनता के साथ साझा मोर्चा बना कर वर्ग संघर्ष और जनांदोलनों को तेज करने की जरूरत को रेखांकित किया। सभी ने कहा कि फासीवादी ताकतों को ध्वस्त करने का कार्यभार पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने के मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन के साथ जुड़ा हुआ है और जल्द ही इस कार्यभार को पूरा करने के लिए मजदूर वर्ग धर्म-जाति-भाषा के तमाम विभाजनों से ऊपर उठ कर एकताबद्ध होकर हुंकार भरेगा। इंकलाब जिंदाबाद, पूंजीवाद साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, फासीवाद हो बर्बाद के जोरदार नारों के साथ सम्मेलन का समापन किया गया।          -विशेष संवाददाता

आलेख

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

/ameriki-iimperialism-ka-trade-war-cause-&-ressult

लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?

/iran-par-mandarate-yuddha-ke-badal

इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं

/prashant-bhushan-ka-afsos-and-left-liberal-ka-political-divaliyapan

गत 26 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहली पुण्यतिथि थी। सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस अवसर पर एक ट्वीट कि